सोमवार, 9 जुलाई 2012

बंजारों की बात मत पूछो जी ------ ललित शर्मा

बिलासपुर रेल्वे स्टेशन के प्लेटफ़ार्म पर अकलतरा जाने के लिए ट्रेन की प्रतीक्षा कर रहा था। आगे की यात्रा के लिए मेरी ट्रेन आने में अभी एक घंटे का विलंब था। किसी की भी प्रतीक्षा करना बड़ा कष्टदायी होता है। घड़ी के कांटे सरकते ही नहीं थे। जितनी बार घड़ी देखता था लगता था कि उसका कांटा वहीं पर अटक गया है। एक बार घड़ी वाले हाथ को झटकारा भी, कहीं घड़ी बंद न हो गयी हो। वर्तमान में स्वचालित घड़ियाँ बंद कहाँ होती है? घड़ी के कांटों का नहीं सरकना प्रतीक्षा की पराकाष्ठा थी। स्टेशन पर काफ़ी भीड़ थी। कहीं पर भी बैठने की जगह नहीं। मै सीढियों के प्लेटफ़ार्म पर बैठ गया। मुझे वहां बैठे देख दो चार लोग और आ कर बैठ गए। यात्रा के दौरान जहाँ भी जगह मिले वहीं बैठना और सोना पड़ता है। तभी तो इसे यात्रा कहते हैं। हर परिस्थिति से व्यक्ति को दो चार होने के लिए तैयार रहना पड़ता है। मैं हैंड बैग से एक पत्रिका निकाल कर पन्ने पलटने लगा। साथ ही आस-पास निगाहें दौड़ती रही। एक ब्लॉगर के लिए कहाँ और कब लेखन के लिए सामग्री मिल जाए या कोई उम्दा चित्र मिल जाए, इसका पता नहीं रहता। इसलिए यात्रा के दौरान सजग एवं चौकन्ना रहना पड़ता है। नजरें चूकी और एक पोस्ट का मसाला हाथ से फ़िसल जाता है।:)

तभी सामने से एक व्यक्ति गंदे कपड़े पहने आता दिखाई दिया। मेरे से थोड़ी दूर पर ही आकर रुक गया। उसकी पतलून नितंबों से नीचे खिसकी हुई थी। लगा कि कोई विक्षिप्त होगा। उसने वहीं पर सबके सामने पतलून उतारी। उसमें बेल्ट की जगह गमछा बांध रखा था। पहली पतलून उतारने के बाद दिखा कि भीतर दूसरी पतलून है। उसे भी कमर पर दूसरे गमछे से कस रखा था। उसने गमछा खोला, उस पतलून को भी उतारा, फ़िर भीतर तीसरी पतलून दिखाई दी। इस तरह उसने कुल 5 पतलूनें उतारी तब कहीं जाकर कच्छा दिखा। सभी पतलूनों की कमर कसने के लिए बेल्ट की जगह एक-एक गमछा बांध रखा था। फ़िर उसने विपरीत प्रक्रिया दोहराई। पहले पतलून चढाई, फ़िर उसे कसके गमछे से बांधा। फ़िर दूसरी चढाई, उसे भी गमछे से कसके बांधा। इस तरह पांचों पतलून चढा कर सबको गमछे से बांध कर कसा। मैं उसकी यह क्रिया देख रहा था। उसकी नजरें बचा कर एक फ़ोटो ले ही ली। कहीं पागल गले पड़ जाए तो लेने के देने पड़ सकते हैं। पर मैं फ़ोटो लेने में कामयाब रहा। वह ब्लॉगर ही क्या? जिसके पास घटनाओं के चित्र रुपी सबूत न हो। चित्रों के लिए तो एक बार अपनी जान जोखिम में डाल चुका हूँ।

जहाँ भीषण गर्मी में तन का एक कपड़ा ही कहर ढाता है। वहाँ इस व्यक्ति ने पाँच पतलूने और उतनी शर्ट पहन रखी थी। अन्य कोई सामान उसके पास नहीं था। अन्यथा एक पागल बहुत सारी चीजें अपने साथ समेट कर चलता है। जिसमें बोरी के साथ कपड़े, प्लास्टिक की थैलियाँ। रंग-बिरंगी अन्य वस्तुएं, जो भी मिल जाए बोरी में भर ली जाती हैं। यहीं एक बार मुझे एक पागल स्त्री मिली थी, जिसने बहुत सारे पेन और कागज रखे हुए थे। मैले कुचैले कपड़ों में बेंच के नीचे बैठ कर रुपा बनियान की गत्ते वाली पैकिंग पर अंग्रेजी में कुछ लिख रही थी। थोड़ा उसके समीप जाकर झांकने लगा, तो देखा उसकी हैंड राईटिंग सुगढ़ थी। उसकी हरकतें देख कर लगा कि पढी-लिखी पागल है। थोड़ी देर में उसने पेन और गत्ते को सहेज कर एक थैली में रखा। फ़िर बोरे से एक अंग्रेजी में छपा पन्ना निकाला और उसे उलट पलट कर पढने लगी। मैं ट्रेन की प्रतीक्षा में उसकी हरकतों को देख रहा था। पढने की कोशिश कर रहा था एक विक्षिप्त के व्यवहार को। अपन भी कुछ कम पागल नहीं हैं। कहीं पर भी और किसी भी घटना पर ध्यान केंद्रित करके उसे समझने का प्रयास करने लग जाते हैं। चाहे वह काम आए या न आए। लेकिन देखा- परखा हमेशा जीवन में काम आता है। 

मेरे परिचित एक लड़का किन्ही पारिवारिक कारणों से विचलित हो गया। उसकी मानसिक हलचल बढ गयी। वह बड़े और धनाढ्य परिवार से था। ईलाज कराने के बाद जब वह सामान्य हुआ तो उसके परिजनों ने विवाह करा दिया और कपड़े एक दुकान उसके हवाले कर दी। दुकान में बैठे-बैठे उसकी मानसिक हलचल फ़िर बढ गयी। ग्राहकों से लेन देन तो सही कर लेता था। दुकान के पास पोस्ट ऑफ़िस था। जितनी भी बिक्री वह दिन भर करता उसे अगले दिन पोस्ट ऑफ़िस में फ़िक्स डिपाजिट करा देता। दुकान में कपड़े कम हो जाते और व्यापारी अपना रुपया मांगने आते तो वह बाप-भाईयों से रुपए मांगता। वे फ़िर उसकी दुकान में बेचने के लिए कपड़ा खरीद कर भरते और वह नित्य फ़िक्स डिपाजिट करता। घर वाले सोच रहे थे इसी बहाने धन तो जमा हो रहा है। लेकिन धंधे में नहीं लग रहा। आखिर पागल के कौन मुंह लगे। धीरे-धीरे उन्होने धन देना बंद कर दिया और सारी पूंजी फ़िक्स डिपाजिट होने के कारण दुकान बंद हो गयी। दुकान बंद होने से वह खाली हो गया। गाँव की गलियों में घूम कर कुछ उठा लाता और जमा करने लग जाता। उसकी हरकतों से तंग आकर घर वालों ने फ़ोटो स्टेट की मशीन लगा कर दे दी। वहां भी उसका वही हाल था। जितना भी कमाता सभी फ़िक्स डिपाजिट कर देता और कागज खत्म होने पर, उसके पैसे घर वालों से मांगता। अर्थात उसे फ़िक्स डिपाजिट करने की सनक सवार हो गयी।

कुछ अधिक सयाने और सभ्य कहे जाने वाले प्राणियों में जमा करने की प्रवृत्ति होती है। चीटियाँ, मधुमक्खी, कुछ चिड़िया और मनुष्य में ही जमा करने की प्रवृत्ति विकसित हुई। हमारे प्राचीन मनोवैज्ञानिको (ॠषि, मनीषी) ने संचय की प्रवृत्ति को कभी बढावा नहीं दिया। संचय करना ही सभी समस्याओं की जड़ बताया। "मा गृध कस्यस्विद्धनम्" कहा। धन का संचय न करो, धन ही समस्त समस्याओं की जड़ है। भविष्य में उपलब्धता से आशंकित होते हुए मनुष्य में संचय करने की प्रवृत्ति ने जन्म लिया होगा। पूत कपूत तो क्यों धन संचय, पूत सपूत तो क्यों धन संचय। जिसको जो मिलता है उसका संचय कर लेता है। मनीषियों ने ज्ञान धन का संचय करने कहा। क्योंकि स्वदेशे पुज्यते राजा, विद्वानं सर्वत्र पुज्यते। विद्वान को धन की आवश्यकता नहीं होती। उसके पास ज्ञान और अनुभव होता है। इसलिए धन कहीं भी कमाया जा सकता है। आज कल के छोटे-बड़े साधु-संत भी संचय करने लगे हैं। संचय करने की इनकी भूख बढती जा रही है। अरबों खरबों की सम्पत्ति पर कुंडली मार कर बैठे हैं और प्रचवन करते हैं कि संचय मत करो। इनकी कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है।

भारत के लोगों ने सोना जमा करके इसका भाव बढा रखा है। अगर सभी के घर का सोना ही बाहर निकलवा दिया जाए तो देश के हालात ही कुछ और होगें। सोना खरीदने प्रति भारतीय अगर थोड़े से भी उदासीन हो जाते हैं अंतर्राष्ट्रीय बाजार में सोने को कोई पूछने वाला नहीं है। लगता है जमा करना मनुष्य की आदिम प्रवृत्ति है। मनुष्य जब शिकार करके पेट भरता था तब उसे भोजन के लिए नित्य शिकार करना पड़ता था। जमा करने की प्रवृत्ति विकसित होने पर मांस का ढेर लगे रहने पर भी वह प्रतिदिन शिकार करता था और मांस का ढेर लगा कर रखता था। इस जमा करने की प्रवृत्ति का यह असर हुआ कि सभी मनुष्य अपनी अपनी सोच एवं जरुरत के हिसाब से काम की वस्तुओं को जमा करने लग गए। पागल होने पर भी जमा करने की प्रवृत्ति जाती नहीं है। चाहे वह कूड़ा करकट ही जमा क्यों न करता हो। उसे लगता है कि यह कूड़ा-करकट ही उसके काम का है और जमा करके रखना चाहिए। कल मिले या न मिले। संचयकर्ता को यह भी मालूम है कि उसके साथ कुछ नहीं जाना। सब यहीं रह जाएगा, जब लौट चलेगा बंजारा। पर सात पीढी तक के लिए जमा करने की लालसा चैन नहीं लेने देती। भले ही साथ तन के कपड़े भी न जाएं।  यही सोचते-सोचते ट्रेन का हार्न सुनकर तंद्रा भंग होती है। देखता हूँ प्लेटफ़ार्म पर ट्रेन आ कर लग गयी। आगे की यात्रा के लिए चल पड़ता हूँ ब्लॉग के लिए पोस्ट जमा करने को।

23 टिप्‍पणियां:

  1. पोस्ट डबल हो गई है ललित भाई , इसे एडिट करके ठीक कर लें । बकिया आपकी राहगुजर तो कमाल है ही ।

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  2. इस जमा करने की प्रवृति ने ही मानव को दुखी कर रखा है खास तौर पर हम भारतीयों को जो सात पीढ़ी तक के लिए जमा करने का ख्वाब पाले रखते है|

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  3. @ झा जी
    अब डबल पोस्ट तो महाराज के सुबह की सैर से लौट आने के बाद ही एडिट हो पायेगी| तब तक अपन भी डबल ही पढ़ लेते है :)

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  4. जमा करने की ही प्रवृत्ति ने देश का भविष्य जमा दिया है..

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  5. हो जाता कभी-कभी ऐसा(डबल पोस्ट) भी, जब कोई अपनी ही धुन में हो !

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  6. बिलासपुर के स्टेशन में पांच पेंट वाले का व्यवहार कौतूहलपूर्ण ही था.

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  7. @अजय भाई

    हा हा हा हा उम्मीद से दुगना हो गया, एक के साथ एक फ्री. मैंने एच टी एम् एल कापी किया था और वहीँ से शेड्यूल कर दिया. इसलिए देख नहीं पाया.

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  8. वह ब्लॉगर ही क्या जो पते की बात पता बता कर न करे.. बढ़िया कहा है..

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  9. भानुमति के कुनबे और 'ललित' निबंध पर एक पोस्‍ट की बनती है...

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  10. जमा करने की प्रवृत्ति का बढना पागलपन की निशानी है .. स्‍वस्‍थ मानसिकता वाले इस प्रवृत्ति को बढने न दें !!

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  11. Lalit Ji..
    Apka or Hamara Vyavhar kuch kuch milta lag raha hai...
    vaise post ki line length kuch gadvada rahi hai..
    vo theek ho jaye to post kamal ki hai ...

    Dhayabad

    http://www.yayavar420.blogspot.in

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  12. अखिरी तस्वीर देख कर पहले तो डर ही गयीं कि कहीं ललित भाई आब बाबा तो नही बन गये? लेकिन ध्यान से देखने पर राहत हुयी। रोचक पोस्ट।

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  13. "जो लोग प्रचवन करते हैं कि संचय मत करो। इनकी कथनी और करनी में जमीन आसमान का अंतर है। जब साथ कुछ नहीं जाना। सब यहीं रह जाना है," कम से कम वही सुधर जाएं तो काफी फर्क पड़ सकता है, देश की अर्थ व्यवस्था पर.

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  14. बहुत ही अच्छी पोस्ट विक्षिप्त के व्यवहार का यतार्थ चित्रण

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  15. एक ब्लॉगर के लिए कहाँ और कब लेखन के लिए सामग्री मिल जाए या कोई उम्दा चित्र मिल जाए, इसका पता नहीं रहता।
    xxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxxx
    वह ब्लॉगर ही क्या? जिसके पास घटनाओं के चित्र रुपी सबूत न हो।
    ब्लॉगर कि मासिकता और उसके कार्यों को स्पष्ट करती पोस्ट ....अंतिम पंक्तियों में आपने एक दार्शनिक और वास्तविक बात कही है ....निश्चित रूप से प्रासंगिक है यह पोस्ट .....!

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  16. पढ़ कर पगला से गए....
    :-)

    सादर
    अनु

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  17. थोड़े बहुत पागल हम सब होते हैं..

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  18. दिलचस्प पोस्ट , दिलचस्प तस्वीरें .
    पागल कहो या कंजूस -- दयालु तो फिर भी होता है .

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  19. कहानी आपने सुनाई थी , चित्र देखकर आनंद आ गया .अद्भुत फोटो ग्राफ्स .

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  20. पागलों के साथ सफर जारी रहे.

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  21. एक बंजारा गाये जीवन के गीत सुनाये
    हम सब जीने वालो को जीने की राह बताए,,,,

    दिलचस्प लाजबाब प्रस्तुति,,,,

    RECENT POST...: दोहे,,,,

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  22. हर मानव पागल है
    कोई थोड़ा कोई ज़्यादा
    कोई किसी के लिए कोई किसी के लिए

    पागलपंती भी ज़रूरी है :-)

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