बुधवार, 22 अप्रैल 2015

पर्यावरण प्रदूषण एवं प्राचीन चिकित्सा पद्धति - कलिंग यात्रा


चलते-चलते एक-एक पाषाण प्रतिमा के रुकता हूँ और वह मुझे कुछ न कुछ कहती है। जिसे सिर्फ़ मैं सुन सकता हूँ और वह मुझे ही कह सकती है। विक्रमादित्य के सिंहासन की पुतलियों की तरह सभी प्रतिमाएं बोलती हैं। सदियों पुराने राज अपने मुंह से ही खोलती हैं। न विक्रम सुन पा रहा है न बिकाश। इन्हें सुन कर और समझ कर भी क्या करना  है पाषाण की भाषा। पाषाणों की भाषा की इतनी समझ तो नहीं है, क्योंकि मैने किसी इस भाषा का किसी गुरुकुल में अध्ययन नहीं किया है और न ही किसी कुल ॠषि के उनके कुलगोत्र का होने का प्रमाण पत्र पाया है। बस प्रेम है इनसे और प्रकृति कहती है कि प्रेम की भाषा समझने के लिए किसी प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं। 
बोलती पुतलियाँ
एक प्रतिमा के समक्ष ठिठक जाता हूँ, उसने बहुत कुछ राज अपने में संजो रखे हैं, देखते ही बोलने लगती है। प्रतिमा में मैथुन रत पुरुष स्त्री को प्रकट किया गया है। लोग मुंह फ़ाड़े कामसुत्र के आसनों को देख रहे हैं। कुछ नवयुवकों की फ़ौज भी इन्हें देख कर आनंदित है। एक युवक मोबाईल पर किसी से बतिया रहा है - "अरे तुमको आना था हमारे साथ, क्या जोरदार सेक्सी पोज हैं यहाँ। सालों ने सारी ब्लू फ़िल्म ही उतार कर रख दी है मंदिर की दीवार पर। बहुत ही गजब है, उस जमाने के लोग कितने सेक्सी थे। तुम रहते तो और मजा आता।" वर्तमान युवाओं की सोच देख मैं स्तब्ध हूँ, जिस प्रतिमा में इन्हें ब्लू फ़िल्म दिखाई दे रही है, वह प्रतिमा उस काल महत्वपूर्ण राज खोल रही है। 
कोणार्क की मिथुन प्रतिमा
चलो उन्होने जो देखा वो मैने बता दिया और अब मुझसे प्रतिमा ने क्या कहा यह बताता हूँ। प्रतिमा कहती है कि रात्रि काल में मच्छरों एवं कीटों की संख्या बढ़ जाती है। इसलिए रात्रि शयन मच्छरदानी (मसहरी) लगा कर करना पड़ता है। आदमी दिन भर का थका हारा घर लौटता है और चर्मसुख के वक्त यदि मच्छर परेशान हलाकान करें तो आनंद में व्यवधान पैदा हो जाता है। इसलिए मच्छरदानी का सहारा लिया जा रहा है। प्रतिमा में चारपाई पर युगल मिथुन रत हैं और चारपाई पर मच्छरदानी लगी है। मच्छरदानी के उपर से चूहे दौड़ रहे हैं। इससे स्पष्ट हो रहा है कि उस काल में भी प्रदूषण के कारण मच्छर थे और आमजन मच्छरों से हलाकान था। मच्छरों से बचने के लिए मच्छरदानी का उपयोग कर रहा था। साथ ही चूहों से भी बचाव हो रहा था।
रात्रिकाल में मच्छरदानी का प्रयोग
ऐसी बहुत सी मिथुन प्रतिमाएं कोणार्क की भीत्तियों पर उत्कीर्ण की गई हैं। मिथुन प्रतिमाओ के साथ रतिज रोगों के विषय में भी प्रतिमाएं बताती हैं। रतिज रोगों के विषय में चरक ने सहिंता में विस्तार से बताया है और उनकी चिकित्सा विधि का भी वर्णन किया है। चित्र में दिखाई गई प्रतिमा में यह पुरुष लिंग में हुए व्रणो से परेशान है। चिकित्सक ने लिंग में दवा का लेपन कर उसे एक यंत्र से बांध दिया है। जिसे उस व्यक्ति ने हाथ में लटका रखा है। वस्त्र के घर्षण से व्रणों से मवाद निकल चिपक जाता है और असहनीय दर्द का सामना करना पड़ता है। इसलिए चिकित्सक ने उसे वस्त्र से अलग कर दिया है। आधुनिक चिकित्सा में भी मुत्र नली में कैथेटर डाल कर मरीज के हाथ में पकड़ा दिया जाता है। इससे ज्ञात होता है कि इस काल में एस टी डी जैसे रतिज रोग भी थे।
यौनरोग चिकित्सा 
एक अन्य प्रतिमा में खड़ी हुई महिला की योनि को स्वान चाट रहा है। कुछ लोग इसे एनिमल सेक्स कह रहे थे। एनिमल सेक्स में स्वान लिंग से मैथुन दिखाया जाता है, न कि चाटते हुए। इसे देखने के पश्चात मुझे अपना ग्रामीण बचपन याद आता है, जब गांव में चिकित्सक नहीं होते थे और किसी के फ़ोड़े में मवाद भर जाता था तो वह कुत्ते से चटवा लेता था। कुछ दिनो के बाद वह फ़ोड़ा ठीक हो जाता है। इसी तरह स्त्री रतिज रोग में गनोरिया इत्यादि का संक्रमण कष्टदायक होता है। इसकी चिकित्सा स्वान से चटवा कर की जा रही है। एक अन्य चित्र में योनि में धुंआ लगाया जा रहा है। यह भी स्त्री रतिज रोग की एक चिकित्सा है। जड़ी बूटियों की धूनी देने से रोग का शमन होता था। वर्तमान में भी अजवाईन आदि की धुंआ दी जाती है।
दो पत्नियों से दुखी सन्यास की ओर प्रस्तुत अधेड़
यह उत्श्रृंखल समाज के लिए एक संदेश भी है कि अत्यधिक मैथुन से विभिन्न व्याधियों का शिकार होना पड़ता है और उनकी चिकित्सा किस तरह की जाती है, इसको भी प्रतिमाओं में दर्शाया गया है। एक प्रतिमा में घुटे हुए शीष का एक अधेड़ व्यक्ति कांधे पर लाठी में पोटली लटका कर कोपीन धारण किए वन गमन को तत्पर दिखाई दे रहा है और एक स्त्री उसका मार्ग रोक रही है। पीछे खड़ी स्त्री ने भी उसको पकड़ रखा है। इस प्रतिमा में घरेलू समस्या दिखाई दे रही है। दो बीबियों की रार से हलकान होकर पुरुष सन्यास लेकर वन जा रहा है और उसे छोटी और बड़ी दोनो बीबियाँ रोक रही है। तत्कालीन समाज की झांकी कोणार्क की भित्तियों में सुरक्षित है। काल के थपेड़े भी उसे नष्ट नहीं कर पाए और जानकारियाँ एक पीढ़ी से दूसरी पीढी को स्थानांतरित हो रही हैं। जारी है आगे पढ़ें……।

3 टिप्‍पणियां:


  1. वाह . बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    कभी यहाँ भी पधारें और लेखन भाने पर अनुसरण अथवा टिपण्णी के रूप में स्नेह प्रकट करने की कृपा करें |

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  2. आदरणीय ललित भाई की समस्त शास्त्रों की जानकारी प्रशंसनीय है. सबसे बड़ी बात सहज रूप में अपनी बात प्रकट करना...इसीलिए भाई सचमुच शिल्पकार हैं ....बधाई

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  3. बेहद रोचक.... यात्रा जारी रहे

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