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बुधवार, 10 फ़रवरी 2016

रानी माई की रहस्यमय दुनिया: बस्तर अंचल

गोड़ मा पैरी, माथा म लाली वो SS, कान मा झुमका तिकोनी वाली होSS मोर गांवे म हाबे मड़ई, देखे ल आबे वोSS… वाहन में बज रहा छत्तीसगढ़ी गीत बसंत के इस मौसम में गाँव की मड़ई देखने का निमंत्रण दे रहा था।
हम भी गांव की ओर जाने वाली सर्पीली सड़क पर गीत सुनते हुए बढ़े जा रहे थे, मड़ई वाला गाँव था रायपुर राजधानी से एक सौ चालिस किमी दूर कांकेर जिले की चारामा तहसील का हल्बा टिकरापारा।

यह गाँव रानी डोंगरी ग्राम पंचायत का आश्रित ग्राम है, बस हमारी कहानी इस गाँव की ही कहानी है। हमारी गाड़ी जब गाँव में पहुंचती है तो बच्चे गाड़ी के पीछे दौड़ने लगते हैं, ऊंघती दोपहरिया में लोग चौकन्ने हो जाते हैं। एक घर के सामने कुछ आदमी औरतें बीड़ी बनाते दिखाई देते हैं और हमारी गाड़ी यही रुक जाती है।
हल्बा टिकरापारा की दुपहरिया
सरपंच तिलक राम कुंजाम के आने के बाद चर्चा शुरु होती है। इस इस गाँव में लगभग 150 छानी (छतें) हैं, जिनमें बसने वाले सर्वाधिक गोंड़ जनजाति के लोग हैं, उसके बाद अधिक जनसंख्या कलार जाति के लोगों की है। धोबी, लोहार के साथ एक घर साहू जाति का भी है। गाँव में पेयजल का साधन नलकूप हैं और बाकी निस्तारी दो तालाबों से होती हैं।

गांव में दो-तीन मंदिर भी हैं, जिसमें शीतला माता, शिव जी के साथ हनुमान जी भी विराजित हैं। प्रायमरी तक का स्कूल शिक्षा के लिए है, इसके बाद पास के ही हल्बा कस्बे में शिक्षा हेतू जाना पड़ता है।

गैर अपासी गाँव होने के कारण सिंचाई के साधन उपलब्ध नहीं है, इसलिए बरसात पर आधारित धान की खेती करनी पड़ती है, वर्षा पर ही यहाँ का जीवन आधारित है, अन्य कोई रोजगार के साधन यहां उपलब्ध नहीं है।
रानी डोंगरी
ग्राम पंचायत रानी डोंगरी नाम लोकदेवी देवी रानी माई के नाम से है, रानी माई आस पास के सात आठ गाँव की देवी हैं। जो टिकरापारा से लगभग 3 किमी की दूरी पर जंगल में डोंगरी की गुफ़ा में विराजती हैं,

ग्राम परम्परा के अनुसार वहाँ पूजा करने के लिए बैगा किरपा राम सोरी नियुक्त है। जब भी देवी की पूजा करनी होती है या उन्हें ग्राम में आमंत्रित करना होता है तो बैगा के माध्यम से ही इस कार्य को सम्पन्न किया जाता है।

मड़ई के दिन सारे गाँव वासी रानी माई होम धूप देकर गाँव आने का निमंत्रण देते हैं, तथा उसके आदेश के बाद मड़ई की डांग लेकर गाँव आया जाता है, देवी मड़ई के कार्य को सफ़ल बनाने के लिए गाँव में पधारती हैं, साथ ही अनुषांगी देवता भी ग्राम में पहुंचते हैं।
रानी माई के दरबार का रास्ता
सरपंच, बैगा एवं ग्राम के पूर्व निवासी चंदूलाल जैन के साथ देवी स्थान पहुंचते हैं, यहाँ विशाल चट्टानों की छोटी सी डोंगरी है। डोंगरी के सामने ही सामुदायिक भवन बना दिया गया है, जिससे इसकी सुंदरता को ग्रहण लग गया है।

देवी के स्थान तक पहुंचने के लिए पैड़ियों का निर्माण भी कर दिया गया है। नवरात्रि में यहाँ मेला लगता है और देवी का आशीर्वाद लेने के लिए वृहद संख्या में भक्त जन आते हैं तब यह वनांचल गुलजार हो जाता है माता के सेवा गीतों से।

पैड़ियां जहाँ जाकर समाप्त होती हैं वहीं लगभग 50 फ़ुट ऊंची एकाश्म चट्टान है और इस चट्टान पर एक बड़ी चट्टान छत की तरह प्राकृतिक रुप से रखी हुई है। यहाँ खुले में रानी माई का स्थान है, इनकी कोई प्रतिमा नहीं है, यहाँ सिर्फ़ आभासी रुप में विराजमान होकर बैगा के माध्यम से अपना पर्चा देती हैं। 
रानी माई के दरबार में बैगा किरपा राम सोरी
बैगा किरपाराम बताते हैं कि देवी भीतर गुफ़ा में विराजित हैं, एकाश्म चट्टान के ऊंचाई में फ़ट जाने के कारण गुफ़ा तक पहुंचने का स्थान बंद हो गया, इसके पीछे के तरफ़ से गुफ़ा में जाने का स्थान है, परन्तु वहाँ भी बड़ी चट्टानों के गिरने के कारण रास्ता बंद हो गया है, सिर्फ़ भालू ही इस गुफ़ा में शरण लेते हैं।

रानी माई के स्थान पर उनकी सेवा के लिए घोड़ा रखा गया है और पोला के दिन लोग यहाँ पर मिट्टी के बैल भी चढाने आते हैं।  रानी माई आस-पास के रानी डोंगरी, टिकरापारा, कुरुभाट, कोटेला, टोंकोपाट आदि सात गांव की आराध्या हैं। इन गांव के लोग किसी दैवीय समस्या के निवारण के लिए रानी माई के स्थान पर आते हैं।
रानी माई के दरबार में चंदूलाल जैन, उनके भानजे, उनके मित्र, सरपंच तिलकराम कुंजाम एवं श्रीकांत दामले
मान्यता है कि रानी माई का आगमन बस्तर से हुआ है, ये महानदी के साथ आई और इनके साथ बावन कोरी (52X20=1040) देवता भी आए। इन्होने ने इस डोंगरी को उपयुक्त जानकर अपना निवास बना लिया।

इसके बाद इनका सारा परिवार पति देशमात्र,बेटा कुंवर पाट एवं बहु बिजली कैना, जोगड़ा बाबा, गढ़ हिंगलाज देवी, राजाराव देव भी आ गए हैं। इस तरह रानी माई का पूरा कुनबा ही इस स्थान पर जुट गया। बावन कोरी में बाकी देवता महानदी के पास ही रह गए, उनकी पूजा उनके ठहरने के स्थान पर जाकर ही की जाती है।

यहां रानी माई के पति देशमात्र नहीं रहते, उन्हें अन्य स्थान पर रहना पड़ रहा है। बैगा बताते हैं कि इस स्थान पर एक बूढा सिंह भी रहता था जो देवी के स्थान के ईर्द गिर्द ही मंडराता रहता था। जब कोई पूजा करने आता था तब बह गुफ़ा में चला जाता था और पूजा करके लौटने पर फ़िर बाहर निकल आता था। लगभग बारह वर्षों से अब सिंह दिखाई नहीं देता। शायद गुफ़ा में बंद हो गया होगा।
रानी माई दरबार के पार्श्व की गुफ़ा से निकलते हुए लेखक
रानी माई ने अपने पति देशमात्र को इस स्थान से भगा दिया, जिसके कारण उसे यहाँ से लगभग 12 किमी की दूरी पर भिरावर के पहाड़ पर बसना पड़ा। इसके पीछे कहानी है कि रानी देवी भक्त वत्सल हैं और वे प्रतिदिन सुबह उठकर भक्तों की फ़रियाद सुनती हैं।

उनके पति देशमात्र ने खेत जोतने के लिए हल में भैंसा फ़ांद रखा था और खेत जोत रहे थे, उन्हें भूख लगने लगी, इधर रानी माई को भक्तों की फ़रियाद सुनते हुए विलंब हो गया और खाना पहुंचाने में देर हो गई। खाना न लाते देख देशमात्र नें भूख के कारण भैंसे का सींग तोड़ कर आग में भूंज लिया और उसे खाने लगे।

रानी तभी खाना लेकर पहुंची तो उन्हें हड्डी जलने की बदबू आई, देखा कि उनका पति भैंसे का सींग तोड़ कर भूंज कर खा रहा है, उन्हें गुस्सा आ गया और उसे अपने स्थान पर कभी न आने चेतावनी दे दी। इससे देशमात्र भिरावर की पहाड़ी पर बस गए, उन्हें लगभग 12 गांव के लोग अपने अराध्य के रुप में मानते हैं।
रानी माई के दरबार का मनोरम दृश्य
उपरोक्त कथा से पता चलता है कि ग्रामीण भक्तों का रानी माई से मानवीय संबंध है, वे अपने सुख दुख ही हर बात उनसे करते हैं और रानी माई उनका निदान भी करती है।

पौराणिक देवताओं की तरह कोई बहुत बड़ा प्रभामंडल नहीं है, वे मानवीय गुणों से परिपूर्ण देवी हैं, उनका स्वभाव इससे ही पता चलता है कि पति द्वारा अनैतिक कार्य करने पर उसे भी उन्होने ने नहीं बख्शा तथा बेटे और बहू को अपने स्थान पर साथ ही रखा है। उनकी बहू बिजली कैना अर्थात बिजली की कन्या भी उनके साथ ही बेटी की तरह रहती है।

सजा का भागी सिर्फ़ उनका पति ही बनता है। देवी के इस मनोरम स्थल पर पहुंच कर मन प्रसन्न हो जाता है। बस बिना किसी योजना के यहां शासकीय निर्माण कार्य इस स्थान की सुंदरता में धब्बा लगा रहे हैं। इस स्थान को प्राकृतिक रुप में रखने की आवश्यकता है तभी इसकी सुंदरता कायम रह सकती है। सांझ ढ़ल रही थी और हम भी विहंगों के साथ अपने नीड़ की ओर लौट रहे थे।

मंगलवार, 2 फ़रवरी 2016

राजा तालाब : हल्बा टिकरापारा जिला कांकेर

बात 1956-57 की है, बस्तर नरेश प्रवीण चंद भंजदेव वर्तमान कांकेर जिले के हल्बा गाँव के टिकरापारा पहुंचे, उनके स्वागत में सारा गाँव इकट्ठा हुआ। गाँव की चौपाल में उनके लिए खाट बिछाकर ग्रामीणों ने स्वागत किया, वे आकर खाट पर विराज गए। राजा के आगमन पर गाँव के सभी नागरिक इकट्ठे हो गए। राजा उनसे समस्याओं पर चर्चा करने लगे। यह आजादी के बाद का दौर था, जिसमें देश का लोकतंत्र अपना स्वरुप ग्रहण कर रहा था और विकास के पायदान गढ़े जा रहे थे। 

ग्राम के सरपंच तिलकराम कुंजाम उस दिन को याद करते हुए कहते हैं कि " हम लोग उस समय बच्चे थे, लेकिन समझने लायक हो गए थे, राजा  सफ़ेद कुर्ता पैजामा पहना हुआ था और उनके लम्बे बाल कंधे पर झूल रहे थे। ग्रामीणो ने कहा कि गाँव में निस्तारी के लिए पानी समस्या है और कोई भी तालाब नहीं है, कुछ कुंओं एवं नाले के पानी पर ही आश्रित हैं। तब राजा ने ग्राम वासियों को 500/- रुपए दिए और तालाब बनाना शुरु करने को कहा। राजा के पैसों एवं ग्रामीणों के श्रमदान से तालाब का निर्माण शुरु हो गया। 
तालाब के लिए स्थान का चयन करने के बाद सारा गाँव तालाब निर्माण में जुट गया, खंती लग गई। तालाब निर्माण का काम लगभग 3 बरस तक चला तब कहीं जाकर 3 एकड़ की भूमि में "राजा तालाब" का निर्माण हुआ। निर्माण कार्य के दौरान रुपयों की कमी पड़ने पर गांव के कुछ लोग जगदलपुर जाते और राजा से रुपए लेकर आते। इस तरह कुल बारह हजार रुपयों में तालाब का निर्माण कार्य पूर्ण हुआ। राजा तालाब की पार पर शिवालय का निर्माण भी ग्रामवासियों ने किया।

तालाब बनने के बाद समझ आया कि इसके लिए उपयुक्त स्थान का चयन नहीं किया गया। तालाब के चारों तरफ़ खेत थे, इसमें पानी आने का कोई साधन नहीं था, वर्षा जल पर ही इसका भराव संभव होता था। जैसे ही पूस माघ का समय आता है इस तालाब का पानी रिसकर खेतों में चला जाता है। तालाब की मिट्टी भी रेतीली है जिसके कारण पानी नहीं ठहरता॥ हमने जाकर देखा तो तालाब का पानी अंटकर मटमैला हो गया था तब भी लोग उसमें निस्तारी कर रहे थे। 
चंदू लाल जैन कहते हैं कि इस तालाब के निर्मान के बाद ग्रामवासी एक मास्टर में खुद की भूमि में तालाब बनवाया, इसे "मास्टर तालाब" के नाम से जाना जाता है। मास्टर तालाब में पानी ठहरता है, निजी तालाब होने के बावजूद भी मास्टर जी ने कभी ग्राम वासियों को तालाब का पानी उपयोग करने के लिए मना नहीं किया। तालाब में पानी कम होने पर उसे नलकूप जल से उसे भर दिया जाता है, ग्राम में पानी के व्यवस्था के लिए कई बोरिंग भी हैं, जिससे निर्वहन हो जाता है। 

आजादी के बाद भी बस्तर राजा द्वारा निजी धन से तालाब खुदवाने की जानकारी मुझे यहाँ प्राप्त हुई, बस्तर राजा प्रवीर चंद भंजदेव प्रजावत्सल थे, प्रजा के सुख दुख में सम्मिलित रहते और उसके दुखों एवं समस्याओं का निवारण करने का प्रयास स्वयं करते थे, इसलिए आज भी उन्हें बस्तर अंचल में भगवान की तरह पूजा जाता है। बस्तर के गाँव गाँव में उनकी स्मृतियाँ बगरी हुई हैं और 1966 के बस्तर महल कांड की यादें भी ग्रामीणों की स्मृति में अभी तक ताजा हैं।