शनिवार, 24 जुलाई 2010

अस्पतालों की माल प्रेक्टिस पर लगाम कौन लगाए?

ल अस्पताल के चक्कर लगाते रहे, भतीजी को कुछ सर्दी की तकलीफ़ थी। इसलिए सुबह जल्दी भागना पड़ा। डॉक्टर को दिखाए, उसने 2800/ के पैथालाजिकल टेस्ट लिख दिए 200 रुपए ओपीडी की फ़ीस बनी। उसको सिर्फ़ मौसमी तकलीफ़ थी।

टेस्ट की रिपोर्ट आने के बाद 300 की दवाई ली गयी। अब देखिए 3000/ का टेस्ट और 300 की दवाई। डॉक्टर फ़िजिकली कुछ भी एक्जामिन नहीं करना चाहते। वर्तमान में मेडिकल कालेजों में यह कैसी पढाई हो रही है? पहले के डॉक्टर तो सिर्फ़ आँख, जीभ, सांस और नाड़ी देखकर ही बता दे्ते थे कि मरीज को कौन सी बीमारी है?

 और 5 रुपए की दवाई में सब ठीक कर देते थे। आँखे देख कर पीलिया पहचान लेते थे। टाईफ़ाईड, मलेरिया, उच्चरक्तचाप, प्रमेह इत्यादि जान लेते थे और कारगर इलाज के साथ दवाईयाँ भी दे देते थे।

आज तो सेकंड और थर्ड ओपिनियन की जरुरत पड़ती है और उसके साथ उनकी ओपिनियन की फ़ीस भी जुड़ जाती है। दूभ्भर को दो असाढ। डॉक्टर का काम आसान हो गया है, पहले पूरे टेस्ट करवा लो और फ़िर दवाई लिख दो। स्वयं तो कु्छ भी दिमाग पर जोर डालने की आवश्यकता नहीं है। बीमारी की पहचान करने की आवश्यकता नहीं है।

मरीज किसी और बीमारी के इलाज के लिए भर्ती होता है और उसकी मौत किसी दूसरी बीमारी से होती है। लापरवाहियाँ होती है जिससे मरीज की जान भी चली जाती है।

मित्र ने एक दिन सुबह-सुबह फ़ोन किया और बताया कि वे अपने बड़े भाई को पैर में दर्द के इलाज के लिए रायपुर के बड़े अस्पताल में लेकर आए हैं। मैं सुबह 10 बजे अस्पताल पहुंचा उनका इलाज हड्डी वाले डॉक्टर कर रहें। उनसे अस्पताल में मिल कर निकला।

शहर आने के बाद कई काम हो जाते हैं उन्हे भी कर लिया जाए। थोड़ी देर बाद मित्र का फ़ोन आया कि उनके बड़े भाई को ब्रेन हेमरेज हो गया है और वे कोमा में चले गए हैं। डॉक्टर आपरेशन करना चाहते हैं तुरंत ही ब्लड की आवश्यकता है।

मैने कहा तुम काम शुरु करवाओ मैं ब्लड का इंतजाम करता हूँ। मैने तत्काल मित्रों को फ़ोन कर तीन बोतल ब्लड का इंतजाम किया और अस्पताल पहुंचा।शाम 4 बजे आपरेशन शुरु हुआ जो रात नौ बजे तक चलता रहा।

मित्र ने बताया कि रात को उनके भाई ने कुछ धुंधला दिखने की शिकायत की थी नर्स से। डॉक्टर घर चले गए थे, उनसे फ़ोन करके नर्स ने पूछा तो डॉक्टर ने फ़ोन पर कह दिया कि नींद की गोली दे दो। मैं सुबह आकर देखता हूं।

तब तक उन्हे ब्रेन हैमरेज हो चुका था। हो सकता था कि रात को ही उन्हे संभाल लि्या जाता तो बच जाते शायद। 2लाख रुपए का बिल भी बना और मर्ज के साथ मरीज भी चला गया। मैने रात को ही प्राईवेट एम्बुलेंस करके उनके शव को अम्बिकापुर भि्जवाया। अब बताईए कि किसकी लापरवाही थी।

एक स्वामी जी हैं आर्य समाजी, बड़े गुरुकुल के संचालक। एक बार उन्हे गर्मी के दौरान अटैक आ गया और उन्हे इसी अस्पताल में भर्ती किया गया। मेरे पास फ़ोन आया तब तक वो कोमा में जा चुके थे। अस्पताल पहुंच कर उन्हे दे्खा तो मुझे लगा कि बच नहीं पाएगें। मैने ईश्वर से प्रार्थना की और बाहर निकल आया।

वीआईपी थे इसलिए दिल्ली से भी उनके स्वास्थ्य पर नजर रखी जा रही थी। शहर के सारे नामी डॉक्टर लगे हुए थे। वे दो महीने तक कोमा में रहे। उसके बाद उनके गुरुजी आए जो उस समय शतायु हो चुके थे। नामी आर्युवेदाचार्य थे, उन्होने डॉक्टरों से कहा कि आप दो माह से चिकित्सा कर रहे हैं क्या कोमा से वापस आने की आशा है?

डॉक्टरों ने अनिश्चितता जाहिर की। स्वामी जी ने कहा कि आप आहार नली को छोड़ कर आक्सीजन समेत सब हटा लें। अब मुझे अपनी चिकित्सा करने दें।

उसके बाद उन्होने सबको बाहर निकाल कर कमरे का दरवाजा बंद किया। अपने साथ लाई हुई औषधियां दी। तीसरे दिन मरीज को होश आ चुका था और उसके बाद से आज तक सतत काम कर रहे हैं।

वर्तमान में इलाज बहुत मंहगा हो गया है, अगर किसी गरीब के घर में कोई बीमार हो गया तो उसे अपना घर-द्वार बेचना ही पड़ता है।

कहने को तो सरकारी अस्पताल हैं लेकिन वे हमेशा दवाईयों एवं स्टाफ़ की कमी से जूझते रहते हैं। फ़िर वहां मरीज का भगवान ही मालिक है। अगर आप वहां से सही सलामत वापस आ गए तो भगवान को धन्यवाद दिजिए।

अभी कल ही पिथौरा(छ ग) का एक प्रकरण सामने आया है कि प्रसव के दौरान महिला डॉक्टर ने गर्भनाल की जगह बच्चे का हाथ ही काट डाला। फ़िर उस हाथ को टांके लगा कर जोड़ दिया और उसके परिजनों से कह दिया कि बच्चे की मौत हो गयी है।

बच्चे को एक ट्रे में डालकर पटक दिया। जब बच्चे की दादी ने अचानक उसमें हरकत देखी तो इस मामले का खुलासा हुआ। हंगामा होने पर उस डॉक्टर के खिलाफ़ रिपोर्ट दर्ज करके गिरफ़्तार किया और फ़िर थाने से ही 10,000 के मुचलके पर छोड़ दिया।

कितनी बड़ी लापरवाही है जन्म से ही बच्चे का अंग भंग कर दिया और अपनी गलती छिपाने के लिए मृत भी घोषित कर दिया।

कब सुधरेगी हमारी चिकित्सा व्यवस्था? क्या आज ईलाज कराना एक आम आदमी के बस की बात है? दवाइयों के मूल्य पर कोई नियंत्रण नहीं है। पैसे देकर भी असली दवाई मिलने की कोई गारंटी नहीं।

ऐसे में लुट-पिट कर मरने से अच्छा है कि हाराकिरी कर ली जाए। कम से कम बच्चों पर अनावश्यक आर्थिक बोझ तो नहीं पड़ेगा। इलाज के लिए जमा पूंजी भी गंवाई और जान भी नहीं बची।

पहले जहां 10 पैसे की आनंदकर टिकिया से सरदर्द का इलाज हो जाता था। आज उसके लिए 100 रुपए की टेबलेट खानी पड़ रही है। कहां जा रही है हमारी चिकित्सा व्यवस्था?

23 टिप्‍पणियां:

  1. अब हम क्या बोलें भाई , बोलने के लिए तो बहुत कुछ है ।
    शाम को विश्लेषण करते हैं ।

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  2. सब गोरखधंधा है गुरुदेव,

    जय हो!

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  3. सारी बातें सही नही हैं मलेरिया टायफॉइड ऐसे ही कोई देख कर नही पहचान सकता । उसके लिये खून की जांच जरूरी है । बाकी डॉ. साहब ज्यादा बतायेंगे । जब से डॉक्टर को आप कंझ्यूमर कोर्ट में खींचने लगे हो उसे भी अपनी हिफाजत के लिये और आपके भी सारी टेस्ट करवानी पडती है ।

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  4. टेस्ट के नाम पर लूट की जा रही है ...... बिलकुल सही लिखा है..... इस अभियान के खिलाफ आवाज उठाना चाहिए जो गरीबों के लिए लाभप्रद हो सकें ..

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  5. ऐसे डॉक्टर और टेस्ट लिखने वाले सब केतन देसाई के पैदा किये हुए हैं ,इनको इनके असल ठिकाने जूतों की माला के साथ काल कोठरी में बंद करने की जरूरत है | ललित भाई ऐसे ही इनसानियत के दुश्मनों चाहे कोई भी क्यों न हो के बारे में लिखते जाइये ,आज ऐसे लोगों को समाज में अपमानित करने की जरूरत है ... आपका इस उम्दा पोस्ट के लिए आभार ..

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  6. @ जयकुमार झा जी

    मैं सभी डॉक्टरों के विषय में नहीं कह रहा हूँ।
    कुछ डॉक्टर तो सही में मानव सेवा कर रहे हैं।
    जिसमें कई हमारे निकटतम मित्र और सहपाठी रहे हैं।
    लेकिन वर्तमान में लापरवाही बढती जा रही है।
    जिसका उदाहरण मैने समाचार पत्र की कटिंग से दिया है।

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  7. आपने एक ज्वलंत समस्या को उठाया है ललित जी!

    चिकित्सा अब सेवाकार्य नहीं व्यवसाय बन चुका है। डॉक्टर विभिन्न टेस्ट करवाने के लिये उनके द्वारा निश्चित किये गये लैब में भी भेजते हैं मरीज को ताकि वहाँ से भी उन्हें कमीशन मिल सके।

    बहुत पहले शायद सन् में विजय आनन्द जी की एक फिल्म आई थी "तेरे मेरे सपने" जिसमें ऐसी बहुत सी बातों का भण्डाफोड़ किया गया था।

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  8. पहले डा० खुब पढ लिख कर बनते थे, ओर खुब सेवा भी करते थे... आज कल रटा मार कर, नकल मार कर, आरक्षण पा कर, जात पात ओर धर्म के नाम से कोटे मै बन रहे है थोक मै डा० तो यह तो यही गुल खिलायेगे.....ओर खुब पेसा कमायेगे... मरीज जाये भाड मै सेवा का ठेका सिर्फ़ इन्होने ने ही थोडे लिया है... यह घुमे ले आलीशान कारो मै, दिमाग हो या ना हो, वेसे इन लानतियो से ज्यादा तो मरीज कॊ खुद पता होता है कि कोन सी दवा लेनी है

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  9. आपने बहुत सही कहा जी
    मैं तो व्यक्तिगत तौर पर डॉक्टर्स पर बिल्कुल यकीन नहीं करता हूँ। कुछ सालों से एक विचार पक्का होता जा रहा है कि डॉक्टर्स के पास किसी भी बीमारी का इलाज नहीं है, ये केवल चोट, जख्म आदि पर पट्टी के लिये ही ठीक हैं।
    आयुर्वेद और परम्परागत वैद्यों पर ज्यादा भरोसा है। और यह काफी सस्ता भी पडता है।
    जिस टूटी हड्डी को जोडने के लिये डॉक्टर्स ने स्टील की रॉड डालना ही जरूरी बताया, वैद्य ने केवल तीन पट्टियों में जोड दिया। हाँ, देशी इलाज थोडा लम्बा जरुर चलता है पर बीमारी को जड से यही खत्म करता है।
    पर अफसोस आज देशी इलाज की अहमियत कम हो रही है।

    प्रणाम

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  10. कटु सत्य है
    व्यवसाय जो न करवा दे

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  11. आज के डाक्टर भगवान् का रूप कम यमराज का रूप ज्यादा लेते जा रहे है !

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  12. आपने बहुत से प्रकरण सही दर्शाये हैं....आज कल डाक्टर अपने ऊपर कोई आक्षेप नहीं लेना चाहते....क्यों कि कभी कभी उनको कंस्यूमर कोर्ट में घसीट लिया जाता है....लेकिन ऐसी घटनाओं को ज़रूर उजागर करना चाहिए जैसे आपने बताया कि एक नवजात बच्चे का हाथ काट डाला गया...ऐसे डाक्टर की डिग्री ही वापस ले लेनी चाहिए..और कहीं भी चिकित्सा करने की मनाही होनी चाहिए...बहुत दुखद घटना बताई....
    हर बार गरीब आदमी ही मारा जाता है ..इतना मंहगा इलाज आखिर कैसे कराये कोई ...आपकी पोस्ट बहुत सार्थक है....

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  13. @ Mrs. Asha Joglekar,

    जब पैथालाजी लैब नहीं थे,तब भी मलेरिया और टाईफ़ाईड की लक्षणों के आधार पर पहचान होती थी।पहचान होती थी। टाईफ़ाईड को मोतीझिरा कहते थे और मलेरिया को जुड़ीताप।

    आज भी हमारे आदिवासी अंचल के लोग जितना विश्वास बैगा-गुनिया पर करते हैं,उतना विश्वास डॉक्टर पर नहीं करते। कोई भी बिमारी हो प्राकृतिक जड़ी बूटियों से ठीक कर लेते हैं।

    कई लोग इनकी परम्परागत जंगली दवाईयों पर शोध कर रहे हैं कि किस तरह ये उन्हे उपयोग में लाते हैं। बस्तर क्षेत्र में मलेरिया का प्रकोप ज्यादा है। उसे मलेरिया सेक्टर के रुप में चिन्हित किया गया है लेकिन मलेरिया होने पर वे एक पेड़ की पत्तियों उपयोग करते हैं जिससे मलेरिया ठीक हो जाता है।

    बिमारियाँ का तो मनुष्य के जन्म से ही चोली-दामन का साथ है और इनके इलाज के परम्परागत तरीके तभी से प्रचलित हैं।

    हां, मै यह मानता हूँ कि एलोपैथी चिकित्सा पद्धति में मरीज को तुरंत राहत होती है। लेकिन स्थायी राहत नहीं होती।

    मेरी पोस्ट अपनी राय देने पर आपका कोटिश: आभार

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  14. पहले डाक्टरों को खुद पर विश्वास होता था। नाड़ी देख कर रोग पकड़ लिया जाता था। अब अपने पर ही भरोसा नहीं रह गया है इनको। फिर बाजारवाद, पैसे का लालच। जितने टेस्ट करवाओ उतनी कमीशन ऊपर से जवाबदारी कम।

    यानि टके दी बुड़्ड़ी, आन्ना सिर मुनाई।
    कपड़ा तीन सौ का सिलाई पांच सौ।

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  15. सब गोल माल है भाई सब गोल माल है ....

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  16. llit bhaayi doktrs ke baare men mene bhi bhut kuch likhaa he lekin bs kisi ke kaan pr jun nhin rengti doktrs ke khilaaf kaaryvaahi ke liyen chikitsaa prichaaln niym 2002 bne hen or inki is maamle men medikl konsi of india men shikaayt ki jaa skti he kota men to paav daayaa tutaa or baaye per ki hddi tod kr opreshn kr diya gyaa he . akhtar khan akela kota rajsthan

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  17. आपकी चिंता वाजिब है , आज कल टेस्ट मे लाखों खर्च करने के बावजूद डाक्टर मर्ज नही बता पाते . डाक्टर की ग़लती है या मशीन की ? मशीनो की ग़लती का इलाज क्या है ?

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