शनिवार, 14 नवंबर 2009

सिसकता बचपना और बाल दिवस

आज 14  नवम्बर है, बरसों से पंडित जवाहरलाल नेहरु के जन्म दिन पर हम "बाल दिवस" मना रहे हैं. सरकारी खर्चे पर आज फिर बालकों के भविष्य के लिए कुछ घंटों की चर्चा होगी, 

बालविकास की जो योजनाए चल रही है उन पर बहस होगी. कुछ नई योजनाओं के प्रस्ताव आयेंगे. उनका अनुमोदन होगा. कुछ एन.जी.ओ. अपना ज्ञान बघारेंगे. कुछ बड़े अफसरों की बीबियाँ अनाथ आश्रमों में जा कर पुराने कपडे, फल और दूध बांटेंगी. 

चाकलेट खिलाते हुए किसी कुपोषण के शिकार बच्चे को गोद में उठाकर दुलारेंगी, जिससे कल के अख़बारों और मिडिया में उनकी  अनाथ बच्चों के प्रति वात्सल्य प्रवाहित करने की खबरें प्रकाशित  हो सके. 

कोई  शहीद होने का अभिनय कर अपने सेंटेड रुमाल से किसी बच्चे का बहता हुआ नाक पोंछ कर बाल दिवस के प्रति जागरण की मुहीम का प्रचार करेंगी. 

जागरण के इस यज्ञ में अपनी आहुतियाँ देंगी.कुछ तथा कथित संस्थाएं बच्चों के सांस्कृतिक कार्यक्रमों का आयोजन कर मुख्य अथिति के रूप में किसी बड़े नेता मंत्री को बुला कर, उससे नजदीकी गाँठेंगी जिससे बाद में अपना उल्लू सीधा किया जा सके. 

बाल विकास विभाग तय करेगा कि आने वाले सत्र में किस-किस अधिकारी के बच्चे का विकास कितने कमीशन से होगा? वो भी आखिर बाल ही हैं. और बाल विकास का प्रारंम्भ अपने ही घर से किया जाये तो उसकी गुणवत्ता का पता भी चल जायेगा, 

इनके बच्चे विदेशों में पढ़ रहे हैं और उन्हें ज्यादा खर्चे की आवश्यकता है. इसलिए ज्यादा से ज्यादा कमीशन बन सके ऐसी योजनाओं की फाइल उनकी मेज पर सबसे पहले दिखनी चाहिए. उसे बिना रोके ही एप्रूवल देना है. 
भी अपने-अपने तरीके से जुगाड़ लगा कर बाल दिवस मनाएंगे. लेकिन से देखने कोई नही जाने वाला कि इस देश के नौनिहाल किन परिस्थियों में अपना बचपन बिता रहे हैं?

अभी कल की ही बात है मेरी बेटी का स्कुल का जूता टूट गया था. शाम को मैं जूता लेने बाजार गया. जूते की दुकान में मैंने दुकानदार से स्कुल शू दिखने कहा तो उसने आवाज दी " अरे डिस्पोजल" 

तो मैंने सोचा पानी पिलाने के लिए डिस्पोजल गिलास मंगवा रहा है. लेकिन मैं देखता हूँ कि एक 7 /8 साल का लड़का आया. मैं बोला ये तो डिस्पोजल नहीं लाया. 

दुकानदार बोला महाराज इसी का नाम "डिस्पोजल" है. दुकान में थोडा बहुत काम करने के लिए रखा हूँ. इसका बाप चाट का ठेला लगता था, बीमारी में मर गया इसलिए इसे काम पर इसकी माँ के कहने से रख लिया, इनके घर का थोडा बहुत खर्चा चल जाता है. 

मै सोचते रह गया, कि इसका भी नाम किसी ने बहुत सोच समझ कर रखा है. आज भारत का बचपन "डिस्पोजल" ही हो गया है. 

सारी सरकारी योजनाओं से अधिकारियों और मधु कोडा जैसे नेताओं की जेबें भरी जा रही हैं. इन बच्चों के मुंह का निवाला और इनके तन से कपडे छीन कर अपने बच्चों का भविष्य बना रहे है. 

लेकिन गरीब की हाय बहुत बुरी होती है और यह सब कुछ जला कर राख कर देती है. कभी तो बचपन को "डिस्पोजल " बनाने वालों को इनके आंसुओं की कीमत चुकानी पड़ेगी, अपनी संतानों से जूते खाकर. 

7 टिप्‍पणियां:

  1. आज भारत का बचपन "डिस्पोजल" ही हो गया है-कितनी गहरी बात कह गये एक पंक्ति में..सारांश है यह!!!

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  2. मुझे भी इस बाल दिवस पर ऑटो मैकेनिक की शॉप पर बात-बात पर उस्ताद की गालियां और मार खा रहा आठ-नौ साल का बच्चा याद आ रहा है...जब भी उस्ताद ये काम करता है तो मुझे लगता है बाल श्रम विरोधी कानून के मुंह पर ही कस कर तमाचे जड़े जा रहे हैं...

    जय हिंद...

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  3. "कुछ बड़े अफसरों की बीबियाँ अनाथ आश्रमों में जा कर पुराने कपडे, फल और दूध बांटेंगी ..."

    कभी गुप्तदान (जैसे प्रेमचंद के गोदान का प्रोफेसर मेहता नामक पात्र बिना अपने को प्रदर्शित किये विद्यार्थियों की सहायता किया करता था) नाम की एक चिड़िया हुआ करती थी जो अब शायद लुप्त हो चुकी है।

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  4. भारत का बचपन डिस्पोजल हो गया है जिसे रिसाइकिल कर बार-बार यूज किया जा रहा है, कभी दुकानों पर, कभी बाजारों में, कभी बंद कमरों में...

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  5. "अरे डिस्पोजल"--- तो मैंने सोचा पानी पिलाने के लिए डिस्पोजल गिलास मंगवा रहा है. लेकिन मैं देखता हूँ कि एक 7 /8 साल का लड़का आया. मैं बोला ये तो डिस्पोजल नहीं लाया . तो दुकानदार बोला महाराज इसी का नाम "डिस्पोजल" है. दुकान में थोडा बहुत काम करने के लिए रखा हूँ. इसका बाप चाट का ठेला लगता था, बीमारी में मर गया इसलिए इसे काम पर इसकी माँ के कहने से रख लिया, इनके घर का थोडा बहुत खर्चा चल जाता है."

    क्या करे शर्मा साहब, यही हकीकत और इस देश का दुर्भाग्य है !

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  6. कभी तो बचपन को "डिस्पोजल " बनाने वालों को इनके आंसुओं की कीमत चुकानी पड़ेगी, अपनी संतानों से जूते खाकर.
    आपने हकीकत बयान की है,ऐसे लोगों को उपर वाले की बेआवाज लाठी की मार पड़ती है-ललित भैया-आभार

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  7. वाह भाई "डिस्पोज़ल" के कितने निहितार्थ है यहाँ !!

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