शुक्रवार, 13 नवंबर 2009

कभी ऐसा भी होता है जीवन में

कभी ऐसा भी होता है जीवन में, कभी कभी हमसे ऐसी नादानी हो जाती है,जिसे बाद में सोच कर हम अपने आप पर ही हँसने को मजबूर हो जाते हैं. एक घटना ऐसी ही मेरे साथ घटी वह आपके साथ बाँट रहा हूँ,शायद आप के साथ भी घटी हो?

हमारा गाँव कोई दस हजार वोटरों की ग्राम पंचायत है. जो कि अब नगर पंचायत में तब्दील हो गया है. हम सब एक दुसरे को जानते हैं और सबके सुख-दुःख में शामिल होते हैं. 

हमारे घर से कोई आधे कि.मी. की दूरी पर श्मशान है और यहाँ जाने का रास्ता हमारे घर के सामने से ही है. जब किसी की मृत्यु होती है तो मैं शवयात्रा में अपने घर से ही शामिल हो जाता हूँ. 

सभी पंथों एवं धर्मों की मान्यता है की शवयात्रा में शामिल होना पुण्य का काम है. दोस्त हो या दुश्मन, परिचित हो या अपरिचित सभी की अंतिम यात्रा में शामिल होना चाहिए, ये बात मैंने भी गांठ बांध रखी थी. किसी की भी शव यात्रा घर के सामने से निकले मैं अपना पंछा (अंगोछा) उठा कर उसमे शामिल हो जाता हूँ, 

एक दिन ऐसी ही एक शव यात्रा घर के सामने से निकली, उसमे सभी परिचित लोग दिखे, तो मैंने सोचा कि गांव में किसी की मृत्यु हो गयी और नाई मुझ तक नहीं पहुँच पाया मुझे जाना चाहिए, 

मैंने अपना अंगोछा उठाया और चल दिया, श्मशान जाने के बाद मैंने किसी से नही पूछा कि कौन मरा है? अपने हिसाब से कयास लगाया. हमारे मोहल्ले में एक फौजी रहता था और वो काफी वृद्ध हो गया था, 

वो लगातार बीमार भी रहता था, उसके नाती लोग उसके साथ रहते थे. श्मशान में फौजी के नाती लोग सभी क्रिया कर्मो को अंजाम दे रहे थे. अब मैंने सोच लिया कि फौजी की ही शव यात्रा है. 

अंतिम संस्कार के बाद घर आया तो मेरी दादी ने पूछा कि कौन मर गया? मैंने कहा फौजी. उन्हें बता कर मैं नहा कर पूजा पाठ करके किसी काम से बस स्टैंड चला गया. 

जब वापस घर आया तो देखा घर के सब लोग एक साथ बैठे थे. मै देखते ही चक्कर में पड़ गया कि क्या बात हो गई इतनी जल्दी? मैं तो अभी ही घर से गया हूं बाहर. 

दादी ने पूछा " तू किसकी काठी में गया था? 

मैंने कहा "फौजी की. 

तो वो बोली "फौजी तो अभी आया था. रिक्शा  में बैठ के और मेरे से 100 रूपये मांग कर ले गया है. वो बीमार है और इलाज कराने के लिए पैसे ले गया है. 

अब मैं भी सर पकड़ कर बैठ गया "आखिर मरा वो कौन था? जिसकी मैं शव यात्रा में गया था. 

मैंने कहा ये हो ही नहीं सकता मैं अपने हाथों से लकडी डाल के आया हूँ. वो किधर गया है? 

उन्होंने कहा कि बस स्टैंड में डाक्टर के पास गया होगा. मैंने फिर अपनी बुलेट उठाई और बस स्टैंड में उसको ढूंढने लगा. एक जगह पान ठेले के सामने वो मुझे रिक्शे में बैठे मिल गया. मैंने उतर के देखा और उससे बात की. 

अब मैं तो सही में पागल हो चूका था कि "मैं आखिर किसी शव यात्रा में गया था" 

मेरी तो समझ में नहीं आ रहा था, क्या किया जाये? फिर मेरे दिमाग में आया कि फौजी के नाती लोगों से पूछा जाये. 

अब पूछने में शरम भी आ रही थी कि वे क्या सोचेंगे? महाराज का दिमाग खसक गया है. काठी में जा के आने के बाद पूछ रहा है कौन मरा था? किसकी काठी थी? 

मैं इसी उधेड़ बुन में कुछ देर खडा रह फिर सोचा कि चाहे कुछ भी हो, पूछना तो पड़ेगा. ये तो बहुत बड़ी मिस्ट्री हो गयी थी. मौत तो उनके घर में हुई थी. लेकिन किसकी हुयी थी यही पता करना था.  

आखिर मैं उनके घर गया. दूर में मोटर सायकिल खड़ी करके उसके छोटे नाती को वहीँ पर बुलाया और  उससे पूछा.तो उसने बताया कि उसके पापा (फौजी के दामाद)की मौत हुयी है वो भी काफी दिन से बीमार चल रहे थे.

10 टिप्‍पणियां:

  1. ललित भाई,
    अनजाने में गलत ख़बर देकर आपने फौजी की उम्र तो बढ़ा ही दी...कहते हैं जिसकी मौत की गलत खबर उड़ जाए वो दीर्घायु होता है...

    जय हिंद...

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  2. कभू कभू अइसनो हो जाथे महराज, एमा तो तोर कोनो गलती नइ ये!

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  3. आपकी जो हालत हुई होगी...उसी का अन्दाज़ा लगा रहा हूँ...

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  4. हा-हा-हा-हा-हा-हा... gr8 है आप भी ललित जी, वो तो अच्छा हुआ की इस गलत फहमी की वजह से कोई और ढिढोरा गाँव में नहीं पिटा ! अकसर ऐसा भी हो जाता है !

    अब आपको अपनी राम कहानी मैं भी सुनाता हूँ ; बहुत पहले एक दिन अपने उत्तराँचल जा रहा था ! दिल्ली से करीब दस बजे निकला सड़क टूटी फूटी होने की वजह से ऋषिकेश पहुँचने में ही शाम के चार बज गए थे ! पहाडी रास्तो पर अँधेरे के दर से मैंने गाडी की स्पीड बढा दी, पहाडो की छाया की वजह से जल्दी शाम का धुंधलका छाने लगा था ! रास्ते ,में एक छोटी नदी पड़ती है पुल के इस चोर पर मैं क्या देखता हूँ कि एक वृद्ध सफ़ेद कुर्ता पाजाम और काली पहाडी स्टाईल की टोपी पहने मुझसे लिफ्ट मांग रहा था! चाहते हुए भी मैंने इस लिए गाडी नहीं रोकी कि अगर इन्हें चडाता हूँ तो करीब दस मिनट बेकार हो जायेंगे.... अनमने मन से इस बात का दुःख मन में लिए कि मैंने इस वृद्ध की मदद भी नहीं की, मैंने अपनी स्पीड बनाए रखी ! पुल पार किया और मुश्किल से डेड सौ मीटर ही चला हूंगा कि एक मोड़ पर कुछ ग्रामीणों की भीड़ देखी ! आगे एक महेंद्र का ट्रैकर भी खडा था ! जब मैं पास पहुंचा, तो देखा कि सड़क किनारे एक वृद्ध की लाश पडी थी जिसे ट्रैकर ने टक्कर मार दी थी ! मगर यह देख मेरे होश उड़ गए कि लाश की शक्ल बिलकुल उस वृद्ध जैसी ही थी और वैसी ही भेष-भूषा भी थी जो वृद्ध अभी तोडी देर पहले पुल के उस पार मुझ से लिफ्ट मांग रहा था..................................!

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  5. गोदियाल साब ऐसा कोई वाकया मेरे साथ नही हुआ है, जबकि मै हर परिस्थिति मे रहा हुँ,ऐसी-ऐसी जगह रुका हुँ जहाँ लोग एक पल ठहरना नही चाहते,आपके पहाड़ी इलाके मे भी रहा हुँ,टिहरी,पौड़ी सब मेरा देखा हुआ है-लगभग सारे भारत मे घुमता ही रहा हुँ। हो सकता है कोई मेरे जैसा ही संयोग हो गया हो, हम गाड़ी चला्ते हुए एक नजर मे कितना पहचान पाते हैं? मैं मानता हुँ भुत वह है जो बीत चुका है और उसकी वापसी संभव नही है, हाँ जिंदा भुतों की बात.........अलग ही है।

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  6. हा हा हा हा हा ये भी खुब रही ललित भाई, इलेक्शन लड़ना है क्या? ऐसा काम तो नेता लोग ही करते हैं।

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  7. LALIT ji...........RAM.............RAM......



    hahahahahahahahaha.........mazedaar raha yeh kissa bhi.....

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  8. खुशदीप भाई, मित्रों की चाहत का ध्यान रखे वही विचित्र-मित्र है, अवधि्या जी ने पसंद कहा तो हमने बिना कहे पसंद किया, अब राजकुमार जी का दिल टिप्पणियों से भर जाए फ़िर उनको हमसे कोई शिकायत न रहे इसलिए हमने रामप्यारी का पेनाल्टी आदेश समझ कर सारी टिप्पणियां यही पर खर्च कर दी, नही तो वहा भी करनी पड़ती,
    "आंधा बांटे रेवड़ी, फ़िर-फ़िर अपने को ही देय" हा हा हा

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  9. बताईये, अच्छा हुआ क्लियर हो गया वरना बाद में वो दिखते तो आप भूत समझते. :)

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  10. बहुत विचित्र स्थिति हुई होगी। कुछ कुछ वैसी ही जैसे, 'सारी रात रामायण पढ़ी, सुबह पूछना सीता कौन थी।'
    घुघूती बासूती

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