रविवार, 15 नवंबर 2009

बेशर्म भ्रष्टाचारी मधुकोड़ा

हे भगवान ! बेशर्मी की हद हो गई, कितनी मोटी मोटी खाल है इस भेडिये की. कितनी बेशर्मी से कह रहा है कि "अगर जुर्म साबित हो गया तो राजनीती छोड़ दूंगा." 

श्रीमान आपको निमंत्रण ही किसने दिया था ?आओ और हमारा कल्याण करो. तुम तो अपना मुंह निकाल कर स्वयं ही आगे आये थे कि मुझे जीताओ, गली-गली घुमे थे, पता नहीं कितने माँ बाप बनाये थे, कितने नए रिश्तों का  निर्माण किया था अपनी चाल में फंसाने के लिए हम गरीबों को. जनता भी बेवकूफ है.

जब हम चावल पकाते हैं तो उसका एक दाना ही देखते हैं कि पक गया कि नही, पूरी हांडी में हाथ नहीं डालते. जब इन मतदाताओं को पता था कि तुम शातिर धान चोर हो तो वहीं पर इनको तुम्हारा निपटारा कर देना था. 

लेकिन ये भी तो चेतते नहीं हैं ना. जब पकडे गये तो बीमार हो गये और अस्पताल में भरती हो गये. अरे कम से कम जेल जाते वहां तुम्हारे लोग इंतजार कर रहे हैं फुल माला लेकर, कब भैया आयेंगे? 

यहाँ भी हमारा कल्याण होगा, बहुत पैसा गटके हैं गरीबों का. अब मुम्बई का यूनियन बैंक बता रहा है कि तुम्हारे 640 करोड़ रूपये तो इनके बैंक में जमा है. 

एक गरीब आदमी खेत बेच के बैंक में रुपया जमा कराने जाता है तो ये ही बैंक वाले उससे ऐसे सवाल करते हैं कि जैसे वो कहीं से डाका डाल कर लाया है. और तुम्हारा रुपया तो तुम्हारे के दादा की वसीयत से मिला है 

तुम्हारे नाम से जमा करवा कर गये थे बैंक में, अब उसे निकालो और उडाओ और यही सरकारी आदमी बता रहे हैं कि तुम्हारे दादा ने तुम्हारे लिए एक नहीं दो नहीं पुरे चार हजार करोड़ और भी कई जगहों पर रखे हैं. 

धन्य हैं आप महान है आपकी लीला अपरम्पार है, आपका कोई सानी नहीं है.गुरु गुड हो गया चेला गुलगुला हो गया. उसने तो सिर्फ चारा खाया था. तुमने तो पूरे राज्य बजट ही हजम कर डाला, वाह क्या हाजमा है तुम्हारा? 

किसी को इस हाजमे से इर्ष्या हो सकती है. ये तुम्हारा पेट है की म्युनिसिपालिटी का गटर जो भी आया सब अन्दर. 

तुम भ्रष्टाचारियों एक आदर्श बन गए हो. तुमने इस राजनीती की सीमेंट की गीली सड़क पर जो अपने क़दमों के निशान छोडे हैं वो इतनी जल्दी मिटने वाले नहीं हैं. 

तुम्हारा अनुशरण आने वाली पीढियां करेंगी, तुमने इतना महान काम किया है कि तुम्हे ".....चक्र" जैसी किसी उपाधि से अलंकृत किया जाना चाहिए और चौराहों पर तुम्हारी मूर्ति लगाई जानी चाहिए. 

हम तो मंदिर की जंजीर से बंधा हुआ वो घंटा हैं कि लोग प्रसाद तो भगवान को चढाते हैं मन्नत के लिए, और बजा हमें जाते हैं. कब तक मेरे देश की जनता मंदिर का घंटा बने रहेगी?
 

3 टिप्‍पणियां:

  1. हम तो मंदिर का जंजीर से बंधा हुआ वो घंटा हैं कि लोग प्रसाद तो भगवान को चढाते हैं मन्नत के लिए, और बजा हमें जाते हैं. कब तक मेरे देश की जनता मंदिर का घंटा बने रहेगी?'

    शायद हम इस नियति को आत्मसात किये जा रहे है और घंटे सा लटके रहने मे ही खुद को सुरक्षित महसूस कर रहे है क्योकि हर घोटाले के बाद हम उससे बडे घोटाले का इंतजार करने लगते है. कहाँ है प्रतिकार का वह पताका -----

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  2. हम तो मंदिर का जंजीर से बंधा हुआ वो घंटा हैं कि लोग प्रसाद तो भगवान को चढाते हैं मन्नत के लिए,
    बहुत ही शारगर्भित बात कही है आपने

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  3. कुछ ऐसे भी होते हैं

    नाम डूबता ऐसों से ही,
    राष्ट्रों का, संस्थाओं का;
    जो योग्य हुआ करते हैं उन-
    पुरुषों का महिलाओं का।

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