सोमवार, 9 नवंबर 2009

हरिद्वार के फ़र्जी पंडे

कुछ दिनों से मेरे द्वारा लिखी जा रही जादू टोने एवं टोनही प्रथा के आलेख पर लगातार प्रतिक्रियाएं मिल रही हैं टिप्पणियों के माध्यम से. पाठकों प्रतिक्रियाओं के आधार पर हम आगे बढ़ते हैं.

sunilkaushal ने कहा… बहुत बढिया जानकारी दी, बचने के लिए सावधान होना जरुरी है- ना जाने किस भेष मे ऐसे ही लोगों ने कषाय वस्त्रों की मर्यादा को भंग किया है। चावल पकाने वाली जानकारी के लिए आभार-आगे भी देते रहें, इन तांत्रिकों का पेशा ही भया दोहन पर टिका है.

M VERMA ने कहा… बहुत अच्छी जानकारी. हम असावधान होते है इसलिये ठगे जाते है.

Dipak 'Mashal' ने कहा… Aisi jaankari jan samanya me failane ki aaj nitaant aavashyakta hai lalit sir...Jai हिंद-

Dr. Smt. ajit gupta ने कहा… मनुष्‍य का लालच और बिना कर्म किए सब कुछ पाने की चाहत से ही ऐसे लोग हमें ठगते हैं। भारत के लोग कर्मकाण्‍डी लोग हैं और प्रतिदिन ही भगवान के समक्ष भीख माँगते हैं तो ऐसे संयासी लाखों में पैदा हो जाते हैं। अच्‍छी जानकारी। ऐसी घटनाएं प्रत्‍येक व्‍यक्ति के जीवन मे अनेक बार होती हैं बस जागरूक रहने की आवश्‍कता है।

संगीता पुरी ने कहा… इन ढोंगी बाबाजी के खिलाफ लिखकर आप समाज में जागरूकता लाने के लिए बहुत ही अच्‍छा काम कर रहे हैं .. इन्‍होने ज्‍योतिष(जिसे मैं एक विज्ञान के तौर पर परख चुकी हूं), तंत्र मंत्र(जिसे परखा नहीं,पर उसके महत्‍व को इंकार नहीं कर सकती)या अन्‍य प्राचीन विद्याओं को तहस नहस करने का काम किया है .. समाज को इनपर अविश्‍वास करने को मजबूर किया है .. जिनपर समाज को विश्‍वास दिलाने के लिए हमें अधिक श्रम करना पड रहा है !!

राज भाटिय़ा ने कहा… आप ने बहुत सुंदर लिखा,ऎसे बाबा लोग ही आम लोगो का विशवास खराब करते है, आप के ब्लाअंग का फ़ीड नही है, मेने काफ़ी कोशिश की इसे लिस्ट मे डालने के लिये-

शरद कोकास ने कहा… ललित भाई लिख तो बढ़िया रहे हो मेरी रुचि का विषय भी है लेकिन अभी काम्संट्रेट होकर पढ नही पा रहा हूँ । एक दिन पढ़कर इस पर एक पोस्ट ही लिखता हू " ना जादू ना टोना " मे । लिखते रहो यह ज़रूरी काम है ।

अब आगे चलते हैं ठगी के एक नये तरीके की ओर. ये घटना बहुत ही दिलचस्प है. और शायद ही किसी के साथ इस तरह का संयोग बना हो, लेकिन जिसके साथ बना उनकी किस्मत अवश्य ही ख़राब थी.

एक दिन की बात है. मैं दिल्ली से घर आया तो मेरी गोंडवाना एक्सप्रेस ४-५ घंटे लेट हो चुकी थी. अत: मैं भी घर देर से पहुंचा. मेरे नहा धो के तैयार होने के बाद मम्मी ने कहा कि हमारे गढ़मुक्तेश्वर वाले पंडे आये थे. १०० रूपये दी हूँ. और आटा का सीधा भी मांग कर ले गए हैं. 

मैंने पूछा कब आये थे? 

मम्मी ने कहा अभी तेरे आने से एक घंटा पहले. 

मैंने पूछा कि आपको विश्वास कैसे हुआ कि ये हमारे पंडे हैं. 

मम्मी ने कहा कि "उन्होंने अपने बही खाते से तेरे पापा-दादा-चाचा-तेरा और भाइयों का नाम बताया. इससे मुझे विश्वास हुया कि ये अपने पंडे हैं. 

मैंने पूछा कि" उन्होंने मेरे बेटे का नाम बताया? जो २ साल का था.

मम्मी ने कहा नहीं. तब मुझे शक हो गया. वे पंडे नकली थे.

क्योंकि हमारे पडे महेश चन्द्र  मैथ्स के प्रोफेसर हैं और वे १०० रूपये के लिए २००० किलो मीटर नहीं आ सकते. अब क्या कर सकता था. मम्मी को बेवकूफ बना कर वे जा चुके थे. मैं उन्हें कहाँ पर ढूंढ़ता,

लेकिन जिसके उपर राहू-केतु  सवार हो जाये उसका सत्यानाश करवा कर ही छोड़ते हैं. अब आगे देखिये उन पंडों कि कैसी किस्मत ख़राब थी. और मुझे आज भी आर्श्चय होता है.

एक दो दिन बाद मेरे पास सारंगढ़ के सांसद पी.आर.खूंटे का फोन आया, उनकी लडकी की शादी थी पलारी में और मुझे विशेष आग्रह किया था शामिल होने के लिए, मेने सोचा कि ससुराल भी पास में ही है. उनसे भी मिल लेंगे और शाम को शादी में भी शरीक हो जायेंगे. 

मैं ससुराल पहुँच गया. ससुर जी हाल पूछ ही रहे थे कि दो लोग बढ़िया कुरता धोती बास्कट लगाये अन्दर आये श्याम जी हैं तो ससुर जी ने कहा बोलिए. 

इतना कहते ही वे बिना कहे ही सोफे पे बैठ चुके थे. बोले "हम आपके पंडे हैं, हरिद्वार से आये है, आप कुम्भ मेंले में नहीं आये हम आपका इंतजार करते रहे. सोचा कि जजमान किसी कारण नहीं आये तो, हम ही मिल आयें और आपका बही खाता भी अधुरा पड़ा है. उसको भी सुधार लेते हैं. अब तो आपके पोतों का भी नाम जोड़ना है.

मैंने ससुर जी इशारा करके एक अलग कमरे में बुलाया और उसने ये पूछने कहा कि वे कहाँ कहाँ गए थे. फिर अभनपुर का पूछना और जब वो हाँ बोले तो आप उठ कर चले जाना बाकी दक्षिणा मैं दे दूंगा.

ससुर जी ने उनसे पूछा" तो महाराज कहाँ-कहाँ हो आये".

उन्होंने अभनपुर सहित कई जगहों का नाम बताया.

ससुर जी ने कहा कि "ललित जी के यहाँ भी गये थे क्या?

उन्होंने कहाँ "हांजी! गये थे पर ललित जी नही थे, उनकी माताजी मिली थी." उन्होंने अपने हाथ में जजमानों की खानदान की डायरी बना कर अंपने हाथ में ले रखी थी, पहले तो मैंने डायरी उसके हाथ ले कर उसे पलट कर देखा उसमे हमारे ससुराल वालों के सभी घरों का नाम था.

एक नाम ऐसा था जिसे पढ़ कर मुझे ये पता चल गया कि ये नाम उन्होंने कहाँ से लिए हैं और यही इनके फर्जी होने का प्रमाण पत्र था.

मैं उठा और एक के कान के नीचे जोर से बजाया, वो तो हतप्रभ हो गया और बोला "मारते क्यों हो"? मैंने कहा मैं ही ललित हूँ जिसकी माताजी को तुम ठग कर आये हो और अब तुम सिर्फ चक्की पीसोगे और अभी तो सेवा कम ही हुई है. अभी और होगी. तुमने जिस जगह से ये सारे नाम लेकर ठगने का धंधा चालू किया है. उसका मुझे पता चल गया है. अभी पुलिस बुलाता हूँ और तुम्हारे को उनके हवाले करता हूँ.

इतना सुनते ही उसके साथ जो दूसरा आया था वो अपने साथी से बोला" महाराज आपको ये गलत काम नहीं करना था, अब तुम तो खुद फंसोंगे और मेरे को भी मरवावोगे." उसने तुंरत ही पाला बदल दिया,

मैंने एक उसके भी कान के नीचे बजाया, "साले इसके साथ ही ठगी में शामिल है. और अब होशियारी मार रहा है, हमको बेवकूफ समझता है. ये तो संयोग है कि उपर वाले तुम्हारे किये की सजा देने के लिए मुझसे यहाँ तुम्हे १२५ किलो मीटर दूर मिलवाया. तुम्हारा दुर्भाग्य यहाँ खींच लाया. अब तो तुम्हे जेल जाना ही पड़ेगा.

अब उनका नाटक चालू हो गया था. उन्होंने पैर पकड़ लिए और रोने लगे. माफ़ी मांगने लगे. "हमें माफ़ कर दो अब हम किसी के घर नहीं जायेंगे" एक बार माफ़ कर दो" ससुर जी बोले छोड़ दो,

मैंने कहा "जहाँ से भी आये हो सीधा वहीँ का टिकिट कटाकर ट्रेन पकड़ लो, नही तो फिर तुम्हे मालूम है, तुम्हारे साथ क्या होगा".

इतना सुनते ही वो सर पैर रख कर भागे. ऐसी घटनाएँ एक संयोग से ही घटती है. अगर मैं उस दिन नही जाता तो वो मुझे नही मिलते. मैं आज तक आश्चर्य चकित हूँ कि "ये कैसा संयोग था"

10 टिप्‍पणियां:

  1. ललित जी, घटना मजेदार थी मगर यह कहूंगा की सामान्य तौर पर शायद आप कभी अगर उत्तराँचल हिमालय में मौजूद पवित्र बद्रीनाथ धाम के दर्शन करने गए हो तो वहा मौजूद पड़ित जब आप से पूजा अर्चना करवाते है और अगर आप अपना अता पता सही-सही बताते है तो वे आपकी सात पुसतो का लेखा-जोखा निकाल कर आपको बता देते है ! यह उनकी परम्परा रही है की जो भी दर्शनार्थी वहा जाता है उसकी पूरी खानदानी परिचय वे रखते है और चूँकि शर्दियो में धाम के कपाट बर्फ की वजह से बंद हो जाते है अतः वे पंडित लोग इस दरमियान उन जजमानों के पते पर उन्हें मिलने ( मोटी दक्षिणा की उम्मीद लेकर) जाते है!

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  2. संगीता जी के लिए.......उबलते गरम तेल से हाथ धोने और नहाने वाला चमत्कार कैसे किया जाता है.? तेल में "लिक्विड पैरापिन" मिलाया जाता है. एक किलो में ३० से ५० एम्. एल तक, जिससे "लिक्विड पैरापिन" ऊष्मा को सोख कर तेल को गरम नहीं होने देता. लेकिन तेल उबलता ऐसे है, जैसे बहुत गरम हो गया हो और उसमे लगातार बुलबुले निकलते रहते हैं. "लिक्विड पैरापिन" द्वारा ऊष्मा सोखने के कारण उस तेल से आदमी जलता नहीं है.
    बहुत अच्‍छी जानकारी दे रहे हैं ललित भाई आप मुझे .. मैं तो स्‍वयं लोगों के द्वारा इन ठगों के करामातों को सुनकर आश्‍चर्यित रह जाती हूं .. विज्ञान का इतना गलत उपयोग .. पर आपके ब्‍लाग पर गहरे रंग संयोजन से लोगों को पढने में दिक्‍कत तो नहीं होती ना .. मैं चाहती हूं कि जागरूकता भरे इन आलेखों को अधिक से अधिक लोग पढें .. और इन ठगों के चमत्‍कारों का रहस्‍य समझने की कोशिश करें .. समाज में इसका प्रचार प्रसार बहुत आवश्‍यक है .. आप हर आलेख में पिछले सभी आलेखों का लिंक दे दें .. या फिर पिछले सभी आलेखों का एक टैग में डालकर उसके अंतर्गत लिखकर साइड बार में लगा दें .. ताकि इन आलेखों का पढकर लोग हर रहस्‍य का कारण समझ सकें !!

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  3. वैसे एक बार ऐसा संयोग हमारे पारिवारिक मित्र के घर पर भी हुआ था .. हजारीबाग में उनके रिश्‍तेदारों को ठगने के बाद बाबा लोग बोकारो में इनके दरवाजे पर पहुंच गए थे .. और बिल्‍कुल उसी स्‍टाइल में बातचीत की शुरूआत की .. जैसा वे लोग कई दिन पूर्व अपने पीडित रिश्‍तेदारों से फोन पर बातचीत के दौरान सुन चुके थे .. बस इन्‍होने पुलिस बुलाने की धमकी दे डाली और वे तुरंत कहां गायब हुए पता भी नहीं चला !!

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  4. बहुत अच्छी जानकरि दी है आपने। आखें खोल के रख दी। आभार

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  5. जानकारी भरपूर लेख बहुत अच्छा लगा। संगीता पुरीकी टिप्पणी भी जानकारी प्रदान करती है।

    युवा सोच युवा खयालात
    खुली खिड़की
    फिल्मी हलचल

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  6. @गोदियाल जी-इस तरह की जानकारी हमारे हिंदु समाज मे दो जातियां रखती है।1-जो जन्म की जानकारी रखते है उन्हे-जागा-राव-भाट कहते हैं और जो मृत्यु की जानकारी रखते हैं वो अपने खानदानी पंडे होते हैं जो सिर्फ़ हमारे परिवार के मृतकों का रिकार्ड रखते हैं जब अस्थि विसर्जन करने जाते हैं तब। एक जगह और है "गया तीर्थ" वहां पर भी मोक्ष पाए लोगों का रिकार्ड रहता है और न्यायालय भी हिस्से बट्वारे के विवाद मे इनका साक्ष्य स्वीकार करता है।

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  7. समाज में प्रचलित अंधविश्वास को ऐसे ही प्रयासों से दूर किया जा सकता है।
    आपके इस प्रयास को प्रणाम करता हूं।
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    और अब दो स्क्रीन वाले लैपटॉप।
    एक आसान सी पहेली-बूझ सकें तो बूझें।

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  8. ठगी मे विज्ञान का भरपूर उपयोग किया गया है. भभूत आदि का चमत्कार विज्ञान के उपयोग से ही होता है.
    आपका प्रयास अत्यंत सराहनीय है

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  9. अच्छा लिख रहे हैं ललित जी ..रंग संयोजन बदल दीजिए ..आँखों को चुभता है सफ़ेद बैक ग्राउंड में काले अक्षर ही ठीक रहेंगे.

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  10. Ye log isi layak hote hain bhai sahab... bahut sahi kiya aapne..
    Jai Hind...

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