शुक्रवार, 10 सितंबर 2010

शहर में बढता हुआ ट्रैकिक दुर्घटनाओं का बड़ा कारण

काश, भगवान ने सिर के पीछे भी आँखे दी होती। दो नहीं तो एक ही से काम चला लेते या उल्लू जैसे 180 डिग्री तक गर्दन घुमा कर पीछे देख लेने की सुविधा दे दी होती तो कितना अच्छा रहता। मैं ये इसलिए कह रहा हूँ कि कभी-कभी पीछे भी देखना जरुरी हो जाता है।

गाड़ियों में तो बैक मिरर और साइड मिरर की सुविधा रहती है जिससे हम पीछे देख लेते हैं, लेकिन जब पैदल चलना होता है तो बड़ी मुस्किल हो जाती है। सड़क पर पीछे भी ध्यान रखना जरुरी हो जाता है। पता नहीं कौन पीछे से आ जाए। क्योंकि वार हमेशा पीछे से ही कारगर होता है।

इसलिए पीछे से वार करने वाले के लिए कहा जाता है कि सामने आकर वार कर, कायरों की तरह पीछे से क्या वार करता है। अरे मैं वार तक कहां पहुंच गया। बात तो कुछ दूसरी ही थी।

वर्तमान में गाड़ियों की संख्या में बहुत ही ज्यादा इजाफ़ा हुआ है। पहले गाँव भर में एक दो गाड़ियाँ होती थी। अब हर एक घर में आदमी पीछे गाड़ियाँ है। जिसका असर यातायात पर पड़ा है।

हाइवे पर पैदल चलना तो बहुत ही मुसीबत भरा है। जहां सर्विस रोड़ नहीं है वहां तो और भी ज्यादा खतरा है। आप मजे से सामने देखते हुए जा रहे हैं और कोई रांग साइड आकर आपकी पीछे से पूंगी बजाकर जा सकता है। ट्रकों पर लिखा रहता है फ़िर मिलेंगे।

लेकिन जब वह पीछे से ठोकर मार जाता है तो वह भी नहीं दिखाई देता कि कौन सी गाड़ी वाला अस्पताल का रास्ता दिखा गया।

सड़को पर ट्रैफ़िक इतना ज्यादा हो गया है कि सुबह का निकला अगर शाम को घर आ जाता है तो समझ लीजिए नया जन्म है।

इसे रात को अच्छे से सेलीब्रेट कीजिए और चैन की नींद लीजिए। न जाने किस गली में जिन्दगी की शाम हो जाए। सुबह काम पर जाते हुए सबसे गले लग कर मिल लीजिए, क्या भरोसा फ़िर कब मुलाकात हो और कहाँ हो। फ़िर गाड़ियों की स्पीड इतनी ज्यादा रहती है कि मत पूछिए।

 जो नए-नए चूजे अंडा फ़ोड़ कर बाहर निकले हैं वे अपने आप को धूम 2 के हीरो से कम नहीं समझते। जैसे वे सारे करतब सड़क पर ही दिखाने घर से आए हैं। बिना माँ बाप के। हम तो हाथ पैर तुड़वाएंगे ही और तुम्हारी भी टॉंग खूंटी पर तीन महीना लटवाएंगे।

सड़क पर एक बाबा बहुत दिनों से पुलिया पर बैठे दिखाई देते थे। रोज सुबह नियम 10 बजे सड़क की पुलिया पर आकर बैठ जाते थे।

एक दिन मैने पूछ ही लिया –“बाबा आप रोज नित नेम से यहां पुलिया पर आकर बैठ जाते हो और थोड़ी-थोड़ी देर में सामने हाथ हिलाते रहते हो। गाड़ियाँ देखते रहते हो, क्या बात है? किसका इंतजार है?”

बाबा एक गहरी सांस लेकर बोले-“ बेटा मुझे सड़क के इस पार आए दो महीने हो गए। बात ये हैं कि सड़क के उस पार मेरे बेटे का घर है और इस पार मेरी बेटी का। एक दिन मेरी इच्छा अपनी बेटी से मिलने की हो गयी तो बेटा मुझे यहाँ छोड़ गया है।

बेटी अकेली और बीमार है। सोचा कि मिल ही लूं। तब से बेटे का इंतजार कर रहा हूँ कि वो मुझे लेने आए तो सड़क पार करुं और वो देखो जो सामने की बिल्डिंग में जो छत पर बैठी हुई दिख रही है वह मेरी पत्नी है। मैं रोज उसी को देखकर हाथ हिलाता हूँ कि मुझे लेने के लिए लड़के को भेज दे। लेकिन लड़का सुनता ही नहीं है।

एक बार सड़क पार करने की हिम्मत अकेले ही की थी। एक मोटर साइकिल वाले ने टक्कर मार दी मेरी टाँग टूटते-टूटते बची। तब से यहीं बैठ कर सबर कर लेता हूँ, कभी तो उस पार जा पाऊंगा…………….वाह रे ट्रैफ़िक……….…….।

25 टिप्‍पणियां:

  1. बाबा के बेटे की हरकत कितनी अफसोसजनक है..कितने बाप ऐसे ही उस पार इन्तजार कर रहे हैं आज कि बेटा आयेगा लेने.

    उत्तर देंहटाएं
  2. अनियमित यातायात एक बड़ी समस्या है .......
    बाबा के बेटे जैसे ही बेटे संस्कारों को शर्मसार करते है

    उत्तर देंहटाएं
  3. काश ..सड़क पार करवाने वाला ही कोई मिल जाये बाबा को.............

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत पहले कहीं एक विदेशी कहानी पढ़ी थी, ट्रैफ़िक जाम में आंखों के दो जोड़े टकराते हैं। अगके पैरे में शादी, फ़िर अगले पैरे में संतानोत्पत्ति और बहुत कुछ। अलग सी बात ये थी कि ये सब उसी ट्रैफ़िक जाम के दौरान ही हुआ था। बढ़ते ट्रैफ़िक की भयावहता दिखाती वो कहानी अच्छी लगी थी, ऐसे ही ये पोस्ट भी।
    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  5. सार्थक और विचारणीय प्रस्तुती ,इससे देश के असंतुलित विकाश की कहानी के साथ-साथ कुव्यवस्था का भी एहसास होता है ,क्योकि जब घर का मुखिया(सरकार)अपनी जिम्मेवारी ठीक से नहीं निभाता है तो समूचे परिवार को घर से बहार निकलना परता है ,यही है आज देश का हाल सरकार लोगों को सकून चैन देने के वजाय उसका सकून चैन छीनकर उनको दिन रात के दौर धुप में लगा चुकी है ,सरकार का अर्थ यानि सड़ाकर गला दूंगा हो गया है ,मनमोहन सिंह जी जैसे अवल्ल दर्जे के मुर्ख इस देश को चला रहे हैं ....

    उत्तर देंहटाएं
  6. अरे, बाबा तो कोई और निकले, हमने तो समझा था कि कबीरदास जैसे बाबा होंगे जो कहते थे "जो घर फूँके आपना चले हमारे साथ"।

    बढ़िया पोस्ट!

    उत्तर देंहटाएं
  7. आप जितनी पोस्‍ट लखि लेते हैं, उतनी तो टिप्‍पणी छापना भी मुश्किल है. कुछ भाई लोग शायद कापी पेस्‍ट भी इस्‍तेमाल कर लेते हैं. खैर, अपना-अपना तरीका. सिर के पीछे आंख की बात पर याद आ रहा है, किसी पत्रिका शायद 'नवनीत' ने कभी पाठकों से सवाल किया था- यदि आपको तीसरी आंख मिले तो उसे आप शरीर के किस अंग पर चाहेंगे, जवाब में ज्‍यादातर गर्दन और कुछ लोगों ने माथे पर भी कहा, लेकिन जिसे श्रेष्‍ठ जवाब माना गया और लगभग सभी सहमत हुए वह था..... फिर कभी, वह भी अगर आप या और कोई जानना चाहे तो, वरना सब अपने-अपने जवाब के साथ भी खुश रह सकते हैं.

    उत्तर देंहटाएं
  8. हम उल्लू ज़रूर हैं पर भगवान ने सुविधा नहीं दी हमको "दो नहीं तो एक ही से काम चला लेते या उल्लू जैसे 180 डिग्री तक गर्दन घुमा कर पीछे देख लेने की सुविधा दे दी होती तो कितना अच्छा रहता।

    उत्तर देंहटाएं
  9. काश कि ऐसा हो पाता, और हाँ , हम तो सालों से इस ट्राफिक के मारे है ललित जी , ये समझो कि पक गए है !

    उत्तर देंहटाएं
  10. बहुत अच्छी और विचारणीय पोस्ट। बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  11. अभी तो और भी बुरी हालात होने वाली है...गाड़ियाँ बढ़ती जाएँगी और सड़कें उतनी ही रहेंगी ..तिस पर हम भारतीयों का road sense तो सब जानते ही है| बहुत कारगर बात है सर के पीछे आंख वाली.....

    उत्तर देंहटाएं
  12. अनियमित यातायात की आपाधापी और बूढ़े बाबा का दुःख .... और संस्कार हीन बालक ...
    बहुत ही भावपूर्ण प्रस्तुति....

    उत्तर देंहटाएं
  13. अजी पहले बाबा को सडक पार करवा आओ, फ़िर एक आंख किराये पर ले लो.... या कंधो पर साईड मिरर लगवा लो, अपुन के पास हर समस्या का हल है, अब बाबा को सडक पार करवा दो लडके तो नही आने वाले, वो तो खुश है कि बुढा गया:)

    उत्तर देंहटाएं
  14. रोड सेन्स की बजाय इसे ट्रेफिक सेन्स कहें तो बेहतर होगा ...

    उत्तर देंहटाएं
  15. भाटिया जी ने सही कह दिया है, आभार.

    रामराम.

    उत्तर देंहटाएं
  16. क्या बेकार बेटा है......

    ईद की बहुत-बहुत मुबारकबाद!
    मेरा लेख: ईद मुबारक!

    उत्तर देंहटाएं
  17. ऎसे ना जाने कितने बाप हाथ हिलाते होंगे पुलिया पर बैठ कर

    उत्तर देंहटाएं
  18. सहीं कह रहे हैं बाबा जी, पहले महानगरों की सड़कों का यह हाल होता था अब तो हर सड़क का यही हाल है.

    ईद व गणेश चतुर्थी की हार्दिक शुभकामनांए.

    उत्तर देंहटाएं
  19. .
    ललित जी,
    बहुत ही रोचक अंदाज़ में लिखते हैं आप । सिर के पीछे आंख की वाली बात और पैदल चलने वालों की तकलीफ मजेदार है। हैण्ड -मिरर लेकर चलें तो कैसा रहेगा ?
    सुन्दर संस्मरण ।
    .

    उत्तर देंहटाएं
  20. यातायात की समस्या पर रोचक पोस्ट ...बेचारा बाप ...इंतज़ार ही कर्ता रह जायेगा ..बेटा नहीं आएगा लेने ..

    उत्तर देंहटाएं
  21. ट्राफिक व्यवस्था पर करारा प्रहार है वो भी आगे से ना कि पीछे से |

    उत्तर देंहटाएं