बुधवार, 9 फ़रवरी 2011

रांग नम्बर को कंट्रोल करना ट्राई के बस की बात नहीं

“कित्ती दे हो गयी, दोनो बखत मिलने को हैं, अभी तक खाना खाने नहीं आए, बेर मत करो?”- मुझे मोबाईल चालु करते ही सुनाई पड़ा। मैं तो घर पर ही था। फ़िर खाने का निमंत्रण कहाँ से आया? किसी ने बताया भी नहीं? “आप कौन हैं और किनसे बात करनी है? मैने कहा।

तो उधर से जवाब आया कि-“ अब यह भी बताना पड़ेगा कि मैं कौन हूँ? मैने रांग नम्बर कह कर फ़ोन काट दिया। दूबारा वही नम्बर स्क्रीन पर चमकने लगा। मोबाईल चालु करते ही वही आवाज सुनाई दी,

खाने के निमंत्रण के साथ -" कित्ती बेर हो गयी, दुकानदारी होते रहेगी, पहले खाना तो खा लो"।" तो मैने खीज कर कह दिया कि –“आज खाना नहीं खाऊंगा। मुझे दूबारा फ़ोन नहीं लगाना।“

अगले दिन फ़िर उसी समय फ़ोन आया। फ़िर वही खाने पर नहीं पहुचने का उलाहना देती आवाज। मैने उन्हे समझाया कि यह रांग नम्बर है। आप सही जगह फ़ोन करिए।

तो उसने कहा कि –“ हम तो उनको दुकान पर फ़ोन लगाते हैं, पता नहीं आपको कैसे लग जाता है। हम लोग जैनी हैं और दिन छिपने से पहले खाना खाते हैं। इसलिए उनको फ़ोन करके याद दिलाना पड़ता है। मैं टीकमगढ से बोल रही हूँ।“

मैने उन्हे कहा कि आप उनका नम्बर ठीक से डायल करें। उसने कहा कि-“ ठीक से ही डायल करती हूँ, पर आपको कैसे लग जाता है पता नहीं?“ पता रखो-हमने कहा

अगले दिन फ़िर उसी समय उसका फ़ोन आ गया। उठाते ही फ़िर वही चिरपरिचित आवाज और खाने का बुलावा। अब मैने कहा कि –“ आप अपने घर का पता दे ही दें। एक दिन आ ही जाते हैं भोजन करने के लिए। आपकी इच्छा पूरी हो जाएगी।“ वह खिल-खिला कर हंसी और कहा जरुर आईए। फ़िर फ़ोन कट गया।

मैं भी सोच रहा था कि भोजन के निमंत्रण पर 1000 किलो मीटर जाना पड़ेगा। तब तक भोजन ठंडा भी हो जाएगा। मैने उसका निमंत्रण लपेटे ही रखा। खोला नहीं। उसका फ़ोन नियत समय पर नित्य ही आने लगा।

जैसे ही मोबाईल की घंटी बजती, मैं श्रीमति से कहता –“ आज खाना मत बनाना, भोजन का निमंत्रण आ गया है। फ़ोन उठाते ही फ़िर वही निमंत्रण मिलता। पूरे डेढ साल मोहतरमा ने फ़ोन पर भोजन का निमंत्रण दिया। लेकिन हम नहीं पहुंच पाए।

एक फ़िर उनका फ़ोन आया तो मैने कहा कि-“आपके टेलीफ़ोन सेट का कोई एक नम्बर काम नहीं कर रहा है, या डबल दब जाता है। इसे बदल दीजिए, जिससे मुझे भी निजात मिले, आपके फ़ोन से। चाहे कहीं पर भी रहूँ आपका फ़ोन आ ही जाता है।

मुफ़्त में रोमिंग लग जाता है और आपको कहना पड़ता है येल्लो फ़िर वहीं लग गया।“ डेढ बरस से झेल रहा हूँ। आप अपना पता दे दें इससे तो अच्छा है कि मैं आपको एक टेलीफ़ोन सेट ही भेज दूँ तो फ़ायदे में रहूँगा।

पता नहीं आपके पति देव भी कैसे आदमी है। एक टेलीफ़ोन सेट नहीं बदल सकते।“ इसके बाद अब तीन चार महीनों से उनका फ़ोन नहीं आया है। शायद टेलीफ़ोन का सेट बदल लिया है।

लैंड लाईन पर पहले बहुत रांग नम्बर आते थे। परेशानी भी होती थी। व्यर्थ की कॉल अटेंड करके। लेकिन फ़िर बाद मैं भी मजे लेने लग गया। एक दिन रात को एक बजे फ़ोन घनघनाया, उठाते ही किसी ने कहा –“ महाराज प्रणाम, हमने भी खुस रहो का आशीष दिया।

उसने कहा कि- “ मैं बम्बई से बोल रहा हूँ, तीन दिन हो गए लोड नहीं मिल रहा है, खाली आ जाऊं क्या?” खाली आ जाओ-मैने कहा और फ़ोन रख कर सो गया।

कु्छ दिनों बाद फ़िर एक फ़ोन आया –“ भैया! धान का कोड़हा नई मिल रहा है, भूसा ले आऊं क्या? मैने कहा – भूसा ले आओ। अब इनके मालिकों ने इन्हे जुतिया कर लाल कर दिया होगा और ये भी फ़ोन का नम्बर सावधानी से डायल करने लगे होगें।

अब मोबाईल पर ही रांग नम्बर आने लगे हैं और इनकी मुर्खता के तो क्या कहने? फ़ोन खुद ही लगाएगें और पूछेगें कि –“आप कौन बोल रहे हैं?” अरे जिसको तुमने फ़ोन लगाया है वही बोल रहे हैं, दूसरा कौन बोलेगा।

जब तुम्हें ही नहीं मालूम किसको फ़ोन लगाया है तो लगाते क्यों हो? ससुर कहीं के। एक दिन मोबाईल पर फ़ोन आया, उधर से मधुर आवाज आई –“ जीजाजी बोल रहे हैं? हाँ! बोल रहा हूँ, बताओ क्या हाल-चाल है?

सब बढिया है, दीदी कहाँ है?”-उधर से आवाज आई।

“वो तो मायके गयी है, पहुंची नहीं क्या?”-हमने पूछा तो उधर से आवाज ठिठकी, फ़िर बोली –“ आप जीजाजी नहीं बोल रहे हैं और कोई हैं।

मैने कहा-“विश्वास करो जीजा जी ही बोल रहा हूँ। पर हो सकता है तुम्हारा नहीं होऊं तो किसी और का तो हूँ। जीजाजी तो जगत जीजाजी होते हैं, अब कोई जीजाजी बोले तो कौन मना करेगा?“ उधर से लाईन कट चुकी थी।  

30 टिप्‍पणियां:

  1. ललित जी!
    वाह! वाह! अति सुन्दर....बहुत दिनों के बाद आज सबेरे-सबेरे आपका यह आलेख पढ़ कर आनन्द आ गया। जानदार और शानदार प्रस्तुति हेतु आभार।
    =====================
    कृपया पर्यावरण संबंधी इस दोहे का रसास्वादन कीजिए।
    ==============================
    शहरीपन ज्यों-ज्यों बढ़ा, हुआ वनों का अंत।
    गमलों में बैठा मिला, सिकुड़ा हुआ बसंत॥
    सद्भावी-डॉ० डंडा लखनवी

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  2. आदरणीय ललित जी!
    नमस्कार !
    ...... जानदार और शानदार प्रस्तुति हेतु आभार।

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  3. वसंत पंचमी की ढेरो शुभकामनाए

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  4. रांग नंबरों को तो हमने भी खूब झेला है .. रांची के एक रेडियो स्‍टेशन का नंबर और मेरे लैंडलाइन का नंबर एक ही था .. बोकारो वाले बिना एस टी डी कोड लगाए हमारा नंबर डायल कर देते और फोन हमें लग जाता .. कभी कार्यक्रम की प्रशंसा करते .. कभी स्‍वयं भाग लेने की बात ..और कभी गाने सुनाने की फरमाइश .. इन्‍होने कितनो भाग लेने रेडियो स्‍टेशन भेज दिया .. कंप्‍यूटर से तुरंत ढूंढकर गाने निकालते .. और म्‍यूजिक सिस्‍टम ऑन कर फोन पर ही सुना देते .. वे कहते रेडियो पर चलाइए .. ये कहते उसमें समस्‍या है .. फोन पर ही सुन लो .. दो चार महीने तक जब तक रेडियो स्‍टेशन वालों ने एस टी डी के साथ अपना नंबर बतलाना नहीं शुरू किया हमलोग झेलते रहें !!

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  5. डेढ़ वर्ष तक खाने का निमंत्रण आने पर भी भोजन पर नहीं जाना, यह तो नाइंसाफी है। टेलीफोन की माया अपरम्‍पार है।

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  6. गनीमत है सालियों और पत्नियों के साथ भूंसा कोंढा वाले भी हैं, आपके रांग नंबर लिस्‍ट में, वरना ...

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  7. इतने प्यार से कोई जीजाजी बुला रहा है, मान रख लेते।

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  8. इतने लम्बे समय तक लगातार रोंग नंबर से बात करना ...दाल में कुछ काला है ..:)

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  9. जीजा हो या सारा-सारी ,
    टेलीफून की महिमा न्यारी.
    लगता है वसंत के आते ही आपके
    दिल में भी कुछ-कुछ होने लगा है. आम के
    पेड़ की तरह मन भी बौरा रहा है. दिलचस्प व्यंग्य
    आलेख .सराहनीय प्रस्तुति. आभार .

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  10. हम भी कुछ लोगों को अपना नंबर बताकर आपका नंबर दे देते है थोड़े और Wrong No. के मजे ले लीजियेगा .
    हां उनके किस्से फिर से बताइयेगा ब्लॉग पर ही
    :)

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  11. खूब हंसाया आपने आज।
    बहुत-बहुत धन्यवाद आपका।
    ऐसे ही हंसते रहिए और हमें भी हंसाते रहिए।

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  12. Indu puri goswami -

    arre in rong nmbrs ka apna mja hai.kai baar itne mst phone aate hain-'babloo ko utha kr samay pr school bhej dena' hm jwab dete hain -' babloo to duty pr jaane ke liye taiyar ho rha hai.ab school me kyon bheje?
    'ji jaypur jaane wali train kb rwana hogi?'
    'jb aap station pr pahunch jayenge,tb tk ruki hai.ghr ke bahr le aaye?
    par is rong number ne mujhe 'tuhina mitra ji' jaisi friend di.
    bahut mst likha aapne ,ek baar me poora pdh gai.ha ha ha .jadoooooooooooooooooooo

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  13. मजेदार वाक्‍या। ललित जी, लेकिन एक बार तो आपको वहां जाना ही चाहिए था। डेढ साल से कोई आपको आमंत्रित करे और आप इसे महज रांग नम्‍बर कहकर टाल दें, ये तो बहुत नाइंसाफी है।
    कभी हमारा मार्गदर्शन करने भी आईए। आपके पडोसी हैं हम।

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  14. हा हा हा ..पहले हंसी रुके तो कुछ और कहूँ ..इतनी दिलचस्प लिखा है आपने ..हा हा हा ...

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  15. जय हो! भतीजा भी एक नंबरी हो गया आजकल.:)

    रामराम.

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  16. badhiya manoranjan hai.......... ab jab itana koi bulaye to chale hi jana chahiye tha.

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  17. मजेदार....शानदार प्रस्तुति के लिये आभार

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  18. मजेदार फोनकहानी है भईया धन्‍यवाद.
    कुछ लोग फोन करते ही बोलते हैं 'हैलो.. हॉं... मैं बोल रहा हूँ' तब किसी फिल्‍म का डायलाग याद आता है 'वाह भई इधई भी मैं और उधर भी मैं'

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  19. मजे दार जी, अभी हमे भारत मे एक दिन फ़ोन आया जीजा जी नमस्कार, हम ने कहा नमस्कार, बोले दीदी पहुच गई क्या? हम ने कहा भाई तुम्हारी दीदी तो बहुत दुर बेठी हे? तो मिश्री बोली जीजा जी आप भी ना बडे वो हो....

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  20. लो फिर आ गया आज उसी नंबर से फोन :)

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  21. प्रणाम,
    आज वाकई इस पोस्ट को पढने के बाद हसी रुक ही नहीं रही है और टिप्पणियों को पढ़कर तो और भी हसी आने लग जाती है उसपर भी आदरणीय संजीव भैया की टिपण्णी ने सोने में सुहागा कर दिया है |
    वाकई मै सोचने में मजबूर हूँ की कैसे आपने ढेड वर्षों तक बर्दाश्त किया इस "रोंग नंबर" को ...

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  22. वाह..क्या खूब लिखा है आपने।

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  23. लगता है किसी ताई से पाला नहीं पड़ा है वरना तो जर्मन मेड से बात होती |

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  24. JEE JAA JEE KYAA BAAT HAI ULTA SEEDHA EK SAMAAN
    KAS KE JEE JAAO JEE AISE MAUKON KO. JAHAAN TAK BAAT DOORBHASHIK VAARTA KARNE KEE HAI KAA BATAAYEN LOG ABHI TAK PHONAWAAA KA MATLAB HI NAHII SAMAJH PAAYE HAIN LAGTA HAI. MAGAR PARAM AADARNIYE PARAM POOJYA NE JO IS PRASANG KO JEEVANT BANA DIYA HAI USKE LIYE BAHUT BAHUT DHANYAVAAD...... AABHAAAR.....

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  25. bahut hi mazedaar aur sachhi baat likhi hai.... hamaare saath bhi kafi arsa pahle hua tha aisa hi kuchh...
    baat milne tak aai,par hai ri kismat mil nahin paaye hum....koi baat nahin..fir kisi doosre fone ka intzaar karte hain.....!!!

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