गुरुवार, 11 अगस्त 2016

मरखेरा का सूर्य मंदिर: टीकमगढ़

आरम्भ से पढ़ें 
आज की सुबह टीकमगढ़ में हुई, स्नान ध्यान के पश्चात मरखेड़ा का सूर्य मंदिर देखने का कार्यक्रम था। सुबह का नाश्ता मरावी साहब के घर पर हुआ और सपरिवार हम मड़खेरा का मंदिर देखने के लिए चल दिए। टीकमगढ़ के विषय में आरंभिक जानकारी है कि यह टीकमगढ़ जिले का मुख्यालय है। शहर के मूल नाम 'टेहरी' था। 1783 ई ओरछा विक्रमजीत (1776 - 1817 के शासक) में ओरछा से अपनी राजधानी टेहरी में स्थानांतरित कर दिया है और यह टीकमगढ़ टीकम (नाम कृष्ण के नामों में से एक है)। टीकमगढ़ जिला बुंदेलखंड क्षेत्र का एक हिस्सा है। यह जामनी, बेतवा और धसान की एक सहायक नदी के बीच बुंदेलखंड पठार पर है।
मरखेड़ा का सूर्य मंदिर
मरखेड़ा का सूर्य मंदिर टीकमगढ़ से लगभग 20 किमी की दूरी पर है। थोड़ी देर के सफ़र के बाद हम सूर्य मंदिर के समक्ष पहुंच गए। यह ऊंचे अधिष्ठान पर निर्मित है। इस मंदिर के विषय में जानकारी के लिए कोई भी सूचना फ़लक इस स्थान पर नहीं है। मध्यप्रदेश पुरातत्व विभाग के अधीन इस मंदिर की दुर्दशा प्रथम दृष्टया ही दिखाई पड़ती है। शिखर आमलक युक्त इस मंदिर में लघु मंडप है, जो चार स्तंभों पर खड़ा है। गर्भ गृह में सूर्य की स्थानक प्रतिमा है। जिसका जल चढाने के कारण क्षरण हो रहा है। मंदिर की जंघा में स्थापित सभी प्रतिमाओं पर यहां के लोग जल चढाते हैं, जिससे वे भी क्षरण के कगार पर हैं। एक महिला सभी प्रतिमाओं पर जल छिड़क रही थी, मैने उसे मना किया और उससे होने वाली हानि के विषय में समझाया।
अपर कलेक्टर टीकमगढ़ श्री मंंगल सिंह मरावी संग
मंदिर के द्वार पट में मिथुन शाखा एवं पुष्प वल्लरी शाखा निर्मित है, इसके दोनो तरफ़ गंगा एवं यमुना नदी देवियों का परिचारिकाओं के संग स्थापन है। द्वार के सिरदल पर मुख्य सप्त अश्वरथारुढ भगवान सूर्य विराजमान हैं। उसके अतिरिक नवग्रह भी दिखाई देते हैं। इसके अतिरिक्त व्यालांकन भी है। भित्तियों में कुबेर, दिक्पाल, अश्वारुढ सूर्य, ब्रह्माणी, वराह अवतार, नृसिंह अवतार, स्थानक गणपति, निर्मांसा चामुंडा, कीर्तिमुख, अप्सराएँ, गंधर्व, दंडधर इत्यादि स्थापित हैं। प्रतिमा अलंकरण की दृष्टि से यह मंदिर समृद्ध है। इसके समक्ष एक प्राचीन कुंआ भी है। इसके अतिरिक्त कुछ प्रतिमाएं प्रांगण में भी रखी हुई हैं।
वराह अवतार
भारत में सूर्य मंदिरों की संख्या कम ही है, परन्तु बुंदेलखंड में सूर्य मंदिर बहुत सारे हैं। टीकमगढ़ जिले में ही लगभग नौ सूर्य मंदिर बताए जाते है। बुंदेलखंड में वाकाटकों का शासन भी रहा है। मरखेड़ा के सूर्य मंदिर का निर्माण वाकटकों ने कराया था। सूर्य मंदिर दर्शन कर हम लौट रहे थे तो एक स्थान पर सड़क के दोनो तरफ़ बैरक दिखाई दीं। इनके बीच से होकर सड़क का टीकमगढ़  की ओर जाती है। पता चला कि यह टीकमगढ़ राजा की निजि संपत्ति है। पहले इस स्थान पर राज्य के अपराधियों को रखा जाता था। सड़क दोनो छोर पर द्वार हैं, जिन्हें सांझ को बंद कर दिया जाता था। 
कुबेर
इस स्थान हमें एक द्वार पर 1770 में निर्मित श्री महारानी कुंवर जू की बावरी लिखा दिखाई दिया। तो बावड़ी देखने की इच्छा से गाड़ी रुकवा ली गई। द्वार बंद था, ऊपर छत पर एक वृद्ध दिखाई दिया, जो हमारी गाड़ी देखते ही एक कक्ष में समा गया। उसे बहुत आवाज देने पर बड़ी मुश्किल से बाहर आया और द्वार खोलने से मना कर दिया। थोड़ा सनकी टाईप का डोकरा लगा। बावड़ी देखने की हमारी इच्छा अधूरी रह गई। कहते हैं कि किसी कलेक्टर ने इस जेल के दोनो तरफ़ बने हुए दरवाजों को तुड़वा दिया था। तब से राजा साहब नाराज हैं। ड्रायवर ने बताया कि द्वार होने से दूसरी तरफ़ का कुछ दिखाई नहीं देता था और दुर्घटनाएँ हो जाती थी।
रजवाड़े की जेल और बावड़ी
 टीकमगढ के समीप ही आलमपुरा ग्राम पंचायत के अधीन बजरंग बली एवं विश्वकर्मा जी का मंदिर है। हमें यह स्थान सड़क से दिखाई दिया तो उधर चल दिए। यहां बजरंग बली के दो मंदिर हैं, विशेष पर्व पर यहां श्रद्धालुओं का मेला भरता है। इस स्थान को बाड़ से घेरा गया है। जिसके कारण गाड़ी पीछे ही छोड़नी पड़ी। मंदिर में भोग का समय हो गया था। हमने बजरंग बली और भगवान विश्वकर्मा के दर्शन किए और प्रसाद इत्यादि ग्रहण कर टीकमगढ़ लौट आए। दोपहर का भोजन करने के बाद थोड़ी देर आराम किए। उसके बाद सांझ को बरसात होने लगी। हमको झांसी से आज संपर्क क्रांति से घर की ओर लौटना था। 
आलमपुरा का हनुमान मंदिर
बस स्टैंड से हम ओरछा के लिए निकल लिए। मुकेश पाण्डेय जी स्टैंड तक आ गए थे। इसके बाद रात का भोजन होटल राजमहल में किए। हमारी ट्रेन रात साढ़े ग्यारह बजे थे। मुकेश जी झांसी छोड़ने जा रहे थे, होटल मालिक ने कहा कि इन्हें मैं छोड़ दुंगा स्टेशन तक। हमारे पास ओरछा जाने के लिए आधा घंटा था पर पन्द्रह मिनट ओरछा स्टेशन पर क्रासिंग का गेट बंद होने के कारण खराब हो गए। हम तो मान बैठे थे कि अब गाड़ी हाथ आने वाली नहीं है। बड़ी मुश्किल से तत्काल में टिकट कन्फ़र्म हुई थी और एक बड़ी समस्या यह है कि छत्तीसगढ़ की ओर आने-जाने वाली सभी गाड़ियाँ झांसी से रात को ही गुजरती हैं।
सफ़र के दौरान यह भी मिली
सेंगर जी ने स्टेशन के गेट पर छोड़ा, हमने गोली की तरह छूटते हुए स्टेशन में प्रवेश किया। प्लेट फ़ार्म पर कोई ट्रेन दिखाई नहीं दे रही थी। हमने द्वार पर खड़े टीटी से पूछा तो उसने कहा कि इन्क्वारी में पूछिए, मुझे नहीं पता। अब इन्क्वारी में पूछ कर टाईम खराब करना था । यहां तो एक एक सेंकंड कीमती था। फ़िर भी इन्क्वारी तक पहुंचे तो उसने बताया कि ट्रेन तीन घंटे विलंब से चल रही है। तब जाकर सांस में सांस आई और हमारा घर की ओर आना कन्फ़र्म हुआ। बाकी के तीन घंटे प्लेट फ़ार्म पर भजन करते हुए गुजारने पड़े। 31 मई से श्रुति का इंजीनियरिंग का एक्जाम प्रारंभ होना है और सेंटर घर से 9 किमी की दूरी पर गांव में है, उसे कॉलेज तक छोड़ने और लेने जाना पड़ता है। लगा कि अब भले ही देर से सही घर तो पहुंच जाएंगे।
ओरछा का बस स्थानक
सोशल मीडिया ने भी बहुत सारे दोस्त दिए हैं, जो इस जन्म में मिलने वाले थे वे प्रत्यक्ष मिल लिए और जो पिछले जन्म के मित्र थे, वो आभासी दुनिया से मिल रहे हैं, ऐसा मेरा मानना है। इनमें कुछ मित्र तो ऐसे मिले जिनसे पारिवारिक संबध स्थापित हो गए। लगता ही नहीं कि कभी मिले थे। कटनी पहुंचने के पूर्व फ़ेसबुक मित्र सुधीर तिवारी जी का फ़ोन आया। यहां सम्पर्क क्रांति तीन घंटे विलंब से पहुंच रही थी। वे स्टेशन पर मिलने के लिए आए और गर्मागर्म नाश्ता भी साथ लेकर आए। मुसाफ़िर से यह मुलाकात भी अच्छी रही।  थोड़ी चर्चा के बाद एक सेल्फ़ी ली गई यादगार के लिए और फ़िर ट्रेन चल पड़ी। विलंब से ही सही लेकिन समय पर घर पहुंच गए। इस तरह कई प्रदेशों से गुजरते हुए एक लम्बी यात्रा सम्पन्न हुई।

2 टिप्‍पणियां:

  1. बेहतरीन वर्णन करते हो आप इन ऐतिहासिक स्थलों का , संग्रहणीय पोस्ट !!

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