सोमवार, 11 जुलाई 2011

पीठ में दर्द आज भी है - रेल दुर्घटना - ललित शर्मा

रेल दुर्घटना अपने आप में एक बहुत बड़ी त्रासदी होती है और जो इसको भोग ले, उसके लिए इससे उबर पाना बहुत ही कठिन होता है। जीवन भर इसे भुला पाना मुश्किल होता है। मैं १2 साल होने पर भी नहीं भुला पाया हूँ. इन दुर्घटनाओं में सालाना हजारों लोगों की जाने जा रही हैं, उनके परिवार बर्बाद हो रहे हैं, सिर्फ चालकों एवं सिगनल की लापरवाही से. इसका जिम्मेदार कौन है? सरकार तो लाख दो लाख रुपए देकर अपने कर्तव्यों की इति श्री कर लेती है। लेकिन दुर्घटना मरे एवं घायल यात्रियों के परिजनों पर जो गुजरती है, उसे वही जानते हैं। ऐसी ही एक त्रासदी पूर्ण दुर्घटना का मैं साक्षी रहा हूँ। जब भी कहीं रेल दुर्घटना होती है। मेरे सामने 1998 का वह दृश्य आ जाता है।

बात २ सितम्बर १९९८ की है, मैं दिल्ली से रायपुर आने के लिए चला, मुझे नरेन्द्र ताम्रकार दुर्ग वाले  निजामुद्दीन स्टेशन तक छोड़ने आये. गोंडवाना एक्सप्रेस से मेरी टिकट थी रायपुर आने के लिए. उस समय गोंडवाना एक्सप्रेस दिल्ली से २.३५ पर छुटती थी. मैंने सोचा कि ट्रेन में बैठने से पहले घर एक फोन लगा लेता हूँ , लेकिन लाइन नहीं मिली, ट्रेन में मैने अपनी सीट संभाली और   के बाद अपना सफारी उतार कर हाफ पेंट और टी शर्ट पहन ली। मेरे कम्पार्टमेंट में कोई नहीं था खाली था तभी मेरे सामने सीट पर दो लोग और आ गए. ट्रेन ने चलते ही फुल स्पीड पकड़ ली. मैंने अपनी किताब निकाली और खिड़की के पास बैठ कर पढने लगा. उसी समय रेल की पटरी से रोड़ियां उछल कर खिड़की से अन्दर आकर मुझे लगी. खिड़की से थोडा दूर हो गया और सामने बैठे व्यक्तियों से बोला "यार लगता है आज ड्राईवर ने दो पैग ज्यादा ही चढा लिए, ट्रेन फुल स्पीड में चला रहा है"। 

मैं इतना कहा ही था कि जोर से आवाज आई और सब कुछ उल्टा पुल्टा हो गया. कुछ क्षण के लिए तो होश गायब कि ये क्या हो गया, मुझे लगा कि कोई भारी चीज मेरे ऊपर गिरी है, होश आने पर अपने आप को संभाला, तो देखा की एक आदमी जो साइड ऊपर सीट पर सो रहा था वो मेरे उपर गिरा हुआ है, मैं उसके नीचे दबा हुआ हूँ. मैं उसे हटाया देखा तो बोगी पलट गई थी. गनीमत थी के हमारी बर्थ दरवाजे के नजदीक थी. मैंने अपना सामान बेग उठाया और दरवाजे से लटक के बोगी के ऊपर पंहुचा तो,और जो पॉँच लोग थे उनको भी बोगी के उपर खींचा. देखा की ट्रेन के तीन टुकड़े हो गए हैं. १४ बोगीयां गिर गई थी.ऐसी बोगी बच गई थी उसके पीछे के पहिये ही उतरे थे. गाड़ी ड़ीरेल हो गयी , यानी पटरी से नीचे उतर गयी थी. नीचे पटरियां उखड़ गयी थी. और उन पर तार पड़े थे. मैं नीचे जमीन पर डर के मारे नहीं उतर रहा था मेरी बेकबोन में दर्द हो रहा था.

जब ट्रेन डिरेल हुई तो ऐसी बोगी नहीं गिरी थी, उसके पीछे तीन पहिए ही पटरी से उतरे थे,  तभी ऐसी बोगी दरवाजा खोल कर एक बंगाली बाहर निकला और बोला - क्या तमाशा लगा रखा है, इतनी देर से बोगी का ऍसी बंद है, कितनी गर्मी लग रही है? सवारी लोग गर्मी से बेहाल है, ऐसी चालु क्यों नहीं करते। ये उसकी बात वहां पीड़ित लोगों को नागवार गुजरी और उसके बाद उन्होंने उसको पकड़ लिया पीटने के लिए। एक बोला-" सुसरे! इतने आदमी मर गए एक्सिडेंट में और तुझे ऐसी की पड़ी है। तेरी बोगी गिरती तो तंदूरी मुर्गा बन जाता, मारो साले को।"  वह दरवाजा बंद करके  ऍसी बोगी में घुस गया तो बच गया नहीं तो उसका....... पता नहीं दुनिया में कैसे-कैसे लोग होते हैं? जब खुद पर बीतती है तब पता चलता है।

सांझ होने लगी. अँधेरा घिर रहा था. सुनसान बियाबान में खेतों के बीच में बल्लभ गढ़ के पास गैस की बड़ी-बड़ी टंकियां लगी हैं वहीँ पर गाड़ी गिरी थी.तभी एक ने कहा कि सर बिजली के तार टूटने से से इनमे करेंट का प्रवाह बंद हो जाता है. तब हम हिम्मत करके बोगी से नीचे उतरे, जब आगे गए और गिरी हुई बोगियों के पास तो बड़ी बुरी हालत थी. काफी लोग मारे गए थे, कुछ ने तो मेरी आँखों के सामने ही दम तोडा था. मैं वहां कुछ भी नहीं कर सकता था. असहाय खडा था.२ घंटे तक दिल्ली या आस पास के स्टेशनों से कोई सहायता नहीं आई. जबलपुर जाने वाली बोगी में बहुत सारे फौजी थे.उसमे ही ज्यादा मौत हुई थी. क्योंकि स्पीड होने के कारण पीछे की बोगियों में नुकसान जायदा हुआ था. 

गार्ड ने वहीं पर एक रेल्वे का टेलीफ़ोन कनेक्शन ढूंढा। एक टेलीफ़ोन का इंमरजेंसी सेट उसमें लगा कर पास वाले स्टेशन को दुर्घटना की सूचना दी। टीटी ने ट्रेन में चार्ट भी चेक नहीं किया था। मेरे पास कोई सबूत नहीं था, इस ट्रेन में सफ़र करने का। मैने टी टी को ढूंढा और उससे अपनी टिकिट पर लिखवाया कि मैं इस ट्रेन में हूँ। अगर कोई शारीरिक नुकसान बाद में पता चलता तो रेल्वे पर क्लेम करने वक्त वही टिकिट काम आती। चारों तरफ़ अफ़रा तफ़री मची हुई थी। आस-पास के गाँव वाले आ चुके थे। लेकिन 3 घंटे तक कोई रिलीफ़ नहीं आई, जबकि बल्लभगढ स्टेशन नजदीक ही था। ना कोई डॉक्टर ना कोई पुलिस या स्थानीय प्रशासन का नुमाईन्दा। मैं अपना बैग उठा कर पैदल ही चल पड़ा अँधेरा होने वाला था.बल्लभ गढ़ और दिल्ली वाले रोड पर पहुंचकर बस पकड़ी, उसने मुझे आश्रम वाले पुल पे उतारा, फिर वहां से बस पकड कर नार्थ एवेन्यू पंहुचा. 

वहां पर नरेन्द्र ताम्रकार ने मुझे वापस आये देखा तो उसे आश्चर्य हुआ कि अभी तो ट्रेन में बैठा कर आया था, वापस कैसे आ गये? मैंने उसे सारी घटना बताई, तब उसने टी वी चालू करके देखा तो न्यूज में दुर्घटना के बारे में बता रहा था. जब रेलवे स्टेशन पंहुचा तो वहां अपने-अपने परिजनों के विषय में लोग पूछ ताछ कर रहे थे लेकिन उन्हें कोई माकूल जवाब नहीं मिल रहा था. रेलवे वाले सीधे मुंह बात नहीं कर रहे थे. मैंने बड़ी मुश्किल से अपनी टिकिट वापस की, फिर मेरे एक मित्र ने सुबह हवाई जहाज की टिकिट बनवा दी, जिससे मैं अपने घर सही सलामत वापस आ गया. घर पर फोन नहीं लगने का एक फायदा ये हुआ कि उन्हें ये पता नहीं था कि मै इसी ट्रेन से आ रहा हूँ. नहीं तो घर में कोहराम मच जाता. इस दुर्घटना की उस दिन की टिकिट की फोटो स्टेट कापी एवं सभी अख़बारों की कापी आज भी मेरे संग्रह में है. एक यादगार के लिए, इस दुर्घटना के कारण मेरी पीठ में बेकबोन का दर्द आज भी सालता है. कहते हैं ना,

"जाको राखे सांईंया,मार सके ना कोय,
बाल ना बांको कर सके,जो जग बैरी होय"


NH-30 सड़क गंगा की सैर

24 टिप्‍पणियां:

  1. अब पोस्‍ट आ गई, आशा है पीठ का दर्द भी जाता रहेगा.

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  3. काश ऐसी त्रासदी कभी किसी के साथ न हो ... कल मैंने टी.वी. पर रेल दुर्घटनाओं के विडिओ देखें तो काफी दुःख हुआ . अचानक इमरजेंसी ब्रेक लगाकर ड्राइवर ने हजारों लोगों की जान खतरे में डाल दी ...

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  4. मलाल यह है कि सरकार किस भी हादसे के बाद मुआवज़े का ऐलान तो कर देती है परन्तु कोई भी सीख नहीं लेती है... कोई भी कोशिश इस ओर नहीं होती है कि आगे से ऐसे हादसों पर अंकुश लग सके...

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  5. जिस देश में रेल जैसा अहम महकमा बिना कैबिनेट मंत्री के कई महीने खाली पड़ा रहता है, वहां स्थिति की गंभीरता को समझा जा सकता है...

    ललित भाई वो एसी वाले बाबू मोशाय फिर कभी मिले या नहीं...

    जय हिंद...

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  6. चार दिन ले जगदलपुर म “लाईफ लाइन एक्सप्रेस”(इम्पेक्ट इंडिया के ट्रेन मोबाईल हॉस्पिटल) म रहेंव... कालीच आधा रात के पहुचेव आउ बिहिनियाच ए खबर ल पढेंव.....
    चाम्पा के हसदेव नदी म अहमदाबाद एक्सप्रेस दुर्घटना के प्रत्यक्ष दर्शी रेहेंव... समाचार आउ तोर पोस्ट ल पढ़ के फेर ऊही बेरा हर आंखी म घुमर गे... सिरतोन ईसन दुर्घटना झने होवय.... बड कल्लई होथे....

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  7. भय्वः दृश्य आपने स्वयं झेला है ... क्या गुज़रती होगी उन पर जो ऐसे हादसों को स्वयं देखते हैं और भागीदार होते हैं ...

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  8. वैसे ट्रेन दुर्घटना ही जरूरी नहीं हमारे देश में तो पग पग पर यही बोल बोलने की जरूरत पड़ती है। थैंक गॉड बचा लि‍या...
    "जाको राखे सांईंया,मार सके ना कोय,
    बाल ना बांको कर सके,जो जग बैरी होय"
    उज्‍जैन में टैम्‍पो, बसों के पीछे अक्‍सर लि‍खा दि‍खा - अकाल मौत वो मरे जो काम करे चंडाल का, काल उसका क्‍या करे जो भक्‍त हो महाकाल का। तो क्‍या उज्‍जैन में सड़क दुर्घटनायें या दुर्घटनायें नहीं होती ? और मरने वाले सभी चंडाल होते हैं ?

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  9. काश रेलवे विभाग से जुडे लोग अपनी जिम्‍मेदारी समझते !!

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  10. खुशदीप सहगल

    कहाँ मिलते भाई बाबू मोशाय,
    हम अपने रस्ते वो अपने रस्ते

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  11. दुखद होती हैं ऐसी घटनाएँ.... बुरी यादें और दर्द छोड़ जाती है.....

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  12. सशक्त लेख |
    आशा है अब तक स्वास्थ्य में सुधार हो गया होगा |
    आशा

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  13. कभी नहीं भूलने वाला हादसा ..
    ऐसे समय में भी लोगों की संवेदनहीनता दुखी करती ही है !

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  14. "जाको राखे सांईंया,मार सके ना कोय,
    बाल ना बांको कर सके,जो जग बैरी होय"

    achchhi prastuti ||

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  15. वाकई दुखद....ऐसी त्रासदी कभी किसी के साथ न हो ...

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  16. "जाको राखे सांईंया,मार सके ना कोय,
    बाल ना बांको कर सके,जो जग बैरी होय"
    बिलकुल सही कहा है आपने.... परन्तु क्या गुजरती होगी उनपर जिन्हें समय पर कोई सहायता भी नहीं मिल पाती होगी.... सोचकर ही रोंगटे खड़े हो जाते हैं.......

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  17. आठ-दस घंटों में दो भयानक रेल हादसे। सोचा था और कुछ तो कर नहीं पाएंगे, पर मृतकों के लिए दो मिनट का मौन तो रख ही सकते हैं। खुद तो रखा पर संदेश नहीं भेज पाया इंटरनेट के काम ना करने की वजह से।
    भगवान उनकी आत्मा को शांति प्रदान करें।

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  18. दुर्भाग्य है कि किसी छोटी गलती से इतनी बड़ी घटना हो जाती है।

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  19. इतने आदमी मर गए एक्सिडेंट में और तुझे ऐसी की पड़ी है। तेरी बोगी गिरती तो तंदूरी मुर्गा बन जाता, मारो साले को।" वह दरवाजा बंद करके ऍसी बोगी में घुस गया तो बच गया नहीं तो उसका....... "जाको राखे सांईंया......

    फर्जी डिग्रीधारी चालक संचालक चिकित्‍सक लेट पायलेट भी दुर्घटना का कारण है

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