मंगलवार, 1 जनवरी 2013

हलकट जवानी चिपकाले फ़ेवीकोल से …………ललित शर्मा


ऊंSSS अंSSSSअ अंSSSSअ अंSSSSअ अंगड़ाईयां लेती हूँ मैं जब जोर-जोर से, ऊ आह की आवाज आती है हरोर से, मैं तो चलुं इस कदर, मच जाए रे गदर, होश वाले भी मदहोश आए रे नजर, मेरे होठों कोSSS मेरे होठों को सीने से यार, चिपकाले  सैंया फ़ेविकोल से,मेरे होठों कोSSS मेरे होठों को सीने से यार, चिपकाले  सैंया फ़ेविकोल से,फ़ेविकोल से,फ़ेविकोल से, मै तो हाय मै तो कब से हूँ रेडी तैयार पटा ले सैंया मिस काल से ……… कोई प्रभाती सी गा रहा था, मेरी  नींद में खलल हुआ तो आँख खोल कर देखा। फ़ुल्ल मुड में चंदू गा रहा था यह गीत। नए साल की पहली किरण का स्वागत मिस काल से कर रहा था। नए गीतों से मेरा कोई सरोकार दूर-दूर तक नहीं रहा। हमारे जमाने में प्रेम गीत भी भजन सरीखे होते थे। हमारा गीतों का सफ़र कुंदनलाल सहगल से शुरु होकर मुकेश तक आकर खत्म हो जाता है। 

चंदू को गाने का अर्थ नहीं मालूम, क्या और कैसे लड़की पटाना मिस काल से? पर वह गाए जा रहा था मनोयोग से। इस तरह के गाने बच्चों की जुबान पर कुछ जल्दी ही चढ जाते हैं। चंदू को सुबह-सुबह गाने को लेकर डांटना भी ठीक नहीं। क्योंकि उसकी मॉम का वरद हस्त उसके उपर है। वह खुश  है उसका बेटा इतना बढिया गाता है कि हनी सिंग को पीछे छोड़ देगा। एक दिन उसका खूब नाम करेगा। कौन सुबह-सुबह मुसीबत मोल ले। कहावत है न - जेवन बिगड़गे त दिन बिगड़गे, डौकी बिगड़गे त जिनगी बिगड़गे। न मुझे नए साल का पहला दिन बिगाड़ना है न मुझे पूरा साल बिगाड़ना है। सलामती इसी में है कि चुप पड़े रहो। अगर गाने की तारीफ़ नहीं कर सकते तो कुछ न बोलो, इस कान से सुनो और उस कान से निकाल दो।

चंदू का इसमें क्या दोष है? वह तो अबोध है। जो उसने सुना और उसे गा दिया। एक दिन गा रहा था …… बापु! मेरा ब्याह करवा दे, अब होता नहीं गुजारा। अब इसे क्या पता कि ब्याह क्या होता है। बस गाने की धुन अच्छी लगी और गाने के बोल पकड़ लिए। फ़िर कई दिन गाते रहा। जिन बच्चों ने बचपन से इन फ़िल्मों को देखा हो, इनके गाने गाए हो। उनसे क्या अपेक्षा रख सकते हैं संस्कारों की।सं स्कारों की बात करोगे तो पुरातनपंथी कहलाओगे। बच्चों के सामने ज्ञान झाड़ोगे तो कह देगें - चाचा तुम्हारा दिमाग सड़ गया है। अब हमारे पास आकर बदबू न फ़ैलाए करो। अगर इज्जत की सलामती चाहते हो तो हमारे में ही रळ-मिळ कर रहो। इसी में तुम्हारी भलाई है। बुढापे में दो टैम की रोटी भी मिल जाया करेगी मक्खन मार के, दूध-दही के साथ। नहीं तो कोई तुम्हारा हुक्का भी भर के लाने वाला नहीं मिलेगा।

दिसम्बर के आखरी दिनों में एक स्कूल के वार्षिकोत्सव में लोगों ने पकड़-धकड़ कर मुख्यातिथि बना दिया। मैने भी सोचा कि चलो एक दिन बच्चों के बीच रहने का मौका मिलेगा। वार्षिकोत्सव प्रारंभ हुआ तो पहला ही कार्यक्रम रिकार्डिंग डांस का था। जिसे 10-12 साल की लड़कियाँ प्रस्तुत कर रही थी। आजाSSS आजाSSS जरा सरक लेSS आजा जरा बहक लेSSS सैंया जरा छलक लेSS हायSS आके मोसे लिपट लेSS टेढा शहर है इससे न कर छेड़कानीSS हाय के नॉटी कहानी ये हलकट जवानी। बस बस गीत सुनकर ही सीटियों की आवाज आने लगी। बच्चों  के माँ-बाप भी खुश थे कि उनकी मेहनत सफ़ल हुई। लड़कियों ने भरपुर परफ़ार्मेंस दिया है। अगर हम 20 बरस पीछे ही  चले जाएं तो हलकट जवानी शब्द को अश्लील ही मानेगें। लेकिन जमाने में बदलाव के साथ यह शब्द आज मंचों पर स्थान पाकर सम्मानित हो रहा है।

कुछ वर्षों पूर्व तक जो चीजें या कार्य असम्मानित मानकर वर्जित किए गए थे, वर्तमान समय में उनका प्रचलन इतना अधिक हो गया है कि सब कुछ सामान्य सा लगता है। सारी वर्जनाएं टूट रही हैं। समाज में बदलाव आ रहा है। स्त्री-पुरुष आधुनिकता एवं बराबरी होड़ में अपने संस्कारों के साथ अन्य बहुत कुछ गंवाते जा रहे हैं। इसी के फ़लस्वरुप हमें नित नए हादसे निरंतर सुनाई एवं दिखाई देते हैं। हम जब स्कूल में पढा करते थे तब लड़कियों के बराबर ही लड़कों का ध्यान रखा जाता था। दिन ढलने के पूर्व घर पहुंचना जरुरी था। कहाँ जा रहे हैं इसकी सूचना पहले ही घर पर देनी पड़ती थी। आज तो लड़के-लड़कियाँ ही घर में कब आ रहे हैं कब जा रहे हैं, इसका पता ही माँ बाप को नहीं चल पाता। कोई दुर्घटना या अनहोनी हो जाए तो ही पता चलता है कि फ़लां जगह गए थे।

भौतिक युग में कुछ अधिक कमाने के चक्कर में माँ-बाप दोनो नौकरी पेशा हैं। दुर्घटनावश बच्चे हो जाते हैं तो उनकी परवरिश करने के लिए उनके पास समय नहीं है। संयुक्त परिवार में तो दादा-दादी, चाचा-चाची सबकी निगाह रहती थी। साथ ही वे भी चौकस रहते थे बच्चों के प्रति तथा बच्चे भी अपने बड़ों से संस्कार पाते थे। वर्तमान जमाना तो सिर्फ़ यारबाजी का हो कर रह गया है। बाप को बेटा यार कहता है तो माँ बेटे को यार कहती है। बहन-भाई आपस में यार का संबोधन देते हैं एक दूसरे को। बड़ा ही खराब लगता है सुनकर। एक नयी ही संस्कृति का चलन हो गया है। बाप की गर्लफ़्रेंड है तो माँ को भी ब्वायफ़्रेंड से कोई गुरेज नहीं। न तू मेरे आड़े न मै तेरे आड़े आऊँ। माँ-बाप की बेखबरी से बच्चे भी यारबाज संस्कृति में पल रहे हैं। उनके भी यार हैं, जब चिड़िया उड़ जाती है तब पता चलता है कि फ़लां के साथ गायब हो गया / हो गयी। आज तो यह आलम है कि बच्चे की हरकतों के विषय में सारे मोहल्ले  को पता रहता है सिर्फ़ माँ-बाप को ही जानकारी नहीं रहती। जब कुछ बिगाड़ हो जाता है तब होश आता है।

बच्चों को संस्कार देने की जिम्मेदार पालक के साथ-साथ समाज की भी है। अगर बच्चा कोई अपराध करता है तो उसके माता-पिता के साथ उसका परिवार और समाज भी शर्मशार होता है। इसलिए वर्तमान समय हो रहे अपराधों का दोषी समाज ही है। कुसंस्कारों  की प्रदूषित बयार सब को संक्रमित कर रही है। कहा जाए तो समझ लो कुंए में ही भांग पड़ी है। अगर समाज को प्रदूषण से बचाना है तो सभी को अपनी नैतिक जवाबदारी समझ कर कुंए से भांग की सफ़ाई करनी पड़ेगी। यह एक महती जिम्मेदारी है। जिसका निर्वहन प्रत्येक नागरिक को करना पड़ेगा। अन्यथा देर हो जाएगी और आने वाली पीढी लिए प्रदूषित वातावरण छोड़कर जाएगें तो उनका भविष्य खराब होगा और तुम्हे इतिहास माफ़ नहीं करेगा। अस्तु समय रहते चेतना होगा।

24 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही विचारणीय तथ्य आपने उठाए हैं ललित जी, माँ - बाप जानबुझकर अंधे हुए जा रहे हैं अब तो। अगर आपने वर्जनाओं की बात की तो आपको पिछड़ा और दकियानूसी कहकर खारिज कर दिया जाएगा। कैसी हवा चली है, जाने क्या होगा नई पीढ़ी का?

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  2. मुझे घर भी बचाना है वतन को भी बचाना है... ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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  3. बड़े ही वाहियात गाने बनने लगे है आज कल ..खुद को ही शर्म आ जाती है

    वैसे बढिया रिपोर्टिंग है

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  4. Dr.Madhulika Mishra Tripathi

    bahut uttam lekhan hai....vicharneey prashn samne aae hein,is post me jin par samy rehna chetna hoga..varna humri peedhi ka bhavishy gart me hoga.

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  5. इन सब गानों\विज्ञापनों के बीच नाचती लहराती बच्चियों और इठलाते इतराते मां बाप को देखकर अपने पिछड़े होने की बात ही सही लगती है और ...और जाने दीजिये आजकल वैसे भी समाज की मानसिकता बदले जाने की सलाहों का दौर है।

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  6. We are going through a phase where society is trying to break free from the taboo of Sex. It is inevitable. Every family tries and want children to be well looked after and to be well behaved.
    We will have to resolve that if a girl/ lady is harassed due to sexual reason then there is no justification for it - it does not matter what she wears, where does she go or what is her profession or socioeconomic status. Zero tolerance without any possible justification for such misdeed only will curtail this heinous trend in our society.
    Don't worry about such songs they will not last, it is a passing phase and will just pass by . Senegal and makeshift Saab songs will last for much longer.

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  7. नव वर्ष मंगलमय हो,सार्थक प्रस्तुति . हार्दिक आभार हम हिंदी चिट्ठाकार हैं

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  8. ये सांस्कृतिक प्रदूषण समाज को कहीं का नहीं छोड़ेगा|

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  9. स्वतंत्र शब्द में तंत्र शब्द की अनदेखी के कारण ही यह हाल है यदि तंत्र जो कि एक व्यवस्था की ओर संकेत करता है को हम माने तो दुर्घटनाओं में अपने आप कमी आएगी

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  10. tv ने हमारे समाज को जितना खोकला किया हैं उतना शायद ही किसी ने किया हो ..एक भी कार्यकर्म ऐसा नहीं आता जिसमे अश्लीलता न समाई हो ..ऊपर से बेहुदा गाने बजने लगे हैं ..हमारे गायकारों को तो लकवा मार गया हो ...और तो और आजकल की add तो होती ही अश्लील है ... इस सब लिए भी समाज को आवाज उठानी ही पड़ेगी और ये उचित समय भी है।
    एक सार्थक रचना ...

    यहाँ पर आपका इंतजार रहेगा शहरे-हवस

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  11. संस्कार देना बड़ों का कर्त्तव्य है, आज हमने कुछ नहीं किया तो इतिहास माफ़ नहीं करेगा और भविष्य के सवाल का जवाब हम नहीं दे सकेंगे...

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  12. स्कूलों में सांस्कृतिक कार्यक्रम के नाम पर ऐसे गानों पर अभ्यास नहीं होना चाहिए। इसके लिए प्रबंधतंत्र, प्रधानायार्य और सभी अध्यापक दोषी हैं। अभिभावकों को भी विरोध करना चाहिए।

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  13. sanskrutik pradushan ke karan hi samj ki ye halat hai..ham poorv aur paschim ke beech jhool rahe hai..sundar post.

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  14. अब संस्कार विदेश से तो आने वाले नहीं. जो बुओगे वाही फसल में पाओगे.

    सार्थक चिंतन.

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  15. बहुत उम्दा,सुन्दर व् सार्थक प्रस्तुति
    नब बर्ष (2013) की हार्दिक शुभकामना.

    मंगलमय हो आपको नब बर्ष का त्यौहार
    जीवन में आती रहे पल पल नयी बहार
    ईश्वर से हम कर रहे हर पल यही पुकार
    इश्वर की कृपा रहे भरा रहे घर द्वार.


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  16. एकदम सच्ची बात है--आज हम खुद दिशाहीन से हो गए है ..ध्रतराष्ट्र बने है फिर कैसे हम अपनी ही संतानों को दिशा दिखायेगे ...पहले हमें हमारी पीढ़ी को सुधरना होगा ..बदलाव तभी संभव है ..यही कह कर हाथ झटक लेना ही काफी नही है ..पहले खुद सुधरे फिर ही समाज सुधरेगा ..पहल पहले खुद से करे ..तभी एक सुखद समाज बन पायेगा

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  17. आज की सामाजिक परिस्थिति के लिए एक वर्ग को जिम्मेदार नहीं माना जा सकता है. इसके लिए परिवार, माता पिता ,शिक्षण संस्थाएं ,समाज और विशेष कर फिल्म और टेलीविज़न जिम्मेदार है." हलकट जवानी ........" जैसे गाने पहली तो सेंसर बोर्ड se पास नहीं होना चाहिए और अगर होजाता तो पब्लिक को चाहिए की इस प्रकार अश्लील भाषा का विरोध करे.फिल्म का विरोध करें. शिक्षक को चाहिए कि ऐसे गाने स्कूल में प्रतिबंधित करें ." लेकिन कोई यह सोच कर कि- हमें लोग बेकवार्ड कहेंगे -विरोध नहीं करते . इसमें बच्चों का कोई दोष नहीं.

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  18. सही कहा है आपने ललित जी....हम तो खुद भुक्तभोगी है....किसी बात से मना करो तो बच्चा तो बच्चा...उनके माँ -बाप ही उनके हिमायती बन खड़े हो जाते हैं...ऐसे में सुधार या संस्कार की बात बेमानी -सी लगने लगती है..

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  19. ..बहुत चिंताजनक बात है ....अब तो लगता है जैसे संस्कारों की बाते तो गुजरे ज़माने की बाते हो चली हैं!! आज की पीढ़ी को जाने कहाँ ले जाकर छोड़ेंगे ये सब फ़िल्मी नाच-गाने ..भगवान् ही जाने!!

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  20. एकदम बढ़िया बहुत ही विचारणीय, सटीक बात कहता सगर्भित एवं सार्थक आलेख...:)मज़ा आया आपकी यह पोस्ट पढ़कर खास कर कुएं में भाग वाली बात ...:)

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  21. यह प्रदूषण ही धीरे धीरे अपने पाँव पसारता है।

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  22. बहुत ही उत्तमप्रस्तुति करण है आदरणीय सर जी.. अब बीड़ी जलाई ले जिगर में पिया .. आएँगे तो बेचारे हार्ट स्पेशलिस्ट क्या करेंगे.. वैसे यह सब स्वीकार किया जा रहा है इस लिए बनाना उचित नही है.. बल्कि लेखकों को भी मर्यादा का भान रखना चाहिए

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