सोमवार, 7 जनवरी 2013

बलात्कार: कैसी सभ्यता एवं कैसा गर्व?


को जघन्य अपराध घटित होकर जब बड़े पैमाने पर मीडिया में तवज्जो पाकर चर्चित हो जाता है तो कानून की खामियों एवं पुलिस के रवैये को लेकर बहस चल पड़ती है। जन भावनाओं का उभार सातवें आसमान पर होता है। कड़े से कड़े कानून और सजा की मांग होने लगती है। जब तक मुद्दा हवाओं में गर्म रहता है तब तक लोगों की सोच एकांगी रहती  है। जो खबरें अखबारों के भीतर के पृष्ठों में भी जगह नहीं पाती थी वे प्रमुखता से मुख्य पृष्ठ छापी जाती  हैं। दिल्ली गैंग रेप कांड एक ऐसा घृणित एवं जघन्य कार्य है जिसने मानवता को शर्मसार करने में कोई कसर बाकी नहीं रखी। विद्यार्थियों के स्वस्फ़ूर्त आन्दोलन ने सरकार को हिला कर धर दिया। इंडिया गेट से बलात्कारियों के विरुद्ध कड़ा कानून बना कर मृत्यु दंड की मांग उठने लगी। जिससे बलात्कारियों में भय व्याप्त हो और कोई भी यह घृणित अपराध करने के विषय में सोचे ही ना।

मृत्यु दंड से बड़ी कोई सजा नहीं है। मृत्यु का अर्थ है जीवन का अंत। दिल्ली के आन्दोलन का असर गाँव-गाँव तक हुआ। गैंगरेप की घटना का मीडिया में प्रसारित होने के कारण गाँवों में भी लोगों ने मोमबत्ती जला कर बलात्कारियों के विरुद्ध अपना रोष प्रगट किया। बलात्कार जैसे घृणित अपराध के विरुद्ध भारत की आम जनता उठ खड़ी हुई। नेताओं की बयान बाजी और कड़े कानून के समर्थन एवं विरोध में बयान आने लगे। लेकिन इसके घटना के बाद भी दिल्ली एवं देश के अन्य भागों में बलात्कार थमें नहीं। बलात्कार के समाचारों से अखबार भरे पड़े रहते हैं। बलात्कार  के समाचारों की बाढ देखकर ऐसा लगता है कि बलात्कारियों में अभी तक कानून का भय नहीं बन पाया है। राजधानी में भी बलात्कार की घटनाएं नित्य जारी हैं। हालातों को देखते हुए प्रतीत होता है कि स्त्री की अस्मिता घर, बाहर, भीतर कहीं भी सुरक्षित नहीं है। 

ऐसा क्यों हो रहा है? बलात्कार के पीछे क्या मानसिकता काम कर रही है? जिससे ये घटनाएं रुक नहीं पा रही। इसके लिए समाज के प्रबुद्ध लोगों को चिंतन करने की आवश्यकता है। इस जघन्य अपराध के कारकों के मूल में जाना होगा। अगर बलात्कार के कारणों की ओर जाएं तो सबसे पहले सांस्कृतिक प्रदूषण ही सामने दिखाई देता है। तथाकथित आधुनिकता की भेंट वर्तमान समाज चढता जा रहा है। एक जमाना था जब गाँव के किसी एक व्यक्ति की बेटी को सारा गाँव बेटी ही मानता था चाहे वह किसी भी जाति या धर्म से संबंध रखती हो। गाँव के लोग सभी का ध्यान रखते थे। परिवारों के विघटन एवं एकलखोरी के बाद सारी सम्वेदनाएं  एवं चितांए भौतिकता एवं पश्चिमी बयार की भेंट चढ गयी। अब किसी को किसी से कोई मतलब नहीं है। कौन क्या करता है, वह जाने और कुंए में पड़े।

यात्री वाहनों में लिखा रहता है कि "यात्री अपने समान की सुरक्षा स्वयं करे।" मैं इसे सही मानता हूँ। जिसका सामान है उसे सुरक्षा स्वयं करनी चाहिए। दूसरा कोई व्यक्ति आपके सामान की सुरक्षा क्यों करेगा? उसे भी तो अपने सामान की सुरक्षा करनी है। माता-पिता और पालक को ही ध्यान रखना है कि उसका बच्चा कहीं गलत संगत में तो नहीं पड़ गया। वह कैसा आचरण कर रहा है। क्या पहन रहा है क्या खा-पी रहा है। कहाँ जा रहा है? रात को कितने बजे घर वापस आ रहा है? अपने बच्चे का ख्याल स्वयं नहीं रखोगे तो कौन रखेगा? शास्त्र भी कहते हैं - लालनाद बहुवो दोषा: ताड़नाद बहुवो गुणा:। ताड़न करना चाहिए अर्थात ध्यान रखना चाहिए। अगर पालक या माता-पिता इससे विमुख हो जाते हैं तो समझो "सावधानी हटी दुर्घटना घटी"।

पब, मॉल, डिस्को, फ़िल्में, टीवी के माध्यम से पश्चिमी बयार द्वारा सांस्कृतिक प्रदूषण इतना अधिक फ़ैल गया है कि माँ-बहन-बुआ जैसे आत्मीय सम्बोधन ही लोगों को पुरातनपंथी लगने लगे हैं। अधेड़ उम्र की स्त्री भी आज अपने को माँ कहलाना पसंद नहीं करती। मैडम जैसे भावहीन सम्बोधन प्रचलन में आ गए हैं। कहावत है कि जैसा खाओगे अन्न, वैसा होगा मन, जैसा पीयोगे पानी, वैसी होगी वाणी। इसका अर्थ यही है जैसे सम्पर्कों में आप रहेगें वैसा ही वर्ताव आप करने लगेगें।प्रकृति ने स्त्री-पुरुष में परस्पर आकर्षण बनाया है। विपरीत लिंग होने के कारण एक-दूसरे के प्रति आकर्षण बना रहता है। यह नैसर्गिक प्रतिक्रिया है और इससे कोई इंकार भी नहीं कर सकता। सृष्टि को चलाने के लिए आकर्षण अत्यावश्यक भी है।   

समाज में बदलाव आ रहे हैं, खुलेपन का प्रचार, प्रसार के उपलब्ध सभी माध्यमों से हो रहा है। फ़िल्में, साहित्य, टीवी, इंटरनेट इत्यादि से सांस्कृतिक प्रदूषण फ़ैल रहा है। फ़िल्मी हिरोईनों की नंग धड़गं तश्वीरें, विज्ञापनों में अश्लीलता चरम सीमा पर हैं। इन सबका असर समाज पर प्रत्यक्ष दिखाई दे रहा है। युवा पीढी को दिशाहीन करने में प्रचार-प्रसार के माध्यम मुख्य भूमिका निभा रहे हैं। उत्तेजक वस्त्र, उत्तेजक गाने, उत्तेजक संगीत, उत्तेजक व्याख्यान, उत्तेजक हरकतें, उत्तेजक फ़िल्में, उत्तेजक वातारण, उत्तेजक पेय पदार्थ, उत्तेजक संवाद, उत्तेजक साहित्य, उत्तेजक विज्ञापन आदि मूल में उत्तेजना है। यही उत्तेजना समाज का बेड़ा गर्क कर रही है। अगर उत्तेजना फ़ैलाने वाले कारक न हों तो बलात्कार जैसी घटनाओं में नि: संदेह कमी आएगी। सबसे अधिक तो समाज का सत्यानाश टीवी चैनलों पर आने वाले विज्ञापन कर रहे हैं। ऐसा कोई भी उत्पाद नहीं है जिसमें महिला माडल का प्रयोग न किया गया हो। न्यूनतम उत्तेजक वस्त्रों में विज्ञापन भी कुत्सित मानसिकता को जन्म देते हैं।

कुछ दिन पहले की बात है, लगभग 8 बजे रात को चौराहे पर लाल बत्ती होने के कारण रुकना पड़ा। बाईक से बगल में आकर एक बुजुर्ग भी रुके, सामने स्कूटी पर दो लड़कियाँ थी, दोनों ने "लो वेस्ट जींस" पहन रखी थी। पिछली वाली के नितंब आधे बाहर थे। बुजुर्ग ने उनसे कहा "बेटी जरा शर्ट ठीक कर लो"। लड़की ने पीछे मुड़कर घूर कर बुजुर्ग को ऐसा देखा जैसे कच्चा चबा जाएगी और शर्ट को नीचे खींचने लगी। शर्ट भी इतनी छोटी थी कि खींचने के बाद भी नितंबों को नहीं ढक पाई। वर्तमान में "लो वेस्ट" जींस का चलन बढा है, जिसमें पहने के बाद पैंटी से लेकर आधे नितंब भी दिखाई पड़ते हैं। यह खुला पन आधुनिक सभ्य होने का प्रतीक है। अब कोई व्यक्ति इनके विषय में क्या धारणा बनाएगा। अगर कहीं पार्क के अंधेरे कोने में अपने ब्याय फ़्रेंड के साथ अश्लील हरकते करते हुए दुर्घटना घट जाती है तो इसका जिम्मेदार कौन होगा? स्त्रियों को भी अपने पहनावे और आचरण की ओर ध्यान देने की आवश्यकता है।

विश्लेषणों से पता चला है कि अधिकतर अपराध नशे की हालत में किए जाते हैं। पुरुषों की बराबरी की होड़ में स्त्री भी वही सब कर रही है जो पुरुष करते हैं। युवाओं में नशे का प्रसार बड़ी तेजी से हो रहा है। लड़के हो या लड़कियाँ पार्टियों के दौरान बीयर या शराब पीना आम बात हो गयी है। या फ़िर अन्य नशे का सहारा लिया जाता है। हुक्का पार्लरों में खुले आम लड़के लड़कियाँ धुंवा उड़ाते देखे जाते हैं। शराब की नदियाँ बह रही हैं। वर्तमान में समाज के हालात ये हो गए हैं कि भाई, बहन के साथ, चाचा, भतीजी के साथ,  बेटा, माँ के साथ, बाप, पुत्री के साथ बलात्कार कर रहा है। रिश्तों की पवित्रता कलंकित होने के साथ सारे रिश्ते छिन्न-भिन्न हो रहे हैं, समाज  ही गर्त  में जा रहा है। रिश्तों की पहचान ही खत्म होती जा रही है, क्या यही सभ्यता है? जिस पर तथाकथित समाज को गर्व है। सभ्य होने के जो पैमाने समाज ने निर्धारित कर रखे हैं वे टूटते जा रहे हैं। बलात्कार जैसे कलंक को स्त्री एवं उसके परिजनों को सारी जिन्दगी भोगना पड़ता है।

सरकार कानून बना सकती है, न्यायालय द्वारा अपराधी घोषित करने पर दंड दे सकती है। लेकिन यह सब होने के बाद भी क्या बलात्कार जैसे घृणित अपराध रुक पाएगें? तीन दशक पूर्व गीता और संजय चोपड़ा हत्या कांड के आरोपी रंगा-बिल्ला को वर्तमान कानून के तहत ही फ़ांसी की सजा दी गयी थी। कानून का दुरुपयोग करने वालों की भी कमी नहीं है। यौन प्रताड़ना एवं दहेज कानूनों के दुरुपयोग के मामले सामने आए हैं। लोगों ने अपनी दुश्मनी निकालने के लिए इन कानूनों का व्यापक दुरुपयोग किया है। जमीन जायदाद इत्यादि के विवाद होने पर निर्दोष व्यक्ति भी फ़ंसा दिए जाते हैं। इसलिए सभी पहलुओं पर चिंतन करने की आवश्यकता है। बलात्कार जैसे जघन्य अपराध को रोकने के लिए समाज को स्वयं आगे आकर जिम्मेदारी संभालना होगा।। अपनी सामाजिक जिम्मेदारी समझकर उचित कदम उठाना पड़ेगा। बलात्कार करने वाला भी किसी स्त्री द्वारा ही जन्म देकर पाला-पोसा गया होता है। बलात्कार के दंश से पीड़ित होने वाली भी स्त्री ही होती है। इसे रोकने के लिए मर्यादित आचरण की आवश्यकता है। स्वच्छंद आचरण करने वालों पर घर से ही रोक लगानी होगी। उन्हे शिक्षित कर मर्यादापूर्वक आचरण करना सिखाना होगा। तभी समाज में कुछ बदलाव आ सकता है।

(लेखक के निजी विचार हैं आवश्यक नही कि सभी लोग इससे सहमत हों। नवभारत टाईम्स से एक सलाह शेयर की है)

16 टिप्‍पणियां:

  1. यात्री वाहनों में लिखा रहता है कि "यात्री अपने समान की सुरक्षा स्वयं करे।" मैं इसे सही मानता हूँ। जिसका सामान है उसे सुरक्षा स्वयं करनी चाहिए। दूसरा कोई व्यक्ति आपके सामान की सुरक्षा क्यों करेगा? उसे भी तो अपने सामान की सुरक्षा करनी है। माता-पिता और पालक को ही ध्यान रखना है कि उसका बच्चा कहीं गलत संगत में तो नहीं पड़ गया। वह कैसा आचरण कर रहा है। क्या पहन रहा है क्या खा-पी रहा है। कहाँ जा रहा है? रात को कितने बजे घर वापस आ रहा है? अपने बच्चे का ख्याल स्वयं नहीं रखोगे तो कौन रखेगा? शास्त्र भी कहते हैं - लालनाद बहुवो दोषा: ताड़नाद बहुवो गुणा:। ताड़न करना चाहिए अर्थात ध्यान रखना चाहिए। अगर पालक या माता-पिता इससे विमुख हो जाते हैं तो समझो "सावधानी हटी दुर्घटना घटी"।
    आप फिर स्त्रियों की तुलना सामान से कर रहे हैं। (आपत्तिजनक) यही तो सारे रोगों की जड़ है कि स्त्री को वस्तु समझा जा रहा है। उसे इंसान समझा जाए तो ये घटनाएँ समाज से गायब हो जाएंगी।

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  2. दिनेशराय द्विवेदी - सामान का आशय वस्तु से नहीं लगाया जा रहा है। यहाँ इसे इज्जत के संदर्भ में लिया गया है और इज्जत की रक्षा करने की जिम्मेदारी माँ-बाप से लेकर सारे परिवार की बनती है।

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  3. कानूनों की कठोरता भ्रष्टाचार बढा सकती है। ऐसे अपराधों को रोकने के लिये पारिवारिक संस्कारों की खास भूमिका है जिनका निरंतर पतन हो रहा है।

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  4. ऐसे हादसों में मुख्य भूमिका हमारे समाज का दोहरा नियम है |जिसमे लड़के के लिए अलग नैतिक मूल्य और लड़कियों के लिए अलग निर्धारित कर रखे हैं समाज ने | यदि परिवार में नैतिक मूल्यों का पाठ अपने बेटों को सिखाया जाये तो ऐसी घटनाएँ जन्म ही न लें , माना , नारी परिधान में उतेज़क पहनावे पश्मिकरण की होड़ है ,परन्तु जहाँ २.साल और ४ साल की बच्चियों के साथ ,बुजुर्ग महिलाओं के साथ ऐसी हादसे होते उनका क्या परिधान गलत हुआ है नहीं , सारी जड़ है बेटों को खुली आज़ादी देना और वही उच्श्रीन्ख्लता आगे जाकर ऐसी हैवानियत को जन्म देती है | खान - पान शराब ये सब बनावटी बातें हैं कभी सुना है किसी शराबी ने शराब की नशे में खुद का अहित किया हो ? समाज का हर मां- बाप यदि अपने बेटियों के साथ बेटों में भी सही नैतिक शिक्षा डाले तो ऐसी घटनाएँ जरुर कम होंगी |

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  5. ललित जी, स्पष्ठ्वादिता में विश्वास रखता हूँ। कुछ बाते स्ट्रेटफॉरवर्ड वे में कहना चाहूँगा ;
    1) देने को तो हम न जाने क्या-क्या संस्कृति की दुहाइया देते फिरते है, मगर लोग टुच्चे है (ज्यादातर ) मानसिकता निहायत टुच्ची है। मा-बाप जैसे संस्कार बच्चों के समक्ष पेश करेंगे, उनपर वे काफी हद तक परिलक्षित होंगे।
    2) जब लोगो की मानसिकता निम्न दर्जे की है तो सरकार कहाँ से भली आयेगी? क्योंकि सरकार चुनते तो यही लोग है। यह कह देना सही नहीं है कि सरकार तो सर क़ानून ही बना सकती है, और क्या कर सकती है? सरकार सब कुछ कर सकती है यदि उसमे इच्छा शक्ति हो। लोकतंत्र में सरकार का मतलब ही यह होता है समाज के लिए क्या अच्छा है और क्या बुरा उसके समीक्षा करे और उसके अनुसार प्रतिपादित करे। अब आज की ही हेडिंग आपने पढी होगी की 6 साल की बच्ची के साथ दुष्कर्म और फिर उसकी ह्त्या के आरोपी को मौत की सजा से सुप्रीम कोर्ट ने बरी कर दिया क्योंकि वह 18 साल से नीचे की उम्र का था। अब इन्हें कौन पूछे की उस 6 साल की बच्ची का क्या जीने का हक़ नही था इस देश में ? क्या यही घटना इन जजों , सत्ता में बैठे इन लोंगो के किसी परिजन के साथ कोई 18 साल से कम उम्र का अवयस्क करता तो तब ये क्या यही तरीका अपनाते ? वक्त और आवश्यकता के हिसाब से क्यों नहीं इन्होने क़ानून संसोधित किये ? प्रतिभा पाटिल ऐसे 5 जघन्य बलात्कारियों और कातिलों को माप कर गई, जिन्हें जीने का कोई हक़ नहीं था। सिर्फ इसलिए की उसका नाम सबसे उदार्दिल राष्ट्पतियों की सूची में गिना जाएगा। अगर यही वाकिया उन्होंने इनके किसी परिजन के साथ किया होता तो क्या तब भी ?
    3. जिम्मेदारी सबकी है, महिलाओं की भी है। पिछले 60-65 साल से जिन सरकारों ने इस देश का बेडा गरक किया उन्हें बढ़-चढ़कर वोट इन्ही महिलाओं ने डाला। अभी कल नोएडा की 21 वर्षीय युवती की ह्त्या के केस का गहराई से अवलोकन कर रहा था, पुलिस ने ह्त्या और बलात्कार के आरोप में जिसे गिरफतार किया है कहा जा रहा है की वह उस युवती का सहकर्मी ही था और शादीशुदा था। चूंकि युवती दलितवर्ग से संबद्द थी अत : वहां कुछ पिछड़े वर्ग योग के लोग भी यी और कुछ लोग यहाँ तक टिपण्णी कर रहे थे कि दिल्ली वाले केस में तो इतना हो-हल्ला हुआ और यहाँ नहीं हो रहा क्योंकि युवती पिछड़ी जाती की है। मैं यही कहूंगा की यह भी उसी घटिया सोच का ही नमूना है। दिल्ली के केस में जिस प्रेमी जोड़े के साथ दरिंदो ने दरिंगी दिखलाई उसमे और इस केस में फर्क है। इसलिए जनता का उबाल दिल्ली वाले केस में जो था वह हो सकता है की इस केस में न रहा हो। नौएडा वाले केस में किसी निष्कर्ष पर पहुंचना हालांकि अभी जल्दबाजी होगी लेकिन जो मुझे लगा वह यह था कि युवती की उस सहकर्मी से पहचान थी और शायद एक हद से ज्यादा थी, इसी लिए क्योंकि वह युवक पहले से शादीसुदा था अत : उसे डर था की जिस तरह आजकल देश में कठोर कानूनों की बात हो रही है कही बाद में पता चलने पर यह युवती उसे भी अन्दर न करवा दे। शायद इसीलिये उसने ऐसा कदम उठाया। तो कहने का आशय यह है की महिलाओं खासकर युवतियों को भी एक हद से आगे बढ़ने से पहले युवक के बारे में पूरी जानकारी हासिल कर लेनी चाहिए ताकि बाद में ऐसे हादसे /वाकिये न हो। एक और घटना का जिक्र करूंगा जो दिल्ली और एनसीआर से ही सम्बद्ध है और कुछ समय पूर्व हुई थी। आपने भी शायद अख़बारों में पढ़ा होगा की एक युवक(पूर्व प्रेमी) इकतरफा प्यार में ( जोकि उस युवती का चचेरा देवर था, और घटना के पहले दिन वह युवती उसके साथ बाजार घूमने भी गई थी ) उस युवती के पति को मारकर लाश बक्से (बेड ) में बंद कर दिया था , और फिर गाजियाबाद जाकर उसके पिता, उसकी बहन को भी मारकर खुद खुद्कुसी कर ली थी। टिपण्णी लम्बी हो गई लेकिन कहने का आशय यह है की महिलाओं को भी आज के समाज और आबो-हवा के हिसाब से विवेक से काम लेने की जरुरत है। जो अफसोसजनक ढंग से कम ही देखने को मिलता है।

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  6. इसे रोकने के लिए मर्यादित आचरण की आवश्यकता है। स्वच्छंद आचरण करने वालों पर घर से ही रोक लगानी होगी। उन्हे शिक्षित कर मर्यादापूर्वक आचरण करना सिखाना होगा। तभी समाज में कुछ बदलाव आ सकता है।
    भय व निंदा का कुछ कुछ असर होता है साथ ही मर्यादाओँ के महत्व के प्रसार से अधिक फायदा होने की सम्भावना है, स्वच्छंदता के मनमौजी प्रचारक और स्वतंत्रता या पक्षपात को बहाना बनाकर इन स्वच्छंदताओँ को उकसाने वाले तत्व ही इस समस्या के मूल में है.जो प्रथम दृष्टि स्वतंत्रता के हितेषी नजर आते है पर है ये सभी अनुशासनहीनता के समर्थक.
    चमडे का प्रचार बढेगा तो चमार ही अधिक पैदा होंगे. उस समाज मेँ श्रेष्ठ चमडा ही उपकृत किया जाएगा. चमडे के ही विक्रेता होंगे चमडे के ही परीक्षक और खरीददार भी. ऐसे में रिश्ते नाते खत्म होंगे ही,सभी की मानसिकता चमडे पर शुरू होगी और चमडे पर समाप्त.

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  7. मर्यादा रखना----बहुत कुछ सही है ...और यह भी की हम सब उसका पालन करे --पर जब जैसा देश वैसा वेश हो तो कपड़ो की मर्यादा मेरी समझ के परे है---फिर भी कपड़ो के द्वारा ज्यादातर सेक्स परोसा जाता है यह बात सही है ...पर कई बार सभ्य सोसायटी की अर्धनग्न लडकियो का खामियजा नादान और भोली भाली लडकियां ही बनती है

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  8. Charity begins at home. Yah sab ghar se hee shuru hona chahiye. Bap apana aacharan sudhare. Ma beton ko behan aur ma ka aadar karna sikhaye. Rishtedaron dwara galat wyawhar hone par beti kee baat suni jaye na ki use aaropi ke katghare men khada kiy jaye. Sarkar to sharab dhadlle se bechati hai. Balatkar ke drushy filmon me kuch adhik wistar se filmaye jate hain in sabka mastishk par galat prabhaw padta hai. yuwakon ka khali samay amajopayoge kryakramon me lagaya jaye to kitani samasyayen sulzengi. Pariwar men bhee kam mil bant kar karne kee pratha banana hogi .

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  9. बलात्कार के लिए कोई एक कारक जिम्मेदार नहीं है बहुत से कारण है जिनके बारे में सोचना होगा और परिवारों को अपने बच्चों को संस्कार देने होंगे लेकिन शराब पर तो तत्काल रोक लगनी चाहिए !!

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  10. वक्त के साथ साथ सोच में भी बदलाव हुए हैं और अपनी संस्कृति में भी
    कपड़ो से लेकर आचरण तक में बदलाव हुआ है ये दूषित समाज,हम जैसे ही लोगों की देना है ...वर्तमान में ये पीड़ी तो बर्बाद हो ही चुकी है ...आगे वालो को संभाल कर हम साथ चल ले ..वो भी बहुत होगा

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  11. आज का रहन-सहन और सोच बहुत प्रदूषित हो चुका है.चरित्र और व्यक्तित्व की गरिमा का महत्व समझें ऐसे संस्कार विकसित किये जाने की आवश्यकता है.

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  12. ना सभ्यता रही ना गर्व... संस्कारों और संस्कृति के लिए पूरी दुनिया में जाना जाने वाले हमारे देश का सर आज शर्म से झुक हुआ है. जरुरत है, अपने घरों से शुरुआत करने की, घर- परिवार मिलकर ही समाज और देश का निर्माण करते हैं. सहमत हूँ आपके विचारों से

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