रविवार, 25 अप्रैल 2010

निर्देशक बालकृष्ण अय्यर का उम्दा नाटक: फ़ांसी के बाद

क अवास्तविक घटना "फ़ांसी के बाद" दरअसल अवास्तविक घटना इसलिए है कि एक तो ऐसा घटित होना वाकई संभव नही है, दूसरे इसलिए भी एक घटना का अवास्त रुप निर्दोष आदमी की जिन्दगी को मौत का जामा पहना देता है।

ईश्वर प्रसाद को फ़ांसी की सजा हो जाती है। उस पर आरोप है कि उसने अपनी पत्नी का गला दबा कर हत्या की है। लेकिन निर्धारित समय तक फ़ांसी के फ़ंदे में लटकाने के बाद भी ईश्वर प्रसाद जिंदा बच जाता है।

अब यहां एक अनोखी समस्या आ जाती है कि वह जिंदा तो हो जाता है पर उसकी याददास्त चली जाती है। तब दोबारा फ़ांसी पर चढाना भी एक समस्या है क्योंकि कानून के तहत जिस व्यक्ति को फ़ांसी दी जाती है,

उसे उसके अपराध के बारे में उसके होशहवास में बताना आवश्यक है कि उसे किस कारण से सजा दी जा रही है, अब इसके बाद जेल में प्रारंभ होती है ईश्वर प्रसाद की याददास्त को वापस लाने की कवायद।

तरह तरह की जुगत लगाई जाती है, उसे उसकी कहानी सुनाई जाती है, जेलर साहब समेत पूरा स्टाफ़ पुलिस द्वारा गढी गई कहानी का नाटक करके भी दिखाता है, जिसके आधार पर उसकी सजा मुकर्रर की गई थी। अंत में ईश्वर की याददास्त वापस आ जाती है,

वह पुलिस से उलट अपनी सच्ची घटना बयान करता है। जिसे सुन कर सब स्तब्ध रह जाते हैं और उसे निर्दोष मानने लगते हैं, लेकिन अदालत के आदेश का पालन करने के अलावा कोई रास्ता नहीं बचता।

ईश्वर को पुन: फ़ांसी दी जाती है पर यह फ़ांसी अपने पीछे कई सवाल छोड़ जाती है।

यह सारांश है कल मुक्ताकाश के नीचे बैठकर मेरे द्वारा देखे गए प्ले का। एक अरसे के बाद मैने कोई प्ले देखा। इस आभासी दुनिया से बाहर निकल कर। नहीं तो यहां के प्ले भी कम नही हैं जो हम देखते हैं।

हमारे मित्र बालकृष्ण अय्यर जी एक उच्चकोटि के नाट्य निर्देशक हैं। उनके कई निमंत्रण के बाद भी किसी प्ले में दर्शक के रुप में शामिल हो पाया।

इसका आयोजन 36 गढ़ शासन के संस्कृति विभाग द्वारा किया गया था। जिसमें भिलाई के "भारतीय जन ना्ट्य संघ"इप्टा" द्वारा इसे मंचित किया गया था।

निर्देशन की कसावट और शानदार संवाद प्रस्तुतिकरण ने डे्ढ घंटे तक दर्शकों को हिलने नही दि्या।उन्हे बांधे रखा अपने कला कौशल से।

जेलर के पात्र में मणिमय मुखर्जी, पंडित के पात्र में राजेश श्रीवास्तव तथा ईश्वर के पात्र  में शरीफ़ अहमद ने अपने अभिनय से कायल कर दिया।

इस प्ले के लेखक वि्मल बंदोपाध्याय और निर्देशक पंकज मिश्रा जी हैं। उद्घोषक के रुप में बालकृष्ण अय्यर जी ने उत्कृष्ट भूमिका निभाई।

अन्य मंच सहयोगियों ने अपनी भुमिका से चार चाँद लगा दिए। प्रकाश एवं ध्वनि संयोजन भी अच्छा था।मैने इस प्ले के कुछ चित्र अपने मोबाईल से लिए हैं रात का समय था इतने तो अच्छे नहीं हैं पर काम चलाऊ हैं प्रस्तुत हैं।

 बालकृष्ण अय्यर मंच पर निर्देशन करते हुए

  प्रथम दृश्य"फ़ांसी की सजा देते हुए"

  द्वितीय दृश्य" मृत्यु से बच जाना"

  तृतीय दृश्य "पंडित का मरने का नाटक करना"

  चतुर्थ दृश्य" ईश्वर की याददास्त लौटना और सत्य घटना का बयान करना"

 अंतिम दृश्य" कानून के रक्षार्थ ईश्वर को पुन: फ़ांसी पर चढाना"

जीवन की आपा धापी से निकल कर हमें कभी-कभी स्वस्थ्य मनोरंजन भी करना चाहिए, जिससे दिल-दिमाग दुरुस्त रहे और जीवन का वास्तविक आनंद आए, नहीं तो कदम-कदम पर पचड़े हैं और हम उसी में फ़ंसे रहते हैं। "यहां तो रोज फ़ांसी होती है और हम जिंदा बच जाते हैं अगली बार फ़िर से फ़ांसी के फ़ंदे का झट्का खाने के लिए। यही नियति है"....आमीन.....

28 टिप्‍पणियां:

  1. नाटक केवल जनरंजन का साधन ही नहीं अपितु जनशिक्षण का महत्वपूर्ण शासन है। टेलीविजन के घर घर में पहुँच जाने के बाद भी इन की उपयोगिता वैसी ही बनी हुई है।

    उत्तर देंहटाएं
  2. aapne wo din yaad dila diye jab IPTA ke nukkad natakon me main bhi shamil hua karta tha aur gali-gali, gaon-gaon jakar abhinay karta aur jangeet gata tha.. kya din the wo... Shree BalKrishn ji ko mera abhivadan kahen..
    Abhar Lalit ji

    उत्तर देंहटाएं
  3. रंगमंच रोमांच की एक प्रक्रिया है (अभिनय करने वालों के लिये)
    सुन्दर प्रस्तुतिकरण

    उत्तर देंहटाएं
  4. बहुत सुन्दर नाटक । उससे भी सुन्दर आपका अंदाज़े बयाँ । वाह !

    उत्तर देंहटाएं
  5. बड़ा अच्छा लगा जानकर..चित्र भी बढ़िया है..रंगमंच का अपना अप्रीतम सौदर्य और रोमांच है.

    उत्तर देंहटाएं
  6. ब्लौगर बंधु, हिंदी में हजारों ब्लौग बन चुके हैं और एग्रीगेटरों द्वारा रोज़ सैकड़ों पोस्टें दिखाई जा रही हैं. लेकिन इनमें से कितनी पोस्टें वाकई पढने लायक हैं?
    हिंदीब्लौगजगत हिंदी के अच्छे ब्लौगों की उत्तम प्रविष्टियों को एक स्थान पर बिना किसी पसंद-नापसंद के संकलित करने का एक मानवीय प्रयास है.
    हिंदीब्लौगजगत में किसी ब्लौग को शामिल करने का एकमात्र आधार उसका सुरूचिपूर्ण और पठनीय होना है.
    कृपया हिंदीब्लौगजगत को एक बार ज़रूर देखें : http://hindiblogjagat.blogspot.com/

    उत्तर देंहटाएं
  7. ...एक लम्बा अर्सा हो गया नाटक देखे हुये ...कुछ अलग ही आनंद रहता है ...नो कटस ... नो लाईट आन ... नो री-टेक ... बस सब कुछ "लाईव" ....नाट्क का आनंद लेने के लिये बधाई !!!

    उत्तर देंहटाएं
  8. मैं इस बार भी चूक गया अय्यर जी की इस सशक्त प्रस्तुति का आनंद लेने से
    लेकिन आपने वर्णन ने मायूस न होने दिया

    उत्तर देंहटाएं
  9. बहुत सुन्दर चित्रण!
    निर्देशन ही तो मुख्य होता है
    मै भी स्कूल मे कभी नाटक मे
    भाग लिया करता था। वैसे कार्यालय के
    स्थापना दिवस के अवसर पर भी "किस्सा कुर्सी का"
    शीर्षक मन्चित नाटक किया था।

    उत्तर देंहटाएं
  10. उदयपुर में पश्चिम क्षेत्र सांस्‍कृतिक केन्‍द्र के माध्‍यम से प्रतिमाह नाटक मंचन की परम्‍परा है। कभी अच्‍छे और कभी साधारण मंचन होते हैं। लेकिन नाटकों का दर्शक एक खास वर्ग है जो आज भी बड़ी संख्‍या में पहुंचता है। नाटकों के मंचन में निर्देशक की भूमिका महत्‍वपूर्ण रहती है। हम भी कभी-कभार नाटक का मंचन देख ही लेते हैं। आपने एक सशक्‍त नाटक देखा इस‍के लिए बधाई।

    उत्तर देंहटाएं
  11. ब्लोग के माध्यम से रंगमंच की चर्चा इसके पहले, कम से कम मुझे, देखने को नहीं मिला। आपने रंगमंच को ब्लोग में समाहित करके बहुत सराहनीय कार्य किया है।

    उत्तर देंहटाएं
  12. हमें क्या पता था कि आप भी अंदर हैं| हम तो माँ और पिताजी को वहां छोड़कर हेल्थ क्लब चले आये और फिर कार्यक्रम के बाद गेट से ही उन्हें लेकर चल दिए| कल माताजी और पिताजी की बातों और आज आपकी पोस्ट से लग रहा है कि नाटक देखना चाहिए था|

    उत्तर देंहटाएं
  13. mazaa aa gayaa jeevant sameekshaa dekh kar. laga, mai bhi natak hi dekh rahaa hu. ayyar mere bhi mitr hai. bhavishy me kabhi maukaa milaa to ye natak zaroor dekhanaa chaahoonga.

    उत्तर देंहटाएं
  14. आपके माध्‍यम से हमने भी प्‍ले का आनंद ले ही लिया !!

    उत्तर देंहटाएं

  15. बेहतरीन..
    बेहतरीन बयान मेरे दोस्त, सँदेश स्पष्ट है
    कई मुद्दों में कानून के कई लोचे पर पुनर्विचार की आवश्यकता है !

    उत्तर देंहटाएं
  16. @ पंकज अवाधिया
    पंकज मै भी एक अर्से के बाद गया था।
    लेकिन बहुत आनंद आया,बहुत ही अच्छा प्रहसन था।
    जेलर मणिमय मुखर्जी,पंडित के पात्र में राजेश श्रीवास्तव तथा ईश्वर के पात्र में शरीफ़ अहमद के सशक्त अभिनय ने पात्रों में जान डाल दी।
    अंतिम दृश्य तो भावुक कर गया। कई लोगों को आंसू पोंछते देखा।

    उत्तर देंहटाएं
  17. बालकृष्‍ण भईया रंगमंच के मंजे हुए निदेशक हैं, थियेटर के प्रति उनका
    लगन अनुकरणीय है, उनके विचारों की गहराई आप स्‍वयं उनके ब्‍लाग में उनकी कविताओं में देख सकते है.
    हम अपनी व्‍यस्‍तताओं के कारण इस प्रस्‍तुति के पूर्वाभ्‍यास में भी मित्रों के अनुरोध के बावजूद उपस्थित नहीं हो पाये. बालकृष्‍ण भईया भी नाराज हो रहे होंगें, आशा है वे मुझे क्षमा करेंगें.
    धन्‍यवाद ललित भाई इसे प्रस्‍तुत करने के लिए.

    उत्तर देंहटाएं
  18. यही तो इमेजिनेशन है
    निस्चित रूप से नाटक प्रभाव शाली है

    उत्तर देंहटाएं
  19. @संजीव तिवारी
    अय्यर भैया को आप पर नाराज होना भी चाहिए:)

    उत्तर देंहटाएं
  20. शर्मा जी,
    आपके द्वारा किये गये वर्णन से नाटक की रोचकता स्पष्ट हुई। सही में स्वस्थ मनोरंजन बहुत आवश्यक है।
    आभार।

    उत्तर देंहटाएं
  21. आप ने बहुत सुंदर ढंग से नाटक के बारे बताया, बहुत अच्छा लगा, चित्र भी संजीव लगे ओर बहुत सुंदर.
    धन्यवाद

    उत्तर देंहटाएं
  22. ललित भाई,
    बड़े गूढ़ अर्थ वाली है नाटक की विवेचना...

    लीजिए माहौल को लाइट कीजिए...

    मक्खन ने भी सपने में देखा, उसे फांसी की सज़ा सुना दी गई है...और कल ही सुबह फांसी होनी है...डेथ वारंट लेकर जेलर मक्खन की बैरक में आता है और उसे सुनाता है...मक्खन पूछता है...सुबह कितने बजे होगी फांसी...जेलर जवाब देता है...सुबह पांच बजे...ये सुनकर मक्खन ज़ोर ज़ोर से हंसने लगता है...जेलर को बड़ा ताज्जुब होता है, पूछता है...क्या तुम्हे डर नहीं लग रहा...मक्खन कहता है...डर किस बात का जेलर साहब, मैं तो सुबह उठता ही नौ बजे हूं...

    जय हिंद...

    उत्तर देंहटाएं
  23. बहुत लाजवाब वर्णन, वैवाहिक वर्षगांठ की हार्दिक शुभकामनाएं.

    रामराम

    उत्तर देंहटाएं
  24. नाटक की व्याख्या पढ़ कर आनन्द आया...रंगमंच का अपना ही आनंद है....एक दिन देर से ही सही..शादी की सालगिरह की शुभकामनायें

    उत्तर देंहटाएं