गुरुवार, 20 जनवरी 2011

छत्तीसगढ़ी संस्कृति के दस्तावेज उपन्यास को प्रकाशन का इंतजार

इंतजार की सीमा क्या हो सकती है? जीवन पर्यंत देहावसान तक या उसके पश्चात भी? कभी-कभी इंतजार की घड़ियाँ लम्बी हो जाती हैं और अंतिम यात्रा के पश्चात भी चलते रहती हैं। ऐसा ही कुछ एक उपन्यास के साथ हुआ।

इस उपन्यास को मैने पढा। छत्तीसगढ अंचल की संस्कृति की अमिट छाप है इसमें। छत्तीसगढ़ के जन-जीवन का प्रथम आंचलिक उपन्यास है पढते हुए लगता है कि मैं समय के उस काल खंड में पहुंच गया हूँ।

सन् 1965 में लिखे गए इस उपन्यास का नाम है “धान के देश में”। इसकी भूमिका शनिवार, चैत्र शुक्ल 2, विक्रम संवत् 2022, दिनांक 3-04-1965  को प्रसिद्ध साहित्यकार पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी ने लिखी थी। लेकिन यह उपन्यास काल की गर्त में दब गया। प्रकाशित न हो सका।

धान के देश की भूमिका में पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जी कहते हैं कि “हरिप्रसाद अवधिया जी की रचनाओं से मैं पहले ही परिचित हो चुका था यद्यपि मुझे उनका दर्शन करने का सौभाग्य तब हुआ जब मैं महाकोशल में काम करता था।

उनका जन्म स्थान रायपुर है। सन् 1918 में उनका जन्म हुआ था। सत्रह वर्ष की अवस्था से ही वे कहानियाँ लिखने लगे। उनकी 'नौ पैसे' शीर्षक कहानी पहली रचना है। वह इलाहाबाद से प्रकाशित होने वाली 'नई कहानियाँ' नामक मासिक पत्रिका में प्रकाशित हुई थी। तब से वे आज तक बराबर लिखते जाते हैं। उनकी रचनायें 'सरस्वती', 'माधुरी', 'विशाल भारत', 'नव भारत' और 'साप्ताहिक हिन्दुस्तान' में भी प्रकाशित हुई हैं। सन् 1948 में वे एम.ए. हुये और साहित्य के साथ साथ शिक्षा के क्षेत्र में भी अवतीर्ण हुये।

जब मैंने उनकी रचनायें पढ़ीं तब मैंने उन्हें उपन्यास लिखने के लिये कहा। सच तो यह है कि उस समय जो भी तरुण साहित्यकार मेरे पास आते थे, उन सभी को मैं उपन्यास लिखने के लिये प्रेरित करता था।

लमनहर चौहान जी ने मुझको अपना एक उपन्यास दिखलाया। उस छोटी अवस्था में भी उनका रचना-कौशल देखकर मैं विस्मित हो गया।

विश्वेन्द्र ठाकुर और परमार जी कहानियाँ लिखा करते थे। उनसे भी मैंने छत्तीसगढ़ के जन-जीवन को लेकर उपन्यास लिखने का आग्रह किया। मुझे सबसे बड़ी प्रसन्नता यह है कि अवधिया जी ने "धान के देश में" नाम देकर पहली बार उपन्यास की रचना की है।

उपन्यास रचना में उन्हें कितनी सफलता हुई है इसका निर्णय तो सुविज्ञ आलोचक और मर्मज्ञ पाठक ही करेंगे। अवधिया जी पर मेरा विशेष स्नेह है। अपने स्नेह पात्रों की रचनाओं में हम लोग गुण-दोष की विवेचना नहीं करते।

मैं तो यही कहूँगा कि उनकी इस प्रथम कृति से मुझे असन्तोष नहीं हुआ है। मुझे यह आशा भी है कि जब वे अन्य उपन्यास लिखेंगे तो उन्हें उत्तरात्तर अधिक से अधिक सफलता प्राप्त होगी।“

एक अर्ध शताब्दी भी बीत गयी लेकिन “धान के देश में” की सुध लेने कोई नहीं आया। सत्ता के इर्द-गिर्द रहने वाले चापलूस लेखकों ने शासकीय अनुदान से अपनी घटिया से घटिया रचनाओं का संग्रह प्रकाशित करवा लिया।

लेकिन जो इस दुनिया से चला गया है उसकी सुध कौन ले? धान के देश में नामक उपन्यास अपने प्रकाशन की बाट आज भी जोह रहा है। इकबाल का एक शेर याद आता है मुझे-

हजारों साल से नर्गिस अपनी बेनूरी पे रोती है।
बड़ी मुस्किल से होता है चमन में दीदावर पैदा।

मेरे धान के देश में उपन्यास का जिक्र करने का कारण यही है कि कोई संस्था व्यक्ति या शासन अगर इस महत्वपूर्ण उपन्यास को प्रकाशित करना चाहता है तो उसे इसकी पाण्डुलिपि उपलब्ध कराई जा सकती है।

जिससे यह उपन्यास अपने काल खंड की अंधेरी कोठरियों से निकल कर प्रकाशित हो और उपन्यासकार स्व: हरिप्रसाद अवधिया जी का उपन्यास प्रकाशन का इंतजार मरणोपरांत समाप्त हो सकें।

17 टिप्‍पणियां:

  1. अब भी प्रकाशित हो जाये तो अच्छा हो. और क्या इसीलिये जी०के०अवधिया जी के ब्लाग का नाम "धान के देश में" है..

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  2. ललित जी, मेरे स्व. पिताजी के उपन्यास की चर्चा करने के लिए आपका बहुत बहुत धन्यवाद!

    "धान के देश में" उपन्यास का प्रकाशन पिताजी की हार्दिक इच्छा थी, किन्तु आर्थिक अभाव के कारण उनकी इच्छा पूर्ण नहीं हो पाई। यदि इस उपन्यास का प्रकाशन होता है तो छत्तीसगढ़ की परम्परा तथा रीति-रिवाज पर शोध करने वाले शोधार्थियों को भी बहुत बड़ा लाभ होगा क्योंकि पूरे उपन्यास में कथावस्तु के साथ छत्तीसगढ़ की परम्पराओं के विषय मे विशेष जानकारी देने का भी प्रयास किया गया है।

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  3. हमारे देश की व्‍यवस्‍था ने कितनी ही अच्‍छी कृतियों को कूडे के ढेर में पहुंचा दिया है .. और कितने रचनाकार , कलाकार और ज्ञानियों को गुमनामी के अंधेरे में ढकेल दिया है .. अपने पिताजी की लंबी उम्र की दुआ करती हुई मैं भी उनकी रचनाओं को मैं समेटने का प्रयास कर रही हूं .. एक वैज्ञानिक ज्‍योतिषी के रूप में उन्‍हें पहचान दिलाने को कृतसंकल्‍प हूं .. ईश्‍वर की इच्‍छा होगी तो उन्‍हें उनके जीवन में यह तोहफा अवश्‍य दे सकूंगी !!

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  4. इस सुन्दर- खोजपरक लेख के लिए बधाई. इस लेख को अपनी पत्रिका ''सद्भावना दर्पण'' के आगामी अंक में ले रहां हूँ. अवधिया जी की तस्वीर मेल कर देना..

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  5. यही है इस देश की असलियत, आपने ठीक ही कहा कि सत्ता के इर्द-गिर्द रहने वाले चापलूस लेखकों ने शासकीय अनुदान से अपनी घटिया से घटिया रचनाओं का संग्रह प्रकाशित करवा लिया। लेकिन जो इस दुनिया से चला गया है उसकी सुध कौन ले?

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  6. ललितजी आपने काबिलेतारीफ काम किया है.

    इस कृति का प्रकाशन जल्दी ही हो. ऐसे महान लेखक की कृति का यहाँ वर्णन करके उस कृति के प्रकाशन की दिशा में आपने अपना योगदान दिया है, इस ब्लॉग मंच के द्वारा. आपको साधुवाद.

    मनोज

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  7. बेहतरीन काम किया है आपने.शायद अब किसी प्रकाशक का ईमान जाग जाये और एक बेहतरीन उपन्यास प्रकाशित हो सके.

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  8. बहुत अच्छा हो कि पुस्तक रूप में सामने आये। ब्लॉग रूप में भी सोचा जा सकता है।

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  9. आपकी चिन्‍ता और पहल निश्चित ही सकारात्‍मक परिणाम मिलेगा
    उपन्‍यास और लेखक से परिचय के लिए आपका धन्‍यवाद

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  10. ललित जी... आपने हमेशा ही ऐसे लोगों के, ऐसे कार्यों क बारे लिखा है... आज फ़िर से आपका शुक्रिया अदा करती हूँ, ऐसी सोच, ऐसे रचनकार और उनकी व्यथा से मिलवाने के लिए... अब इंतज़ार करूँगी उस उपन्यास के प्रकाशित होने का... जे. के. अवधिया को भी नमष्कार जिन्होंने अपने ब्लॉग का नाम ऐसी रचना के नाम से जोड़ कर रखा...

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  11. बहुत सुंदर जानकारी दी जी, अब अगर आवधिया जी खुद कोशिश करे तो यह छप सकता हे, धन्यवाद

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  12. बहुत महत्वपूर्ण जानकारी दी है आपने. जिनके अप्रकाशित उपन्यास के बारे में आदरणीय पदुमलाल पुन्नालाल बख्शी जैसे हिन्दी के महान साहित्यकार ने अपनी मूल्यवान टिप्पणी दी है, ऐसे वरिष्ठ लेखक स्वर्गीय हरिप्रसाद अवधिया जी की इस कृति को प्रकाशित करवाने के लिए पहल ज़रूर होनी चाहिए. मेरे ख़याल से इसके लिए छत्तीसगढ़ हिन्दी ग्रन्थ अकादमी से संपर्क किया जा सकता है.यह अकादमी उच्च शिक्षा विभाग द्वारा संचालित है. इसके अलावा अवधिया जी के सुपुत्र अगर चाहें तो संस्कृति विभाग से भी प्रकाशन -अनुदान के लिए संपर्क कर सकते हैं.

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  13. इस जानकारी के लिए आपको आभार !
    यही दुआ है यह जल्द से जल्द प्रकाशित हो !

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