मंगलवार, 25 जनवरी 2011

छत्तीसगढ़ी संस्कृति से ओतप्रोत नाटक राजा फ़ोकलवा

सुमित दास, ललित शर्मा, श्याम बैस(अध्यक्ष बीज विकास निगम)
डोकरी दाई (दादी) और ममा दाई (नानी) का अपने नाती-पोतों पर अत्यधिक स्नेह होता है। उनसे सुनते थे कि-“मूल से ब्याज प्यारा होता है”। इसलिए बेटे से अधिक स्नेह नाती-पोतों पर होता है।

दादी-नानी से कहानी-किस्से बचपन में सभी ने सुने होगें। उस जमाने की भूत-प्रेत की फ़ंतासियाँ बहुत पसंद आती थी।

भूत प्रेतों के पास असीमित शक्तियां होती थी, यह सुनकर हम भी शक्ति पाने की की कल्पना करने लगते थे। लेकिन लोक कहानियों के पीछे छिपा जनकल्याणकारी संदेश बचपन में समझ नहीं आता।

बड़े होने पर उनका रंग दिखाई देता है। ऐसी “राजा फ़ोकलवा” नामक कहानी राकेश तिवारी जी ने अपनी दादी से सुनी थी। इस लोक कहानी ने उन्होने कुछ परिवर्तन किया और “राजा फ़ोकलवा” के नाम से नाटक तैयार कर मंचन प्रारंभ किया। जिसे आशातीत सफ़लता मिली।

अमित दास(पार्षद) ,सुमित दास,ललित शर्मा, श्याम बैस
मैने नाटक के विषय में सुना था, लेकिन उसका मंचन देखने का संयोग प्राप्त नहीं हुआ था। प्रयास जारी था राजा फ़ोकलवा से मिलने का और वह अवसर आ ही गया।

भनपुरी युवा समिति के तत्वाधान में 23/1/2011 कबीर कुटी में मंचन तय हुआ। हमें राजा फ़ोकलवा से मिलने का अपाईंटमेंट मिल चुका था। भीड़ भरी सड़कों से गुजर कर भनपुरी कबीर कुटी तक पहुंचने में विलंब हो चुका था।

जब पहुंचे तो नाटक का मंचन प्रारंभ होने ही वाला था। साजिन्दे अपने साज संभाल चुके थे। हरमोनियम, बेंजो, ढोलक, खंजरी की जुगलबंदी प्रारंभ हो चुकी थी। राकेश तिवारी जी हरमोनियम पर निर्देशक की भूमिका में थे।

राजा फ़ोकलवा का मंचन प्रारंभ होने ही वाला था, हमारी विलंबित आमद ने खलल डाल दिया। मैं सुमीत दास, अमित दास (पार्षद वार्ड नं-53) साथ ही साथ पहुंचे। स्वागत इत्यादि की औपचारिकताओं ने 10 मिनट और ले लिए। लेकिन संतोष था कि आज मंचन देखने मिलेगा तथा राजा फ़ोकलवा से मिल कर ही जाएंगे।

हारमोनियम पर निर्देशक गायक राकेश तिवारी
कार्यक्रम के मुख्य अथिति श्याम बैस ( अध्यक्ष बीज निगम) से हमारी राम राम जोहार के पश्चात कार्यक्रम प्रारंभ हुआ।

हमारे पौराणिक संस्कारों के अनुसार किसी भी कार्यक्रम का प्रारंभ गणेश वंदना से होता है। यहां भी दो विदुषकों द्वारा गणेश वंदना की गयी।

इसके पश्चात कहानी आगे बढती है। गाँव में फ़ोकलवा नामक एक लड़का अपनी माँ के साथ रहता है। आयु तो उसकी बढ जाती है, लेकिन दिमागी विकास नहीं हुआ रहता। हरकतें उसकी बच्चों वाली ही रहती हैं।

दिन भर गुल्ली-डंडा और डंडा पचरंगा इत्यादि खेलों में रमा रहता था। एक दिन उसकी माँ ने उसे जंगल से लकड़ी लाने भेजा तो उसे वहाँ नरभक्षी राक्षस और राक्षसनी का जोड़ा मिलता है। फ़ोकलवा की उनसे लड़ाई होती है। फ़लस्वरुप राक्षसनी के एक पैर का तोड़ा (पैर में पहने वाली वाली मोटी कड़ी या कड़ा) और साड़ी छीनने में कामयाब हो जाता है।

रक्सा-रक्सिन याने राक्षस और राक्षसनी
फ़ोकलवा साड़ी और तोड़ा लेकर अपनी माँ के पास पहुंचता है उसे साड़ी देता है और कहता है कि-देख तेरे लिए साड़ी लेकर आया हूँ और सारी घटना माँ को बता देता है।

एक दिन उसकी माँ साड़ी पहन कर घर के दूवार पर बैठी रहती है तो राजा की बेटी की सवारी उधर से निकलती है।

राजकुमारी को साड़ी पसंद आ जाती है। वह सेनापति को साड़ी की मांगने भेजती है। फ़ोकलवा की माँ साड़ी देने से इंकार कर देती है।

राज हठ बाल हठ और तिरिया हठ के सामने दुनिया झुकी है। यह समाचार राजा तक पहुंचता है। राजकुमारी ने साड़ी न मिलने तक भोजन का त्याग करने की धमकी दी।

राजा बिना माँ की राजकुमारी की सभी जिद पूरी करते थे। उन्होने साड़ी लेने के लिए महामंत्री को फ़ोकलवा की माँ के पास भेजा। फ़ोकलवा ने कहा कि साड़ी नहीं मिलेगी।

यह साड़ी तो मेरी माँ पहनेगी या मेरी पत्नी। महामंत्री निराश होकर राजा के पास लौट आता है।राजा को क्रोध आ जाता है। महामंत्री उसे सलाह देता है कि एक ही रास्ता बचा है राजकुमारी का विवाह फ़ोकलवा से करा दिया जाए।

सेनापति, राजकुमारी और फ़ोकलवा की माँ
फ़ोकलवा का विवाह राजकुमारी से हो जाता है। फ़ोकलवा राजकुमार बनकर राज महल में आ जाता है। उसकी यारी राज्य के व्यापारियों से हो जाती है।

वह उनसे रुपए पैसे लेकर अनैतिक कार्यों में लग जाता है। इसी बीच राजा की हत्या हो जाती है। फ़ोकलवा को राजा बना दिया जाता है।

राजा बनते ही फ़ोकलवा राज्य के प्राकृतिक संसाधन व्यापारियों को बेच देता है। उनसे धूस लेता है। उसे पता चल जाता है कि राजा की हत्या किसने की है।

जब महामंत्री और सेनापति को राजा की हत्या का रहस्य पता चलता है कि  राजा की हत्या के षड़यंत्र में फ़ोकलवा राजा शामिल है। तब फ़ोकलवा महामंत्री और सेनापति को बर्खास्त कर देता है।

राजा फ़ोकलवा के पात्र में हेमंत वैष्णव
एक दिन खुश होकर राक्षसीन का तोड़ा(कड़ा) वह राजकुमारी को दे देता है। तब राजकुमारी उसके जोड़े की मांग करती है।

आखिर में वह जंगल में जाकर राक्षसनी और राक्षस से लड़ता है। उनसे ताबीज और तोड़ा छीन कर ले आता है। तोड़ा राजकुमारी को देता है और ताबीज स्वयं धारण करता है।

धारण करते ही दोनो राक्षस और राक्षसनी में बदल जाते हैं। जंगल के राक्षस और राक्षसनी प्रेत योनि से मुक्त हो जाते हैं।

कहानी का उपसंहार यही निकलता है कि जिस राजा के राज में प्रजा सुखी नहीं है और राजा कुकर्मों में लगा हुआ है वह राक्षस योनि को ही प्राप्त होता है।

कुकर्मों की सजा एक न एक दिन मिलती ही है। वर्तमान से इसे जोड़कर देखें तो जन सेवा की आड़ में इस तरह का नाटक ही चल रहा है।

राक्षस योनि में बदलते राजा फ़ोकलवा और रानी
कहानी के पात्र दर्शकों को अंत तक बांधे रहते हैं। इस नाटक का प्रथम मंचन 2002 में रंग मंदिर रायपुर में हुआ था। इसके पश्चात के देश में 78 मंचन हो चुके हैं।
कहानी के मुख्य पात्र का जीवंत अभिनय हेमंत वैष्णव ने किया जिसका दर्शकों ने खूब आनंद उठाया।

पात्र परिचय- फोकलवा~हेमन्‍त वैष्‍णव, रानी~ आरती ठाकुर, दाई~ लक्ष्‍मी पाण्‍डेय, राजा, सेवक~ सुदामा शर्मा, मंत्री~ हेमलाल पटेल,
सेनापति ~ मनोज मिश्रा, गणेश,पण्डित, सेवक ~ डा. पुरूषोत्‍तम चन्‍द्राकर, रक्‍शा ~ नरेन्‍द्र यादव, रक्शिन ~ सरिता पाठक
चेरिया, परी ~ शारदा ठाकुर, सेठ ~ उत्‍तम ठाकुर, उद्योगपति ~ दीपक ताम्रकार, जोकर1 ~  दुष्‍यन्‍त द्विवेदी, जोकर 2~  नरेन्‍द्र यादव, सुवासिन ~ पूजा पाठक, गांववाले ~ हेमन्‍त शुक्‍ला, गायन पक्ष ~ राकेश तिवारी, विनोद शर्मा, विजया राउत, मिनाक्षी राउत, वादन पक्ष्‍ा ~ मनीष लदेर, उत्‍तम ठाकुर, मोहन साहू । नाटक के संगीत में कमाल की विविधताएं थी। सरगुजिहा,बस्तरिया लोकधुन के साथा चंदैनी, बिहाव, पंडवानी, पंथी, राऊत नाच का सुंदर मिश्रण किया था।

इस कार्यक्रम के आयोजक भनपुरी युवा समिति के संचालक उदय दास मानिकपुरी को साधुवाद देते हैं। सबसे खास बात रही कि दर्शकों ने बिना किसी शोर गुल से राजा फ़ोकलवा प्रहसन का आनंद लिया। इस नाटक में दर्शकों को बांधे रखने की क्षमता है।

16 टिप्‍पणियां:

  1. निसंदेह, राजा फोकलवा नाटक, छत्‍तीसगढ़ी रंगमंच की बेहतरीन प्रस्‍तुति है. मैंने इसकी पहली प्रस्‍तुति सहित लगभग 20 प्रदर्शन देखे हें और अभी भी मौका नहीं चूकना चाहता. आपकी पोस्‍ट प्रस्‍तुति भी कम नहीं.

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  2. shi khaa mul se zyaada pyara byaaz hotaa he isiliyen khtaa hun ke lekhn se zyada tippni pyari lgti he behtrin vivrnaatmk post . akhtar khan akela kota rajthan

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  3. पोस्ट में ही नाटक के प्रवाह के दर्शन हो गये।

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  4. राजा फोकलवा के रोचक मंचन पर आपके सुंदर आलेख के लिए बधाई और आभार . वास्तव में आज रंगमंचों की ऐसी सांस्कृतिक प्रस्तुतियों पर इस प्रकार की रिपोर्टिंग करने वालों की संख्या काफी कम होती जा रही है. ऐसे में आपके जैसे लेखकों से काफी आशाएं हैं .

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  5. आपके सुंदर आलेख के लिए बधाई और आभार

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  6. बहुत बढ़िया रिपोर्ट ...नाटक से भी परिचित हो गए ...आज की परिस्थिति में भी सही लगता है ...

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  7. राजा फोकलवा से मिलवाने का शुक्रिया।

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    क्‍या आपको मालूम है कि हिन्‍दी के सर्वाधिक चर्चित ब्‍लॉग कौन से हैं?

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  8. ललित भाई , पिछले दिनों मैंने अपना मोबाईल गूमा डाला | केवल का नंबर भी बंद है | इसी लिए आपसे बात नहीं कर पा रहा हूँ |

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  9. ललित जी बहुत ही अच्छी रिपोर्ट इस नाटक के मंचन की आपने प्रस्तुत की..... नाटक की कहानी सच बहुत ही अच्छी है और दर्शको को बांधे रखने में सक्षम है. सुंदर प्रस्तुति. .........

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  10. नाटक का मंचन देखने मे और मज़ा आता। कहानी समझ मे आ गई। "जय हो फोकलवा राजा की"

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  11. शुक्रिया ललित जी , आपका ब्लॉग न हो तो ब्लॉग जगत का एक कोना गायब रहेगा , ऐसी चीजें कौन लाता है भला ! मैं वहाँ से आ रहा हूँ जहां आपने लिखा है : '' सर्वाधिक पढा जाने वाला एक ब्लॉग़ यह भी है।'' गोली मारिये ऐसे आंकड़ों पर , पाबला जी वहाँ एक शेर याद करके भूल गए हैं , वही सच्चाई है , जन्नत की हकीकत - दिल के खुश रखने ...वाली ! आपका अलग स्वर आपकी विशिष्टता है , इसे बनाए रखिये , जैसे आज वाली पोस्ट , आंकड़ा जाय भाड़ में ! :)

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  12. सटिक समीक्षा...आज पूरा..ठीक से पढ़ा...

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  13. लोक कला इसी तरह जीवित रहेगी ।

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