मंगलवार, 12 जनवरी 2010

मांग! क्या मांगता है?

वाब गाजीउद्दीन के समय की बात है. लखनऊ के गोलागंज में संगीत के एक धुरंधर उस्ताद हैदरी खान रहते थे. वह चूँकि बैजू बावरा की तरह खोये-खोये से रहते थे इसलिए उनका नाम "सिड़े हैदरी खां" मशहूर हो ग्या.
नवाब साहब ने उनका नाम सुना तो उनका गाना सुनने के लिए बेताब हो गए. पर कभी ऐसा मौका हाथ नहीं आया. एक दिन शाम को गाजीउद्दीन दरिया के किनारे सैर के लिए निकले. रोमी दरवाजे के नीचे उनके कारिंदों ने "सिड़े हैदरी खां" को जाते देखा तो नवाब साहब से अर्ज किया
" कब्ला-ए-आलम!वह जा रहे हैं हैदरी खां."
नवाब साहब तो उत्सुक थे. हुक्म दिया "बुलाओ".
कारिंदे पकड़ कर लाये और सामने खड़ा कर दिया.
नवाब साहब ने कहा "अरे मियां हैदरी खां, हमें अपने कभी अपना गाना नहीं सुनाया".
वह बोले "जरुर सुनाता, मगर मुझे आपका मकान मालूम नहीं है."
नवाब साहब सुनकर हंस पड़े और कहा," अच्छा हमारे साथ चलो, हम खुद तुम्हे अपने मकान पर ले चलेंगे.".....
"बहुत खूब'. इतना कहकर वह नवाब साहब के साथ चल दिये.
इतर मंजिल के करीब पहुँच कर अचानक हैदरी खां ने कहा "मैं चलता तो हूँ मगर पुरियां और बालाई खिलवाईयेगा तभी गाऊंगा."
नवाब साहब ने वादा किया की पेट भर खिलावायेंगे. महल में पहुँच कर उनका गाना सुना तो नवाब साहब मस्त हो उठे. उनको हाल आने लगा और बेसुध हो गये. यह हालत देखकर हैदरी खां खामोश हो गए. थोड़ी देर में वापस अपने हाल पर आने के बाद
नवाब साहब ने फिर गाने को कहा तो.......
हैदरी खां बोले " हुजुर आपके पेचवान में भरा तम्बाखू बहुत अच्छा मालूम होता है, आप किसकी दुकान से मंगवाते हैं?"
गाजीउद्दीन हैडर खुद  सिड़ी मशहूर थे. इस सवाल पर नाराज हुए ......
तो मुसाहिबों ने धीरे से अर्ज किया " किब्ला-ए-आलम! यह पक्का सिड़ी है. अभी तक यह नहीं समझा है किस्से बातें कर रहा है."
नवाब के इशारे पर लोग हैदरी खां को दुसरे कमरे में ले गए, पुरियां बालाईं खिलवाई, हुक्का पिलवाया, उन्होंने पाव भर पुरीयाँ आधा पाव बालीं और थोड़ी सी शक्कर अपनी बीबी के लिए भिजवाई.
उधर नवाब साहब जाम पर जाम चढ़ाये जा रहे थे. जब नशे का जोर हुआ तो हैदरी खां की फिर याद आई. उसे बुलाकर गाने का हुक्म दिया. जैसे ही हैदरी खां ने गाना शुरू किया.....
 तो नवाब साहब ने रोक कर कहा "हैदरी खां सुनते हो. अगर गाने से मुझे खाली खुश किया और रुलाया नहीं तो याद रखो गोमती में डूबवा दूंगा."
हैदरी खां चक्कर खा गये उनको समझ में आया कि यह तो बादशाह है. कहा हुजुर "अल्लाह मालिक है" कह कर जी तोड़ गाने लगे.
खुदा की कुदरत थी या हैदरी खां की जिन्दगी थी. गाने का ऐसा असर हुआ कि थोड़ी देर में नवाब साहब रोने लगे. खुश होकर बोले "हैदरी खां! मांग, क्या मांगता है?"
हैदरी खां ने अर्ज किया "जो मांगूंगा, दीजियेगा"
नवाब साहब ने वादा किया तो हैदरी खां ने तीन बार हामी भरवा कर कहा " हुजुर! मैं यह मानता हूँ कि मुझे फिर कभी न बुलवाईयेगा और न गाना सुनियेगा."
हैदरी  खां सम्भल कर बोले "आपका क्या? कहीं मुझे मरवा दिया तो मुझ जैसा हैदरी खां न पैदा होगा और आप मर जायेंगे तो फ़ौरन दूसरा बादशाह आपकी जगह ले लेगा."
इस बात पर नाराज होकर नवाब साहब ने मुंह फेर लिया . यह मौका पाते ही हैदरी खां अपनी जान लेकर भागे और सीधे घर  पहुँच कर ही दम लिया.  

7 टिप्‍पणियां:

  1. हैदरी खाँ की रोचक कथा..बहुत सही!!

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  2. हा हा हा , जान बची तो लाख उपाय , हैदरी खान ने बिल्कुल ठीक मांग रखी

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  3. जान बची तो लाखों पाये
    लौट के हैदरी घर को आए

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  4. "आपका क्या? कहीं मुझे मरवा दिया तो मुझ जैसा हैदरी खां न पैदा होगा और आप मर जायेंगे तो फ़ौरन दूसरा बादशाह आपकी जगह ले लेगा."

    लाजवाब!

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  5. हा-हा-हा
    बहुत मजेदार

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  6. बाल बाल बचे हैदरी खान।
    दिलचस्प कहानी।

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