मंगलवार, 19 दिसंबर 2017

स्थापत्य एवं शिल्प के विषयों में बदलाव

समय के साथ स्थापत्य एवं शिल्प के विषयों में बदलाव आता है, जिससे उसके कालखंड की जानकारी मिलती है। छठवीं शताब्दी से लेकर अद्यतन हम देखते हैं तो शनै शनै बदलाव दिखाई देता है। जो शिल्प के लावण्य, शरीर सौष्ठव, वस्त्राभूषण आदि में परिलक्षित होता है। इस बदलाव को देखने के लिए मीमांसक का नजरिया चाहिए। जहाँ बड़ा बदलाव हो वह हर किसी को दिखाई देता है और अपना ध्यान आकृष्ट करता है।  


प्राचीन भारतीय परम्परागत वाद्य यत्रों में मृदंग, ढोल, नगाड़े, मुहरी, सिंगी वीणा, वेणु आदि दिखाई देते हैं। जिनमें स्थान विशेष एवं वादक की पसंद के हिसाब से बदलाव होता है। यह बदलाव शिल्प में भी दिखाई देते हैं। जिस तरह खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर की भित्ति में स्थापित नृत्य गणपति के दांई तरफ़ ढोल एवं बांई तरफ़ ड्रम वादक दिखाई देता है। यहाँ ड्रम दिखाई देते ही हमें एकदम से बदलाव दिखाई देता है। क्योंकि ड्रम पश्चिम का वाद्य माना जाता है। परन्तु शिल्प से जाहिर होता है कि यहाँ ड्रम जैसा वादय पूर्व से ही उपस्थित था। 
लक्ष्मण मंदिर खजुराहो के नृत्य गणपति प्रतिमा में अंकित ड्रम वादक
कुछ ऐसा ही शिल्प में हमें बस्तर स्थित #दंतेश्वरी मंदिर में दिखाई देता है। गर्भगृह के दांई तरफ़ के प्रतिमा शिल्प में एक कुलीन स्त्री अपने कंधे पर पर्स लटकाए हुए है और उसके पीछे परिचारिका पंखा झल रही दिखाई देती है। यह शिल्प 14 वीं शताब्दी का माना जाता है। इस प्रतिमा में दिखाई गए पर्स (सौंदर्य पेटिका) का चलन वर्तमान में भी दिखाई देता है। आज भी हम बाजार में जाएंगे तो इस प्रकार की सौंदर्य पेटिका खरीद सकते हैं।
दंतेश्वरी मंदिर दंतेवाड़ा बस्तर का चौदहवीं सदी का प्रतिमा शिल्प
अब हम मुख्य विषय पर आते हैं, सुबह की पोस्ट में प्राण चड्डा जी ने जिज्ञासावश एक चित्र कमेंट बाक्स में पोस्ट किया। मुझे इस शिल्प चित्र को देखकर खुशी भी हुई। खुशी इसलिए हुई की छठवीं शताब्दी से लेकर वर्तमान में शिल्प में कितना बदलाव हुआ है, इस प्रतिमा शिल्प से पूर्णत: ज्ञात हो रहा है। यह प्रतिमा शिल्प सद्यनिर्मित अमरकंटक के जैन मंदिर का है। 
सद्यनिर्मित अमकंटक के जैन मंदिर का प्रतिमा शिल्प
इस प्रतिमा में स्त्री सम्पूर्ण भारतीय शृंगार से ओतप्रोत होकर वायलियन वादन कर रही है। जबकि वायलियन युरोप का प्रमुख वाद्य यंत्र है। कितनी सहजता से शिल्पकार ने अपने शिल्प में वायलियन जैसे वाद्य यंत्र को अंगीकार कर लिया। प्रतिमा के गले में दो लड़िया हार एवं कटिमेखला की चौड़ाई इस शिल्प में अधिक दिखाई दे रही है। यह आभुषणों में भी परिवर्तन है। यही समय के साथ बदलाव है। काल के अनुसार परिवर्तन अवश्यसंभावी है और सनातन चलता रहेगा। 

1 टिप्पणी:

  1. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन ’काकोरी कांड के वीर बांकुरों को नमन - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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