शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

खजुराहो की प्रतिमाओं में खुजली प्रदर्शन

खुजली एक ऐसी चीज है, जिसे ब्याधि माने या सुख, यह तय करना बहुत ही कठिन है। जितना सुख खुजाने में है उतना किसी बात में नहीं है। मीठा मीठा सुख, लगता है तो खुजाते रहो। खुजली शरीर के किसी भी अंग क्षेत्र में चल सकती है। जीभ से लेकर वर्ज्य प्रदेश तक। यह खुजली भी ऐसी चीज है कि कभी कभी ऐसे स्थान पर चलती है जहाँ तक आदमी की पहुंच नहीं होती। उसे आड़ा टेढ़ा होकर खुजाने के लिए कसरत करनी ही पड़ती है।

ऐसी ही कुछ पार्श्व प्रदेश में चलने वाली खुजली है। इस खुजली का सुंदर शिल्पांकन खजुराहो के लक्ष्मण मंदिर की भित्ति के शिल्पांकन में किया है। जिसमें अप्सरा त्रिभंगी मुद्रा में तन्मयता से अपनी पीठ खुजाते हुए दिखाई दे रही है तथा खुजाते हुए खुजली वाले स्थान पर खरोंचे भी पड़ गई हैं। पीठ खुजाने के लिए उसे शरीर को किसी जिमनास्टिक खिलाड़ी की तरह मोड़ना पड़ रहा है। शिल्पकार का शिल्पांकन भी अद्भुत है, उसने शरीर के सभी अंगो का लोच दिखाने में एवं चेहरे पर खुजली का सुख दिखाने में अपनी सारी कला का रस निचोड़ दिया।

इससे ज्ञात होता है कि खुजली सिर्फ़ आम आदमी को ही होती है। खुजली राजा, महाराजा, उच्चाधिकारियोँ एवं अप्सराओं तक को होती है तथा खुजली का खुजाकर शमन करना प्राथमिक कार्य माना गया है। खुजाने का सुख भी रतिदान के सुख से कम नहीं है। जब तक खुजा न लें तब तक मन को शांति नहीं मिलती। सबसे अधिक कठिनाई तो तब होती है, जब भरी महफ़िल में वर्ज्य क्षेत्र में खुजली होती है। ऐसी स्थिति में खुजाना भले ही असभ्यता समझा जाता है, परन्तु खुजाना तो पड़ता ही है। 

खुजाल की ऐसी स्थिति में लज्जा एवं सभ्यता को त्याग पर रख कर खुजाना ही पड़ता है। बड़े-बड़े नेताओं द्वारा खुजली करते हुए चित्र यदा कदा मीडिया में आ जाते हैं। उपरोक्त शिल्प से हम यह मानकर चल सकते हैं कि खुजली वर्तमान की व्याधि/ व्यसन नहीं है। इस सुख के आकांक्षी प्राचीन काल में भी रहे हैं। इसलिए अगर खुजली हो तो इसे निर्बाध खुजाया जा सकता है। धन्य है वह शिल्पकार जिसने खुजली जैसे सुख का भी प्रवीणता एवं महीनता से अंकन किया है।

अब समस्या यह है कि खुजाल को व्याधि की श्रेणी में रखा जाए या आनंद की। अगर व्याधि की श्रेणी में रखते हैं तो खुजाने के आनंद का सुख जाते रहेगा। अगर आनंद की श्रेणी में रखते हैं तो खुजाते खुजाते एक दिन व्याधि बन जाएगा। 

स्थिति बड़ी विकट है, इसलिए जब तक आनंद आ रहा है तब तक खुजाते रहें, जिस दिन खुजाते-खुजाते लहूलुहान होने लगें उस दिन चिकित्सा लेना अनिवार्य है। पर खुजाने का आनंद लेना हर नागरिक का परम धर्म मानना चाहिए। 

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