मंगलवार, 1 दिसंबर 2009

दूध देने वाली लोहे की भैंस: एक नया अविष्कार

कबाड़ इकट्ठा कर रहा हूँ लोहे का, पाईप, चद्दर, एंगल, गिरारी, पुल्ली, सफ्टिंग, नट-बोल्ट, स्क्रू, अब मैंने जो माडल कागज पे खींचा है उसे रूप देने के लिए जरूरत है एक वेल्डिंग मशीन की, जो इन सबको जोड़ दे, एक नया अविष्कार हो जाये, इस मानव जगत के लिए. 

मैं इस संसार को कुछ देना चाहता हूँ. वेल्डिंग मशीन के लिए दौड़ कर जागेश्वर मिस्त्री के पास जाता हूँ, 

"जरा दो घंटे के लिए तेरी वेल्डिंग मशीन दे दे यार," 

क्या करोगे महाराज आज वेल्डिंग मशीन का? जागेश्वर कहता है. 

"कुछ नही थोडा वेल्डिंग करना है पाईप, एंगल."

 मैं वेल्डिंग मशीन घर लेकर आ जाता हूँ और अपने काम में लग जाता हूँ मनोयोग से, अब मेरी मशीन तैयार हो जाती है. हो जाता है तैयार मेरा नया अविष्कार, "दूध देने वाली मशीन", 

पहले हमारे घर में गाय-भैंसों से कोठा भरा रहता था, उनकी सेवा चाकरी के लिए 5  नौकर, जो दाना-चारा पानी से लेकर सारा काम करते थे, हमें मिलता था शुद्ध दूध, दही, घी, छाछ, और उस समय गरम-गरम गुलाबी मलाई चुरा कर खाने का तो क्या आनंद था. 

दोपहर में जब सब आराम करते थे तो मैं चुपके से निकल कर मिटटी की हांडी का ढक्कन खोल कर एक झटके में  ही पूरी मलाई साफ कर जाता था. 

दादी बहुओं (मेरी माँ-चाची) को बकती थी, उन पर संदेह करती थी कि मलाई ये खा जाती है, ये रोज का काम था. एक दिन माँ ने मुझे रंगे हाथों पकड लिया और दादी के दरबार में पेश किया, 

दादी बोली " मलाई खा गया तो क्या हुआ? मेरा पोता है, बड़ा होकर जवान बनेगा" अब इसे पकड़ कर मत लाना, और सबसे अधिक दूध-घी मेरे ही हिस्से में आता था. अब  ये सब एक गुजरे जमने की बातें हो गयी, 

दादी भी नहीं रही. सब पशुधन भी चला गया, हम संभाल नहीं सके, एक दिन फिर भैंस लेने की मन में आई, मैंने माँ को राजी किया, वो तैयार हो गई. लेकिन छोटे भाई ऐसा गणित समझाया कि पूरी योजना फेल हो गई. 

वो हिसाब लगा कर बोला "माँ देख ले हिसाब, एक भैंस खरीद कर उसे खिलाने पिलाने के बाद जो दूध हमें मिलेगा, उसमे हमें घाटा ही है और उसे पालने का सिरदर्द अलग से, इससे सस्ता तो "मोल" का दूध है. कोई समस्या नहीं है. 

इतने से ही मेरी योजना फेल हो गई. मैंने सोचा कि इस समस्या का हल अब मशीन से ही करना है कम से कम बच्चों को घी - दूध मिल जायेगा,

इसलिए मैं इस मशीन का अविष्कार किया, लोहे की मशीन, बिजली से चलने वाली, बस एक तरफ से चारा डालो, दूसरी तरफ से दूध निकालो, "नो टेंशन", 

अब मशीन बन गई. उसे मैंने चालू किया. और चारा डाला तो तो दूध निकलने लगा. मैं बहुत खुश हुआ. एक नया अविष्कार "लोहे की भैंस" बटन दबावों, चारा डालो, ढूढ़ निकालो, 

फिर अचानक देखा कि " दूध के साथ-साथ उसी पाईप से गोबर भी निकलने लगा" तब मुझे अपनी गलती का अहसास हुआ. 

अरे! मैं तो एक गोबर निकलने कनेक्शन बनाना ही भूल गया, गोबर को तो अलग रस्ते से निकालना पड़ेगा. नहीं तो दूध वाले रास्ते से ही आएगा, दूध का सत्यानाश हो जायेगा. 

 मेरा नया अविष्कार फेल होने की कगार पर था. मै सर पर हाथ रख कर सोच रहा था कि क्या किया जाये? इस समस्या का हल कैसे निकाला जाये? 

तभी महाराजिन की धमकी भरी आवाज सुनाई दी. "अरे! पांच बज गए हैं, क्या रात तक सोते ही रहोगे?" बस हो गया सत्यानाश, हमारी योजना पर पानी फिर गया, हमारे नए अविष्कार की भ्रूण हत्या हो गयी. 

मैंने आँख मलते हुए कहा " मेडम! अगर थोड़ी देर सबर कर लेती तो सात पीढ़ी बैठे-बैठे रायल्टी खाती. सारी आर्थिक समस्याओं का हल हो जाता. एक नई स्वेत क्रांति का जन्म हो जाता. 

तुम तो मुझे सिर्फ निट्ठल्ला ही समझती हो. अब देखो कितना नुकसान हो गया दुनिया का? जानम समझा करो, सोते से मत उठाया करो?

10 टिप्‍पणियां:

  1. वाह ललित भाई थोड़ा सा चुक गये नही तो पहिए के अविष्कार के बाद संसार का सबसे बड़ा और कामयाब अविष्कार होता। इसलिए चैन से सोना जरुरी है अगर कोई सोने दे तब ।

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  2. ..तो टूट गया मुंगेरीलाल का एक हाई टेक सपना ! च च !

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  3. हा हा हा हअ हा हा ...मज़ा आ गया पढ़ के.....

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  4. ऊपर की चन्द लाईनें पढते ही हमने तो आपके नाम से एक ब्लैंक चैक भी काट कर रख दिया था कि चलो भई ललित जी को एक मशीन का आर्डर बुक करा देते हैं...लेकिन ये क्या! आपकी महाराजिन ने तो आपके साथ साथ हमारे सपनों पर भी पानी फेर दिया :)

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  5. कोई बात नहीं महराज! अगले सपने में पूरा कर लेना अपने आविष्कार को।

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  6. जानम समझा करो ... हमे तो इतना ही समझ आया ।

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  7. सपने देकना अच्छी चीज़ है... कभी साकार भी हो जाते हैं:)

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  8. महाराजिन ने आपको उठाकर बहुत ही गलत किया, चलिए कोई बात नहीं . हो सकता है आगे के सपने में बिना चारा - घास खिलाये ही दूध निकलने की मशीन बना दें..................अग्रिमशुभकामनायें

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  9. ललित भाई,

    सपना देखना ही था तो कुछ और ऊंचा देख लेते...

    जय हिंद...

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