मंगलवार, 15 दिसंबर 2009

अजमेरे में बचपन के मित्र से सुखद मिलन

बचपन का मित्रबचपन में जब हम पढ़ते थे तो एक मेरा दोस्त था. जो पहली क्लास से ही मेरे साथ पढ़ता था. 

हम ज्यादातर समय एक दुसरे के साथ ही गुजारते थे. एक साथ पेंटिंग करते थे. हाथी, घोडा, गिलहरी और भी पुस्तकों में जितने भी चित्र दिए होते थे सभी बनाते थे. 

दोनों को ही पेंटिंग का बड़ा शौक था. गांव के स्कुल में पढ़ते थे तो वहां सरकारी स्कुल में पेंटिंग सिखाने जैसी कोई क्लास नहीं होती थी और गुरूजी लोग सिखाते भी नहीं थे. 

मेरे उस दोस्त का नाम चंद्रशेखर है.आठवीं पास करने के बाद उनका परिवार अजमेर चला गया. फिर हम अलग हो गये. 

अब अजमेर का नाम सुना था लेकिन कहाँ है? यह पता नहीं था. समय बीतता गया. कैलेण्डर पर धूल चढ़ती रही. पुरानी यादों पर धुल की परत जम गई और मैं भी भूल गया. 

एक साल पहले मेरा अजमेर जाने का कार्यक्रम बना. तब मुझे याद आया कि यहाँ तो मेरा बचपन का दोस्त भी रहता है. अगर उसका पता या फोन नंबर मिल जाए तो उससे भी मिल लेता, 

29  साल बीत गए मिले हुए, अगर मिल भी गए तो एक दुसरे को पहचानेंगे कैसे? 

पहचानना तो बाद में देखा जायेगा. पहले मिल तो जाये. 

अजमेर के एक साहित्यकार हैं अमरचंद जी वो मुझे दिल्ली में मिले थे. उनका नंबर था मेरे पास, मैंने उन्हें फोन लगाया और चंद्रशेखर को ढूंढने में मदद करने को कहा. तो अमरचंद जी कहा कि इतना बड़ा अजमेर हैं उसे कैसे ढूंढेंगे? 

चलो फिर भी कोशिश करते है. 

अमरचंद जी को पुरे एक साल फोन लगाता रहा. वो भी ढूंढते रहे. पिछली दीवाली से पहले धन तेरस को उनका फोन आया और उन्होंने मुझे चंद्रशेखर के पापा का नंबर दिया. 

मैं बहुत खुश हो गया . अमरचंद जी ने फूस में से सुई ढूंढ़ कर दी, मैंने उन्हें बहुत धन्यवाद दिया. चंद्रशेखर के पापा से मेरी बात हुई, उन्होंने पहचान लिया. और फिर चंद्रशेखर का नंबर दिया. 

मेरी उससे 29 साल बाद बात हो रही थी. उसके बाद मै देवउठनी एकादशी से पहले ही सपरिवार अजमेर पहुँच गया. उसने मुझे कहा कि स्टेशन पर तेरे को कैसे पह्चानुगा? 

मैं बोला- तू आ जाना फिर मैं पहचान लूँगा. और वह स्टेशन पर आया मैंने पहचान लिया. ये हम मित्रों का मिलन था. 29 साल बाद बचपन के मित्र से मिलना कितना सुखद होता है? 

7 टिप्‍पणियां:

  1. सुन्दर संस्मरण!

    बहुत मजा आया होगा ललित जी आपको अपने बचपन के मित्र से मिलकर!

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  2. ललित भाई,
    बचपन की दोस्ती बड़ी अनमोल होती है...वैसे आप कितने भी बड़े हो जाएं अगर बचपन का दोस्त अचानक आपके सामने आ जाए तो आप झट से पहचान जाते हैं...

    अगली कड़ी का इंतज़ार है...

    जय हिंद...

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  3. मैं अपने दो स्कूली सहपाठियों से ३५ साल बाद मिली थी। लगा कि कुछ भी नहीं बदला।
    घुघूती बासूती

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  4. अच्छा लगा आपका यह संस्मरण शुक्रिया

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  5. जिसे आप दिल से चाहते हों , उसे पहचान ही लेते हैं।
    बढ़िया संस्मरण।

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  6. बेहतरीन संस्मरण...इतने सालों बाद बचपन के दोस्त से पुनर्मिलन..कितना रोमांचकारी रहा होगा. इन्तजार है आगे जानने का.

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