बुधवार, 23 दिसंबर 2009

रात-रात भर दारू और पैसे बांटे गए मतदान के पूर्व

हमारे यहाँ स्थानीय निकायों के चुनाव हो रहे हैं. चुनाव आयोग के निर्देशों के बाद भी उसके आदेशों की खुले आम धज्जियाँ उड़ाई जा रही हैं. जैसे हमेशा होता रहा हैं नोट और दारू के प्रलोभन खूब चले हैं. 

प्रत्याशियों ने हद ही कर दी इस समय. रात-रात भर दारू और पैसे बांटे गए मतदान अपने पक्ष में करवाने के लिए. शायद कुछ ही लोग बचे होंगे जिन्होंने दारू नहीं पी होगी. 

इस दारू ने कहर ढाया है. १० दिन के चुनाव प्रचार के समय का शराब बिक्री का आंकड़ा उठाया जाये तो जितनी साल भर में नहीं बिकी होगी उतनी १० दिनों में बिक गई. 

मतदान के पहले की जिस रात को नेता लोग क़त्ल की रात कहते हैं वह रात वास्तविक में दो लोगों के लिए क़त्ल की रात ही बनकर आई. दारू ने कहर ढाया, जो दारू बांटी गई थी उसके घातक परिणाम निकल कर सामने आये.

एक व्यक्ति ने शराब पीकर नशे में अपनी पत्नी को फावड़े से काट कर उसकी नृशंस हत्या कर डाली. इस हत्या से पूरा गांव स्तब्ध है. 

मृतका की छोटी लड़की ने बताया की उसके बाप ने ही उसकी माँ से झगडा करके उसे फावड़े से काट डाला और उसके हाथ पैर अलग कर डाले.

एक व्यक्ति ने मुफ्त की इतनी ज्यादा दारू पी ली कि सुबह वो फिर उठ ही नहीं सका और उसकी मौत हो गई. इस तरह दो अर्थियां इस चुनाव में उठी. दो परिवार उजड़ गए. अब उनके बच्चों का पालन पोषण कौन करेगा? 

दारू बाँटने वाले प्रत्याशी या ढील देने वाली सरकार. रात को जब मैं गांव में घुमने निकला तो कुछ लोग इस ठण्ड के मौसम में सड़क पर पड़े थे. उन्होंने इतनी दारू पी डाली थी कि घर तक नहीं पहुँचना मुस्किल हो रहा था. 

जब सभी प्रत्याशियों की दारू मिल रही है तो पीने क्यों कसर रखी जाये. जब मुफ्त में बांटी जा रही है. तो लेने वाले क्यों छोड़ें? 

चुनाव आयोग को शराब के वेयर हॉउस से चुनाव के दौरान उठने वाली दारू पर नियंत्रण रखना चाहिए. एक तरफ फैक्ट्रियों से दारू निकलते रहती है, दूसरी तरफ कहा जाता है कि चुनाव आयोग ने शिकंजा कस रखा है, सब कुछ नियंत्रण में है. 

अगर सब कुछ नियंत्रण में होता तो इस तरह की घटनाएँ कैसे घट जाती जो लोकतंत्र को शर्मशार कर रही हैं. जब तक नोट और दारू से वोट ख़रीदे जाते रहेंगे और लोग बिकते रहेंगे तब तक लोग ऐसे ही मरते रहेंगे और ये दारू-रुपया-साड़ी आदि प्रलोभनों के दम पर नेता बनकर जनता का खून चूसते रहेंगे.

11 टिप्‍पणियां:

  1. इन अर्थियों के तो प्रमाण है पर उन अर्थियों का क्या जो अनदेखी रह जाती है

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  2. सब पर भारी है राज्‍य सरकारों को आबकारी विभाग से होने वाली भारी भरकम आय. और इसी के चलते पहले के छोटी मोटी गलतियों को अनदेखा किया जाता है फिर जब समस्‍या तालिबान की तरह सर उठाता है तो सरकार भी हाय-हाय के सिवा कुछ नहीं करती बस घोषणांए होती है. छत्‍तीसगढ के तो चांउर अउ दारू के महिमा जम्‍मो संसार म छाए है.

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  3. मुफ्त की पीते थे लेकर और जानते थे ----
    विषय गंभीर है और विचारणीय है।

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  4. मुफ्त का चंदन, घिस मेरे नंदन...

    जय हिंद...

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  5. ये सब इसीलिए मुमकिन हो पा रहा है क्योंकि जनता जागरूक नहीं है...पढे-लिखी नहीं है..अगर वो पढी-लिखी होती तो उसे भली-भांति पता रहता कि जितनी बोतल उसे शराब पिलाई जा रही है उससे भी कहीं ज़्यादा तो शोषण के जरिए उसका खून निचोड़ लिया जाएगा

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  6. विडम्बना तो यह है कि ये सब कभी भी बन्द नहीं हो सकता, भविष्य में और भी अति होगी, कोई चमत्कार ही शायद इसे रोक सके।

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  7. ये सब तब तक चलता रहेगा जब तक लोग यह नहीं समझेंगे की कोई भी चीज मुफ्त में नहीं मिलती उसकी कोई न कोई कीमत चुकानी पड़ती है . इसकी कीमत पूरा देश चुका रहा है .

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  8. एक दिन की दारू के बदले, पांच साल खून पिलाना पडेगा
    पता नही लोगों की समझ में यह बात कब आयेगी। वैसे दारु पिलाने वालों को भी समझना चाहिये कि दारु पीने वाला सभी प्रत्याशियों की दारु पीता है और मतदान वाले दिन वोट डालने की बजाय नशे में पडा रहेगा।

    प्रणाम स्वीकार करें

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  9. पहले गुलकंद ,बाद में चूना !
    नेताओं का धंधा जून !!

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  10. yahi sthiti ho gayi hai sab chunav prnali ki dosh nikalate hai par khud sudharane ki koshis nahi karate jo desh ki sewa karane ki safath lete hai wahi sabse jyada savindhan uallnghan karate hai..

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