मंगलवार, 22 दिसंबर 2009

कबूतरों ने दिया गौशाला के लिए लाखों का दान

हमारे देश में कबूतरों को दाना चुगाना बड़ा पुण्य का काम समझा जाता है. कुछ लोग नित्य ही नियम से कबूतरों को दाना डालते हैं और उनकी गुटर गुं सुनते हैं. लेकिन मैंने कभी नहीं सोचा था कि कबूतरों का बैंक में भी एकाउंट होगा, उनकी जमीन जायदाद होगी और कबूतर भी दान देने की हैसियत रखेंगे वो भी लाखों में.

यह संभव हो सका है राजस्थान के जोधपुर जिले के आसोप गांव में. आसोप गांव के वासी कई वर्षों से कबूतरों को दाना चुगा रहे हैं. दाना चुगाते-चुगाते इन्हें कबूतरों से इतना प्रेम हो गया कि किसी ने कबूतरों के लिए जमीन दान में दे दी तो किसी ने कबूतरों के दाना चुगने के लिए चबूतरे बना दिये. इस काम में गांव वालों ने बढ़-चढ़ कर अपनी जिम्मेदारी निभाई. 

ग्राम वासियों ने मिलकर एक "कबुतरान कमेटी" का गठन कर लिया. इस कमेटी के पास कबूतरों के नाम पर 365 बीघा जमीन भी है. जिसकी कीमत करोड़ों में है. कमेटी की ओर से कबूतरों ने अपने नाम से बैंक में खाता भी खुलवा दिया है. जिसमे लग-भग 20  लाख रुपया भी जमा है.

आसोप गांव में गौ पालन के लिए एक गौशाला की आवश्यकता भी महसूस की जा रही थी. गांववासियों ने 40 लाख की लागत से  एक गौशाला बनाने का निर्णय लिया. जिसमे सभी गांव वालों ने अपनी अपनी हैसियत से दान दिया. अब कबूतर भी कहाँ पीछे रहते बात गौ सेवा की हो रही थी. कबूतरों ने भी अपने बैंक खाते से 10  लाख रुपया गौशाला निर्माण में दान कर दिया. 

इस तरह एक पशु-पक्षी प्रेम की अनूठी मिशाल देखने मिली. आज मंहगाई के दौर में एक परिवार का भरण-पोषण होना मुस्किल हो गया है. उस दौर में पशु पक्षियों के संरक्षण के लिए आसोप गांव के निवासियों द्वारा उठाये गए कदम मेरा प्रणाम.

17 टिप्‍पणियां:

  1. पशु-पक्षी प्रेम की अनूठी मिसाल...जय हो!!

    उत्तर देंहटाएं
  2. यह जानकारी सुखद लगी। ऐसा भी होता है? वाह।

    सादर
    श्यामल सुमन
    09955373288
    www.manoramsuman. blogspot. com

    उत्तर देंहटाएं
  3. वाह!
    जोधपुर और आस पास के इलाके में ज्यादातर लोग शाकाहारी हैं. यहां के लोगों में प्राकृति व प्रकृति की रचनाओं के प्रति गहरी आस्था देखने को मिलती है. यही उसी की एक और मिसाल है.

    उत्तर देंहटाएं
  4. बढ़िया जानकारी !
    राजस्थान के कई गांवों में कबूतरों के लिए ऐसी सुविधा है पर अभी उन गांवों में इतना नहीं हुआ |

    उत्तर देंहटाएं
  5. जोरदार जानकारी दी है आपने ललित जी!

    उत्तर देंहटाएं
  6. वाह ऐसी मिशाल भारत में ही मिल सकती है !! जहां पत्थर भी पूजे जाती हैं ! गायों को भी माता कहके बुलाते हैं !! कितने दयालु इंसान हैं !!!

    उत्तर देंहटाएं
  7. चलो अच्छा है।
    इस तरह से कबूतर लुप्त होने से बच जायेंगे, जैसे चिड़िया होती जा रही हैं।
    एक अकाउंट क्षेत्र के गरीबों और भूमिहीन लोगों के लिए भी खुलवा दें तो कितना अच्छा हो।

    उत्तर देंहटाएं
  8. ानूठी और प्रेरणादायक जानकारी के लिये धन्यवाद्

    उत्तर देंहटाएं
  9. रिअली मजेदार और रोचक जानकारी, साथ ही यह भी दर्शाता है कि संगठित होकर अगर कोई काम किया जाए तो वह कहाँ तक पहुंचा सकता है !

    उत्तर देंहटाएं
  10. धन्य हैं आरोपा गांव वाले और आपको इस जानकारी पहुंचाने के लिये धन्यवाद.

    उत्तर देंहटाएं
  11. रोचक जानकारी है पशु-पक्षी प्रेमियों की।

    उत्तर देंहटाएं
  12. सबसे पहले कमेटी के सदस्यो को प्रणाम जो इतनी इमानदारी से अपना कर्तव्य निभा रहे है . हमारे यहां तो गौ शाला कमेटी ने गौ शाला की ईटे तक बेच दी .

    उत्तर देंहटाएं
  13. राजस्थान में मानवता अभी जीवित ही नहीं ....अन्य राज्यों की तुलना में श्रेष्ठ स्थिति में भी है । पशु-पक्षियों के लिए प्रेम तो यहाँ की परम्परा का हिस्सा ही है... जयपुर जैसे बडे नगरों में भी लोग अपनी छत पर या बाल्कनी में चिडियों के लिए पानी की व्यवस्था करते हैं और बाजरा इत्यादि डालते हैं । माँसाहार करने वालों की संख्या भी यहाँ कम ही है । आपने अद्भुत जानकारी दी है.. धन्यवाद ।

    उत्तर देंहटाएं
  14. कितना अनुकरणीय प्रयास है.....
    इस लाजवाब जानकारी के लिए आपका आभार!!

    उत्तर देंहटाएं
  15. इंसानो को कबूतरों से थोड़ा बहुत सीखना चाहिये।

    उत्तर देंहटाएं