मंगलवार, 29 जून 2010

जातिगत आधार पर जनगणना

हमारे देश में प्रति दस वर्ष में जनगणना होती है, परन्तु जातिगर जनगणना आजादी के बाद कभी नहीं हुई, अब जातिगत जनगणना की माँग उठ रही है, जातिगत जनगणना भी आवश्यक है, जिससे सभी जतियों की जनगणना होगी और वास्तविक आँकड़े का पता चल जाएगा।

हमारा भारतीय समाज वैदिक काल में वर्णों के आधार पर बंटा हुआ था। लेकिन उस काल में वर्ण में परिवर्तन होता था। यह स्थाई नहीं थे। कार्य के आधार पर वर्ण परिवर्तन हो जाता था। इसका उदाहरण महर्षि विश्वामित्र एवं जाबाला सत्यकाम हैं।

कालांतर में महाभारत के युद्ध के पश्चात जातियाँ बनी। समाज जातियों-उपजातियों में विभाजित हुआ। सभी जातियों ने अपने-अपने काम संभाल लिए,इससे उनका जीवन यापन चलता रहा। समाज में जातिगत व्यवस्था इतनी गहरे पैठ गयी कि उससे उबरना बहुत मुस्किल है।

इस जाति के झगड़ों का फ़ायदा अंग्रेजों ने उठाया और 200वर्षों तक राज करते रहे। बड़ी कठियाईयों से उन्हे खदेड़ा जा सका। 

जातियों के बीच वैमनस्यता का बीज अंग्रेज बो गये जो आज तक चल रहा है। उसी परिपाटी पर हमारे नेता एवं राजनैतिक पार्टियां चल रही हैं। प्रजातंत्र में वोटों के आधार पर सरकारें बनती हैं और बिगड़ती हैं।

बहु्संख्यक जातियों के अपने आंकड़े हैं जिसे वे राजनैतिक दलों के सामने रखते हैं और शासन से सुविधाएं एवं अपनी जाति के लोंगों के लिए पार्टी की टिकट की व्यवस्था करते हैं। कई ऐसे चुनाव क्षेत्र मैंने देखे हैं जहां सभी पार्टियां एक ही जाति के लोगों को अपना प्रत्याशी बनाती हैं।

अब वहां से कोई भी प्रत्याशी जीते लेकिन वो जाति का प्रतिनिधित्व अवश्य करता है। इस तरह यह जीत पार्टी की जीत न होकर जाति विशेष की जीत हो जाती है।

1931 में अंग्रेजों ने जातिगत आधार पर जनगणना कराई थी। उसके बाद आज तक जातिगत आधार पर जनगणना नहीं हुई है। अंग्रेजों के भारत से जाने के बाद हमारी लोकतांत्रिक सरकार ने सत्ता संभाली तो इन्ही आंकड़ों के आधार पर विकास की योजनाएं बनाई गयी।

जो ढर्रा एक बार चल निकला वो फ़िर आज तक चल रहा है। उपर की जातियों के विकास के अपने आधार थे तथा जिन्हे नीचे की जाति मान लिया गया उनके लिए नित नयी योजनाएं थी। लेकिन बीच की कुछ जातियां इन दोनो जातिगत व्यवस्थाओं के सांचे में नहीं बैठती थी वे पिटती रहीं और आज तक पिट रही हैं।

उनके दस्तकारी के काम धंधों पर औद्योगिकरण की मार पड़ी, जिससे वे बेरोजगार होते गए। हाथ के कारी्गर होने के कारण उनके पास खेती की जमीने कभी रही नहीं। इसलिए वे आज बड़ी कठिनाई से अपना जीवन बसर कर रहें।

इनमें कुछ जातियों की बहुलता थी,जिसे राजनीतिक दलों ने एक वोट बैंक के रुप में देखा। उसके प्रतिनिधियों को पार्टी पदों एवं सरकार में स्थान दि्या। सभी जातियां 1931 की जनगणना के आधार पर ही अपनी संख्या गिनवाती हैं और सरकारी योजनाओं का लाभ उठा रही हैं।

इनके बीच वे पिस रहें हैं जिनकी वास्तविक जानकारी सरकार के पास नहीं है। जिसके कारण उनके लिए कोई योजनाएं नहीं बन पा रही है और उनका विकास बाधित हो रहा है। आजादी के साठ वर्षों के बाद उनकी दयनीय हालत है।

मैने उनकी तकलीफ़ें करीब से जानने की कोशिश की और पूरे 3 साल लगाए अध्यन एवं सम्पर्क में। जो घुमंतु कबीले हैं उनकी भी वास्तविक जानकारी सरकार के पास नहीं है। इनकी जानकारी के लिए एक आयोग बनाकर बालकृष्ण रेणुके को रपट पेश करने कहा था। रपट सरकार को दे दी गयी लेकिन सदन के पटल पर अभी तक नहीं रखा गया।

हमने 2008 प्रधानमंत्री जी को ज्ञापन दिया था कि आगामी जणगणना जातिगत आधार पर करवाई जाए। जिससे सभी जातियों की आर्थिक,राजनैतिक, शैक्षणिक एवं रोजगार की वर्तमान स्थिति का पता लग सके।

आजादी के बाद जिन जातियों के विकास के लिए पानी की तरह पैसे बहाए गए उनका कितना विकास हुआ है ? यह पता जाति आधारित जनगणना से होगा। आजादी के समय एवं आज की इनके विकास की स्थिति का तुलनात्मक अध्यन होना चाहिए तथा जो वास्तविक हकदार है उसे उसका हक मिलना चाहिए।

आज भारत में कई जातियां ऐसी हैं जिनका राजनैतिक अस्तित्व ही नहीं है आजादी के पश्चात उनका कोई भी प्रतिनिधी संसद या विधान सभाओं में नहीं जा पाया। फ़िर वे कैसे अपनी बात पंचायत में रख सकते हैं उनकी सुनेगा कौन?

इसलिए मेरा मानना है कि जातिगत आधार पर जनगणना होनी चाहिए जिससे खाई अघाई जातियों के साथ विकास की राह देख रही अन्य जातियों को भी विकास के उजास की किरण दिखे। जिससे वंचित को भी उसका हक मिल सके। इस संबंध में हमारी अन्य शीर्ष नेताओं से भी चर्चा हुई। आवश्यक्ता पड़ने पर वह भी लिखा जाएगा कि उनकी क्या राय है।

13 टिप्‍पणियां:

  1. आपकी यह पोस्ट कई सवाल खड़े करती है।
    काफी अच्छा लिखा है आपने।

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  2. ... वैसे मेरा मानना है कि अब जातिगत आधार पर जनगणना, आरक्षण, चर्चा-परिचर्चा, वाद-विवाद, उठा-पटक के मुद्दे को भुलाकर आर्थिक आधार पर ये मुद्दे उठाए जाने चाहिये!

    समय बदल रहा है, बदल गया है लोगों के विकास व रहन-सहन में बदलाव आ गया है जो लोग आजादी के पहले गरीब थे अब अमीर हो गये हैं और जो लोग आजादी के पहले अमीर थे वो अब गरीब हो गये हैं इसलिये "जातिगत" मुद्दे के स्थान पर मेरा सुझाव तो यह ही है कि अब "आर्थिक" आधार को महत्व दिया जाना चाहिये!!!

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  3. वाह .... सन् 1931 का इतिहास दुहराया जा रहा है.

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  4. जानकारी पूर्ण लेख....जातिगत गणना के साथ आर्थिक पहलू भी लेना चाहिए

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  5. kshama karenmain aapse sahamat nahi hun.jaati aadhaarit ganana ke parinam acche nahi hone jaa rahe hain.....yeh politicians ki chaal hai......akhir gande politics ke liye sahi data ki jarurat hoti hai....

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  6. @ अरविंद
    आवश्यक नहीं है सभी मेरी बातों से सहमत हों।
    लेकिन मै जातिगत जनगणना का समर्थन करता हूँ।
    रही गंदी राजनीति की बात,तो वह जाति्गत जनगणना के बिना भी खेली जा रही ।इसे कौन रोक सकता है। नकारात्मक एवं सकारात्मक दोनो पहलु हैं।
    आपके विचारों का स्वागत है।

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  7. आप से सहमत है जी, लेकिन एक बात समझ नही आती, एक तरफ़ तो कानून बनता है कि भारत मै सब बराबर है, जो जात पात का भेद करेगा सजा का हक दार है, दुसरी तरफ़ यही नेता यही कानून बनाने वाले खुद ही जात पात का भेद भाव करते है, जनता मै कितना भेद भाव है इस जात को ले कर??? यह आप ब्लांग जगत मै ही देख ले, सब मिल कर रहते है, कोई किसी की जात नही जाना चाहता, जब कोई भी मिलता है तो अपनो से भी ज्यादा प्यार मिलता है, जब आम जनता मै भेद भाव नही तो...क्यो नही इन नेताओ को सजा मिलती जो जात के नाम पर वोट मांगते है, आम जनता को लडवाते है

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  8. '' सभी पार्टियां एक ही जाति के लोगों को अपना प्रत्याशी बनाती हैं। अब वहां से कोई भी प्रत्याशी जीते लेकिन वो जाति का प्रतिनिधित्व अवश्य करता है।
    इस तरह यह जीत पार्टी की जीत न होकर जाति विशेष की जीत हो जाती है''
    मई यह मानता हूँ पर दूसरी तरफ भी देखे प्रजातंत्र में आपके आजू बाजु में कुरूद ,राजिम बागबहरा धमतरी के चुनाव परिणाम के विशलेषण कुछ और कहते है साहू बहुल इलाका और जितने वाले सिख्ख ,बनिया ब्रह्मण कुर्मी ........... तो इसी बात नहीं आपका छेत्र ................ है पर भाई साहब हमें इन राजनीतिज्ञों को बताना समझाना और मजबूर करना जरुरी है नहीं तो ये हालत और कहा ले जायेंगे और हमारा प्रजातंत्र और देश खतरे में पड़ जायेगा और हम गु................लाम

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  9. @अजय त्रिपाठी

    अजय भाई,मैं स्थानीय परिदृ्श्य को सामने रख कर नहीं कह रहा हूँ कमोबेश पूरे भारत की यही स्थि्ति है। अगर आप आंकडों को दे्खें तो पूरी बात समझ में आ जाएगी। जिन जातियों को आज तक प्रतिनिधित्व नहीं मिला,उनके लिए विकास की कोई यो्जनाएं नहीं बनी,उनको इस जनगणना से अवश्य ही फ़ायदा होगा। ऐसा मेरा मानना है। अभी इस पर और लिखुंगा

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  10. soch ki yah disha bhi theek hai. jati aadharit जनगणना
    ho jaye, jinko labh milanaa hai, unko laabh mil jaye, fir uske baad pachas saal tak n ho.

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  11. उम्दा पोस्ट, आपके लेखन को हम नमन करते हैं,
    सभी विषयों पर अपना कीबोर्ड खटखटा देते हैं.

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