गुरुवार, 10 जून 2010

विमोचन समारोह में काव्य पाठ : भिलाई

कार्यक्रम स्थल पर हमारे पहुंचने के पश्चात कवि सम्मेलन का कार्यक्रम प्रारंभ हुआ। इस कवि सम्मेलन में श्री आरिफ़ जी गोंदिया वाले, अनिता कम्बोज, डॉक्टर शाहिद सिद्दकी, एवं एक अन्य कवि (उनका नाम भूल रहा हुं) कविता पाठ करने के लिए उपस्थित थे।

मंच की शुरुआत डॉ शाहिद सिद्द्की की गजलों से हुयी उन्होने अच्छा शमा बांध दि्या, उसके पश्चात अनिता कम्बोज ने अपनी रचनाएं पढी, फ़िर एक अनाम कवि ने, इस तरह पहला चक्र सम्पन्न हुआ।

काफ़ी अच्छा रहा, मंच ने बहुत तालियां और वाह वाह बटोरी। अभी तक मंच का संचालन कवि आनंद अतृप्त ही कर रहे थे। शायद कुछ रचनाओं से उन्हे तृप्ति अवश्य हुयी हो। इसके पश्चात काव्य संग्रह के विमोचन होना था। समस्त तिथि-अतिथि पहुंच चुके थे।

मंचासीन माननीय गिरीश पंकज जी, अशोक सिंघई जी, मनु जी, राजकुमार सोनी जी इत्यादि ने विमो्चन कार्य को सम्पन्न किया। इसके पश्चात गिरीश पंकज जी ने अपने विचार रखे। (इसे आप आडियो पर सुन सकते हैं) फ़िर अशोक सिंघई जी ने कविता पर अपने विचार रखे।

एक कविता आनंद अतृप्त जी ने सुनाई। काव्य संग्रह प्रख्यात गीत कार श्री गोपाल दास "नीरज" जी को समर्पित किया गया है।इनके काव्य संग्रह आ से अ तक चलते चलते में नयी कवित एवं गीतों के साथ एक नाटक भी प्रकाशित किया गया है जिसका नाम है नाटक नाटक और.........!

इनका यह नाटक मंचों से कई बार पुरस्कृत हो चुका है। आनंद अतृप्त जी ने यह नाटक प्रख्यात रंग कर्मी प्रेमसाईमन जी को समर्पित किया है

आनंद अतृप्त जी के गीत की बानगी देखिए--

 फ़िर चाहे तुम मृत्यु दे दो, पहले मुझको गाने ले दो॥

मैने ली है कलम हाथ में, तम को दूर भगाने को।
मेरे गीत ज्योति बन गए,सोई किरण जगाने को।
हर आंगन उजियारा हो,मेरे गीतों के प्रकाश से।
हर जड़ चेतन बन जाए,नव जीवन के नव प्रभात से॥

फ़िर चाहो तुम अमावश कर दो,पहले दीप जला लेने दो।
फ़िर चाहे तुम मृत्यु दे दो, पहले मुझको गा लेने दो॥

ना पागल फ़िर मनवा गाए,गीत मिलन की यादों के।
ना प्यासा मयूर मर जाए, ले अरमान सावन भादो के॥
मैं बनुंगा बूंद स्वाति की,चातक की प्यास बुझाने को।
मैं बंशी की धुन बनुंगा, राधा की आस जगाने को॥

फ़िर चाहे तुम प्रलय ला दो, बसंत बहार मना लेने दो।
फ़िर चाहे तुम मृत्यु दे दो, पहले मुझको गा लेने दो॥

मै से्ज का फ़ूल बनुंगा, अरमानों  की बेलों में।
थिरकुंगा मै चुम्बन बनकर,प्रीत प्यार के मेलों में॥
यौवन की दहलीजों पे, मै मिलन की गीत बनुंगा।
बे्सुध जि्स पर मीरा नाचे, मै वो अमर संगीत बनुंगा॥

फ़िर चाहे तुम चिता सजा दो, मधु श्रृंगार सजा लेने दो।
फ़िर चाहे तुम मृत्यु दे दो, पहले मुझको गा लेने दो॥

एक नयी कविता

हिंसा

क्या तुमने कबूतर दे्खा है?
सफ़ेद कबुतर
हां! देखा है मैने,
वो मरा हुआ था।
उसका रंग लाल था,खून से।

लोग कबूतर क्यों मारते हैं?
क्यों मारते हैं लोग कबूतर?
सुरभि, सुरेखा जी,सूर्यकांत जी, गिरीश पंकज जी, राजकुमार सोनी जी

इसके पश्चात कविसम्मेलन का दूसरा चक्र प्रारंभ हुआ। दूसरे चक्र में आरिफ़ भाई गोंदिया से पहुंच चुके थे, उनकी गजलें बहुत ही सुंदर थी। मैने एक गजल की कुछ पंक्तियां रिकार्ड की हैं आप आडियो सुन सकते हैं। अब समय हो चुका था।

चांद भी बादलों से झांक कर घर बैठे कवि सम्मेलन का आनंद ले रहा था-लेकिन हमें तो जाना था अपने घर की ओर जहां हमारा इंतजार हो रहा था। सबसे विदा लेके हम चल पड़े घर की ओर...................!



22 टिप्‍पणियां:

  1. जोरदार रपट है पढ़कर आनंद आ गया .....

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  2. आईये सुनें ... अमृत वाणी ।

    आचार्य जी

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  3. कवि सम्मेलन की बढ़िया रिपोर्टिंग साथ ही साथ सुंदर कविता सुनने को मिली...बढ़िया प्रस्तुति..बधाई ललित जी

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  4. मुझको गा ले दो॥


    शायद

    मुझको गा लेने दो॥

    होना चाहिये...


    ऑडियो तीनों में एक ही सुनाई दे रहा है...जरा चैक करिये.

    रपट उम्दा रही.

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  5. @ Udan Tashtari

    ठीक कर दिया गया है समीर भाई
    अब आप सुन सकते हैं।
    तीन एम्बेड कोड एक साथ लगाने पर यह समस्या आती है।
    अलग अलग लेने के बाद भी एक ही कोड में कन्वर्ट हो जाता है।
    इसलिए पोस्ट करने के बाद सुधारना पड़ता है।

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  6. अब सुन पाये गिरीश भाई का आख्यान और अन्य रचनायें. आनन्द आ गया.

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  7. मैंने आनन्द अतृप्त जी को कल सूचना दी थी वे बहुत ही खुश हुए। अभी भी तुम्हारे भीतर एक रिपोर्टर काम करता है, यह अच्छी बात है।

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  8. अभी कविता पठन हुआ। गज़ल श्रवण का समय शाम के लिये रखा हू। प्रस्तुति तो बेमिसाल रहती ही है। आभार!!!!! (फोटू भी चकाचक हे हमर मन के) फ़िर चाहे तुम चिता सजा दो, मधु श्रृंगार सजा लेने दो।
    फ़िर चाहे तुम मृत्यु दे दो, पहले मुझको गा लेने दो॥

    वाह!!!

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  9. अभी भी कोई रोकेगा क्या उन्हें गाने से.....

    अद्भुत अभिव्यक्ति....

    कुंवर जी,

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  10. भईय्या आप बहुत बढिया लिखते हैं???

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  11. दिनों बाद इधर आया हूँ.कुछ मजबूरियाँ रहीं..वरना हम भी एक ब्लागर थे..खैर..अच्छी रपट लगी.....एक आग्रह है कि [शमा बांध दि्या,]इसे बिलकुल न बांधे वरना समां [सभा /महफ़िल] सूनी पड़ जायेगी..क्योंकि कहीं शमा बुझ गयी तो. ..
    गुस्ताखी क्षमा करें..

    फुर्सत मिले तो हमज़बान पर शाया रंजना जी की कविताओं पर नज़र सानी की जाए.

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  12. सुन्दर प्रस्तुति ।
    रिकोर्डिंग बहुत साफ है ।
    आनंद आया ।

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  13. सच में पढ़ कर मज़ा आ गया

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