गुरुवार, 3 जून 2010

दिल्ली यात्रा-6 निजामुद्धीन से छत्तीसगढ़ की ओर

यात्रा वृतान्त आरम्भ से पढ़ें 

जब पवन चंदन जी से अविनाश जी ने बात करवाई थी तब मुझे अंदाजा नहीं था कि वे इतनी जल्दी पहुंच जाएगें हमारे से मिलने। जबकि उनका निवास निजामुद्दीन से आधे घंटे की दूरी पर है।

अविनाश वाचस्पति एवं ललित शर्मा
पवन चंदन जी ने पूछा कि आप लोगों ने उपर हमारा ट्रैफ़िक कैबिन देखा कि नहीं। हमारे न में जवाब देने पर हमें ट्रैफ़िक केबिन दिखाने ले गए। वहां हमने देखा कि ट्रेनों का परिचालन किस तरह से होता है तथा रुट क्लियर और लॉक कैसे किया जाता है?

लाईन क्लियर होने पर कैसे दि्खता है पैनल बोर्ड पर। सीमेंस बहुत ही बढिया सिस्टम लगा है जब ट्रेन प्लेट फ़ार्म पर आती है तो वह भी दिखाई देती है संकेतों में, जब गुजर जाती है तो सिगनल की लाल बत्ती भी दिखाई देती है। यह जानकारी हमारे लिए भी महत्वपूर्ण थी। अगर कोई बच्चा जिज्ञासावस पू्छ ले तो हम उसके प्रश्न का जवाब दे सकते थे।

जब पवन चंदन जी के साथ हम उनके केबिन रुम में बैठे थे तो इच्छा हुयी कि उनसे कुछ कविताएं ही लगे हाथ सुन ली जाएं। लेकिन हमारी तरह उन्हे भी कविताएं याद नहीं रहती, बहुत याद करने पर कुछ याद आया और उन्होने हमें सुनाया।

पवन चंदन जी
जिसे मैने रिकार्ड कि्या, बिना एडिट किए ही प्रस्तुत कर रहा हूँ। इधर हमें अपनी ट्रेन की चिंता थी कि कब आएगी? पवन चंदन जी ने कहा कि आप चिंतित ना हों ट्रेन प्लेट फ़ार्म पर आएगी तो हमें यहीं सिगनल से पता चल जाएगा तब प्लेटफ़ार्म पर चल पड़ेगें। थोड़ी ही देर में ट्रेन प्लेटफ़ार्म पर आने के संकेत मिल गए और हम प्लेट फ़ार्म की ओर चल पड़े।

निजामुद्दीन रेल्वे स्टेशन पर ललित शर्मा, अविनाश वाचस्पति, पवन चंदन जी
आज कल भारतीय रेल में पता नहीं किस तरह के प्रशासनिक अधिकारी बैठे है जिनके दिमाग का पता ही नहीं चलता कि वे क्या करेंगें। प्रत्येक डिब्बों पर दो-दो नम्बर डाल रखे हैं। अप के अलग और डाउन के अलग्।

अब सवारियाँ पूछते हुए घूमती हैं कि इस डिब्बे का कौन सा नम्बर है। हम अपने डिब्बे की तलाश में जाने लगे तो दे्खा कि एक डिब्बे पर एस 11 लिखा है और उसके नीचे एस 4 लिखा है। अब उसे एस 11 समझे कि एस 4, सवारियाँ पूछते हुए घूम रही थी। हमने तो समझ लि्या कि यह 11 ही है और उससे अगले डिब्बे एस10 में अपना सामान रख दि्या। इस डिब्बे पर कोई नम्बर नहीं डला था लेकिन अंदाजा लगा लिया था हमने।

पवन चंदन जी अगले डिब्बे तक देखने गए कि अगला एस 9 होगा तो इसे एस 10 माना जाएगा। हमारा अंदाजा भी सही निकला कि यह एस 10 ही था। फ़िर वहीं डिब्बे के पास खड़े होकर चर्चा करने लगे अविनाश  जी ने डिब्बे की खिड़की के सरिए को पकड़ रखा था। कहने लगे कि आप चिंता ना करें गाड़ी चलने लगेगी तो रोक दी जाएगी हमने इसे पकड़ रखा है। 

ट्रेन में बैठे मै सोच रहा था कि दिल्ली वालों ने बरसों पुरानी कहावत को बदल कर रख दि्या। यह ब्लागिंग से ही संभव हुआ। मैने भी अल्प जीवन में हजारों यात्राएं की हैं लेकिन अबकि बार सब कुछ अलग ही था।

बचपन से सुनता आया कि "दिल्ली वालों की आँखे तोते जैसी होती हैं।" पहचान कर भी नहीं पहचानते आँखे फ़ेर लेते हैं कि कहीं गले ना पड़ जाए। लेकिन ऐसा नहीं हुआ, दिल्ली वाले खुब गले लगे, मिले, बैठकी भी हुई, दिल से दि्ल खोल कर मिले।

अपने जीवन के कीमती समय में कुछ समय निकाल कर हमें दि्या। अविनाश जी ने तो 5 दिनों की छुट्टी भी ले ली थी। हमारे दिल्ली पहुंचने से लेकर वापसी के लिए ट्रेन में सवार होने तक साथ रहे। दिल्ली वालों का स्नेह अभिभूत कर गया जिसका सुखद अहसास आजीवन रहेगा जिसे मैं शायद जीवन के अवसान तक भूल ना पाऊं।

ये मधुर यादें स्मृति्यों में शेष रहेंगी। एक नया अध्याय जुड़ चुका था मेरे जीवन में... ईश्वर करे यही प्रेम-सद्भाव कायम रहे। कनिष्क कश्यप जी ने हमारे आग्रह पर कुछ चित्र और लिए, तब तक गाड़ी का सिगनल हो चुका था। भारी मन से हमने भी विदा ली, ट्रेन प्लेटफ़ार्म को छोड़ रही थी और हम चल पड़े थे दि्ल्ली की मधुर यादों को साथ लिए अपने गाँव की ओर..जारी है, आगे पढ़ें 
(अगली पोस्ट में एक अदृश्य ब्लागर जो किसी को दिखाई नहीं दि्या और मेरे साथ रहा  अनवरत बना रहा इस यात्रा में)

21 टिप्‍पणियां:

  1. आईये जाने .... प्रतिभाएं ही ईश्वर हैं !

    आचार्य जी

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  2. इतना आत्मीय संस्मरण
    बहुत खूब
    आपने भी तो दिल जीता दिल्ली वालों का

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  3. बहुत मस्त वृतांत रहा आपकी दिल्ली यात्रा का. पवन जी को सामने सुनने का मेरा भी सौभाग्य रहा है.

    बहुत आनन्द आया यहाँ सुन कर.

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  4. आपकी पोस्ट धीरे-धीरे एक नशे का काम कर रही है।

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  5. उत्सुक्ता बढ रही है उस अद्रिश्य ब्लोगर के बारे मे जानने की।वाकई ऐतिहासिक यात्रा और यात्रा सन्समरण। ललित भाई को बहुत बहुत बधाई। अब बस यहां मै रेल के डिब्बे के पास खडे तीनो आदरणीयो के नाम इस तरह लिखूँ तो सही है कि नही बताइयेगा "बाये से दाएँ श्री ललित शर्माजी , श्री अविनाश वाचस्पतिजी और श्री पवन चन्दन जी"।

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  6. @सू्र्यकांत गुप्ता जी,

    बिलकुल आपने सही पहचाना
    हम आपको सैल्युट करते हैं।

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  7. सही है ललित भाई , ये ब्लोगिंग का ही असर है ।
    वर्ना दिल्ली वाले तो पडोसी तक को नहीं पहचानते ।
    बढ़िया चल रहा है , यात्रा विवरण ।
    अविनाश जी तो दिल्ली ब्लोगर्स की रीढ़ की हड्डी हैं ।
    ये पवन जी की आवाज़ तो सुनी हुई सी लग रही है ।

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  8. बहुत बहुत धन्यवाद भाई जी। अउ महराज सैल्यूट करे के जरूरत नई ये गा। मही भुला गे रेहेन्व पैलगी करे बर बिहनिया ले महराज ला। तेखर बर ध्यान झन देबे अउ पैलगी ल स्वीकार कर लेबे। भारी नशा होगे हे महराज। ये नशा ला छोड़वाये के उपाय बता भाई। अब जाथौ। बने हाँसत हाँसत बीते आज के दिन्…………॥

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  9. "दिल्ली वालों की आँखे तोते जैसी होती हैं।" पहचान कर भी नहीं पहचानते आँखे फ़ेर लेते हैं कि कहीं गले ना पड़ जाए। ... अच्छा लगा ये जानकर कि भ्रम मिथ्या निकला :)

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  10. ...बहुत सुन्दर ... ललित भाई ये अदृश्य ब्लागर की पहेली क्या है !!!!

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  11. ये ब्लॉग्गिंग का चमत्कार ही है कि एक दूसरे को पहली बार मिलने पर भी ऐसा नहीं लगता कि पहली बार मिल रहे हों ...
    बढ़िया..विस्तृत ...रोचक चर्चा

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  12. बहुत ही बढ़िया यात्रा विवरण ,ललित जी आपने इस ब्लोगर मिलन को वाकई एक सार्थक मुकाम देने की कोशिस की है अपने पोस्ट के जरिये ,इससे अन्य ब्लोगर भी ब्लोगिंग के महत्व को समझने की कोशिस करेंगे |

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  13. रोचक! इंतजार है अगली पोस्ट का।

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  14. वो जो आपको चंदन जी ने दिखाया था पैनल, वो ही तो रेलवे को सही समय पर चलाने की मशीन है। नहीं तो इतने बडे स्टेशन की हजारों लाइनों में रोजाना दुर्घटना होती रहे।

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  15. आप चिंता ना करें गाड़ी चलने लगेगी तो रोक दी जाएगी हमने इसे पकड़ रखा है।
    jivant.................rochak..........mazedar............

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  16. हमे तो जलन होने लगी है जी आप से :) काश हम भी भारत मै ही रहते तो कभी कभी दिल्ली आगारा जाते तो मित्र गण ऎसे ही मिलते... बहुत सुंदर यात्रा विवरण

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  17. सस्पेंस छोड कर जा रहे हो जी, इस पोस्ट में
    आज नींद कैसे आयेगी? कौन श्री भूतनाथ जी (अमिताभ बच्चन) थे आपके साथ

    प्रणाम

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  18. dilli ke iss naye chehare ko mai naman kartaa hu. kaash, hamare blagaro kee tarah vahaan ke sahitykar bhi manushy ban jayen. blog ne blagaro ko manushyataa kaa path parhaya. vaise ye log pahale se hi manushya rahe honge. varanaa achanak koi itanaa achchha kaise ho sakata hai. dilli ke bloger mitro ko meraa salaam..isee tarah dariyadili dikhate rahe.

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