मंगलवार, 27 अक्तूबर 2009

रंग भेद करने वाले आस्ट्रेलियाई जंगली

आस्ट्रेलिया में भारतीय छात्रों पर लगातार हमलों के समाचार विगत एक वर्ष से आ रहे हैं. एक तरफ आस्ट्रेलिया सरकार इन छात्रों की सुरक्षा की गारंटी देती है, दूसरी तरफ इन पर फिर हमला हो जाता है. ये कृत्य लगातार चल रहा है. 

आज फिर रंग भेद के कारण एक और भारतीय छात्र को हमले का शिकार होना पड़ा.जिल्लत सहनी पड़ी. 

आस्ट्रेलियाई अखबार "द एज" में छपी खबर के अनुसार यह घटना वहां के समयानुसार १२.४५ बजे घटी. एक सिख छात्र बस स्टाप पर सो रहा था, तभी पांच आस्ट्रेलियाई गुंडों के झुंड ने इस पर हमला कर दिया.छात्र को मुंह पर चोट आई है. इसके सर पर पीछे से वार करते हुए, उसकी पगडी निकाल कर फेंक दी. 

इस तरह की भारतीय छात्रों पर हमले की खबरें लगातार आ रही है. मेरा कहना है कि क्यों जा रहे हो वहां मार खाने के लिए? 

क्या अपने देश में तुम्हारे पढने लायक कोई कोर्स ही नहीं है ? क्या आस्ट्रेलिया सरकार तुम्हे मुफ्त में पढ़ा रही है? या तुम्हे वहां जा कर पीटने में ही स्वाद आ रहा है? 

रोज एक खबर बन जाते हो. यहाँ पर तो हमारा कलेजा जल जाता है कि हमारे देश के विद्यार्थियों पर हमला हो रहा है. 

आस्ट्रेलियाई लोगो की दुष्टता का परिचय तो हमें २०-२० के वर्ड कप में ही देख लिया था जब उन्होंने जीत के जोश में शरद पवार के तों ट्राफी छीनते हुए मंच से उतार दिया था. 

इससे ही पता चल गया था कि ये कितने सभ्य हैं? ये रंग भेद करने वाले जंगली हैं, इन्हें सभ्य समझने की भूल नहीं करना चाहिए. 

हमारे भारत में भी उच्च श्रेणी के शिक्षा संस्थान है. विदेशों से विद्यार्थी शिक्षा ग्रहण करने यहाँ पर आ रहे हैं.

अगर यहाँ के उच्च शिक्षा संस्थानों की फीस ज्यादा है. तो उसे कम करावो, नहीं तो फिर क्यों नारा लगाते हो,"छात्र शक्ति-राष्ट्र शक्ति" अपनी शक्ति दिखाओ, मांगे मनवावो, प्रजातंत्र है. अगर आपकी बात सत्तारूढ़ सरकार नही सुनती तो पॉँच साल में बाहर का रास्ता दिखाओ और जो छात्र हित में काम करे उसे गद्दी पर बिठाओ. 

यहाँ भले ही रुखी-सूखी खाओ, पिटो-जेल जाओ, कोई बात नहीं-लेकिन दुसरे देशों में जाकर तो मत मार खाओ. 

हमारे देश में आज भी किसी चीज की कमी नहीं है. कमी है सिर्फ इच्छा शक्ति की, विदेशों में जाकर जलील होने से अच्छा है, जो संसाधन अपने देश में हैं, उनका ही उपयोग और उपभोग करो, कमी है तो नए संसाधन जुटाओ. पर मार खाने के लिए बाहर मत जाओ.
"रुखी सूखी खाय के,ठंडा पानी पी.
देख पराई चुपड़ी, मत ललचावे जी"



5 टिप्‍पणियां:

  1. बाप ने इंडिया में घूस खाई थी, इसलिए बेटा ऑस्ट्रेलिया जाकर मार खाता है !

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  2. "क्यों जा रहे हो वहां मार खाने के लिए? क्या अपने देश में तुम्हारे पढने लायक कोई कोर्स ही नहीं है ?"

    हमारे पास अपनी कोई ठोस शिक्षानीति, जो हमें हमारी संस्कृति और संस्कार से अवगत कराते हुए विश्व में उच्च स्थान दिलाए, होती तो हमारे लोगों को पढ़ने के लिए विदेश जाने की भला क्या जरूरत होती?

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  3. @जी.के. अवधिया जी,जो संसाधन अपने देश में हैं, उनका ही उपयोग और उपभोग करो, कमी है तो नए संसाधन जुटाओ. पर मार खाने के लिए बाहर मत जाओ.
    अवधिया जी आपने शायद पुरा नही पढा, मैने और भी बहुत कुछ कहा है,हमारे देश मे किसी चीज की कमी नही है। यहां पर भी अच्छे उच्च शैक्षणिक संस्थान हैं, लेकिन लोग डालर कमाने के चक्कर मे ज्यादा जाते है। आम के आम गुठली के दाम बनाने के चक्कर मे खा ...........

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  4. ललित जी,

    मेरी टिप्पणी का आशय आपकी भावना को ठेस पहुँचाना कदापि नहीं था। ये तो एक भड़ास थी मेरी अपने देश की अपनी ही संस्कृति और सभ्यता को भुला देने वाली शिक्षानीति के प्रति। फिर भी मैं क्षमाप्रार्थी हूँ यदि आपको जरा भी तकलीफ हई हो तो।

    मैं अच्छी तरह से समझता हूँ कि आपको अपने लोगों पर किए गए अन्याय से पीड़ा होती है इसीलिए तो आपने इतना अच्छा पोस्ट लिखा है।

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  5. आपका कहना सही है कि क्या अच्छे शिक्षण संस्थान हमारे देश में नहीं हैं...लेकिन क्या आप यही बात खेल प्रशिक्षण के बारे में कह सकते हैं...सारे बच्चे सिर्फ पढने के लिए ही वहां नहीं जाते....मेरे पड़ोस का एक लड़का लॉन टेनिस का अच्छा खिलाडी है...भारत में उसका रैंक 62 है उसे वहां के एक अच्छे क़ल्ब से खेलने और प्रशिक्षण लेने के लिए स्कॉलरशिप मिली...साथ साथ पढाई जारी रखने के लिए उसने वहां के कॉलेज में दाखिला भी ले लिया और यहाँ कॉलेज से नाम कटवा लिया...तभी भारतीयों पर ये हमले शुरू हो गए...घरवालों ने उसे भेजने से इनकार कर दिया..उस लड़के का एक साल बर्बाद हो गया और अच्छे प्रशिक्षण का मौका भी गंवाया उसने

    इन हमलों कि कड़ी निंदा करनी चाहिए और हर स्तर पर इसका विरोध करना चाहिए.

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