शनिवार, 17 अक्तूबर 2009

छद्म मानवतावादी नक्सलियों का रुदन

क्या समय आ गया है? आज ये दिन भी देखना पड़ रहा है. नक्सलियों के समर्थन में बुद्धिजीवी कलमकार मानवाधिकार को लेकर अब गोष्ठियों की फुलझडियों छोड़ने वाले है. जबकि केंद्र सरकार का नक्सलियों के खिलाफ युद्ध जैसा आक्रामक अभियान शुरू ही नहीं हुआ है. 

समाचार है कि २० से २४ अक्तूबर तक दो बड़े सेमीनार आयोजित किये जाने वाले हैं. भाई मै तो विशुद्ध किस्से कहानियों, कविताएं लिखने वाला जीव हूँ. 

परन्तु जो समाचार कई वर्षों से सुनते पढ़ते आया हूँ. उसने आज मुझे इस विषय पर लिखने को मजबूर ही कर दिया. 

मैंने प्रभावित क्षेत्र देखा है. वहां पर बहुत ही भौगौलिक विषम परिस्थितियां हैं. घने जंगल, पहाडियां, सड़कों का अभाव, लगता है विकास के दायरे से ये क्षेत्र छूट गया है. मुझे लगता है, इसका एक मात्र कारण सिर्फ नक्सली आन्दोलन ही है. इनके कारण उस क्षेत्र में विकास अवरोधित है. 

एजेंसियों को वहां पर काम नहीं करने देते. अगर कोई करता है तो उसकी जान लेने में भी नहीं चूकते. इसलिए कौन मरने जायेगा? 

कहते है ना दो सांडों के झगडे में खेत का ही नाश होता है, सिर्फ मासूम लोग ही मारे जा रहे हैं. जिनकी अर्थी पर कोई रोने वाला नहीं है. 

हजारों पुलिस के जवान शहीद हो गए, हजारों मासूम लोग मारे गए और निरंतर मारे जा रहे हैं. तब ये मानवता की दुहाई देने वाले मानवतावादी कहाँ किस जगह रहते हैं? क्या उन्हें दिखाई नहीं देता? 

आज जब सरकार ने बन्दूख का जवाब बन्दूख से देने के लिए कमर कस ली है, तो कार्यवाही से पहले ही हाय तौबा मचा रहे है. क्या पुलिस मानव की श्रेणी में नहीं है? क्या उनका परिवार नहीं है? क्या उनके बाल बच्चे नहीं हैं? 

ये भी किसी के भाई-बहन, माँ-बाप,पति-पत्नी हैं.जब ये शहीद होते हैं तो मैंने आज तक नहीं देखा की किसी मानवतावादी संगठन ने एक आंसू भी इनकी शहादत पर बहाया हो?

हमारा भारत अहिंसा वादी लोकतान्त्रिक राष्ट्र है. यहाँ हिंसा के लिए कोई जगह नहीं है. जनता का,जनता के लिए, जनता के द्वारा शासन है, 

निज का शासन है. अगर कोई समस्या है, तो उसके हल करने के प्रजातान्त्रिक तरीके है. मुख्य धारा में शामिल होकर वोट के माध्यम से सत्ता पर काबिज हो और लोकतंत्र का एक हिस्सा बनो. ऐसा करने से किसने रोका है? 

सभ्य समाज में हिंसा के लिए कोई स्थान नहीं होता.ये जानना चाहिए.

4 टिप्‍पणियां:

  1. कथा सार ये कि सांड को लडाने के लिये हमेशा पाकिस्तान भेज देना चाहिये...
    मजाक से इतर ..गंभीर बात तो ये है कि इस समस्या को शायद ठीक से समझने की कोशिश ही नहीं हो रही है।

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  2. आप की बात सही है....लेकिन अब चुनाव लड़ना आमजन के बस की बात नही।ऐसे में लोकतंत्र भी बेचार नजर आने लगता है।

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  3. ललित जी,

    मेरे चिट्ठे पर आने एवं उत्साहवर्धक टिप्पणी के लिये धन्यवाद!

    मुझे अन्तरजाल पर छत्तीसगढ़ी का कोई आनलाइन शब्दकोश नहीं मिला है। किन्तु केन्द्रीय हिन्दी संस्थान, आगरा हिन्दी की ४८ लोकभाषाओं के शब्दकोश बनाने में लगा हुआ है। आशा है कुछ महीनों में कुछ सामने आये।

    http://www.hindisansthan.org/hi/project/Hindi-Lok-Shabd-Kosh.htm

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