रविवार, 10 जुलाई 2016

रामायणकालीन किष्किन्धा (हम्पी) एवं उसकी जलप्रबंधन प्रणाली : दक्षिण यात्रा 15

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हम्पी के विषय में मान्यता है कि यह रामायण काल का वानर राज्य किष्किन्धा है। शायद इसकी वजह यहाँ के वानर रहे होगें। हम जानते हैं कि हम्पी मंदिरों का शहर है, पम्पा का अपभ्रंश हम्पी नाम है। पम्पा तुंगभद्रा नदी का पुराना नाम है। हम्पी इसी नदी के किनारे बसा हुआ है। हम्पी से पहले एनेगुंदी विजयनगर की राजधानी हुआ करती थी। हम्पी को राजधानी बनाने के पीछे मूल कारण यहाँ की भौगौलिक संरचना है। चारों तरफ़ पहाड़ी से घिरे होने के कारण सुरक्षा की दृष्टि से इसे बसाया गया तथा राजधानी के लिए जल उपलब्ध कराने के लिए तुंगभद्रा नदी भी थी। मनुष्य को जीवन रक्षा के लिए जल की आवश्यकता होती है, जहाँ प्रचूर मात्रा में जल उपलब्ध हो और सामरिक दृष्टि से सुरक्षित हो ऐसे स्थान पर ही राजधानी बनाई जाती थी।
हम्पी नगर का माडल जिसके माध्यम से जलापुर्ति प्रबंध को बताया गया है।
हम्पी बहुत बड़ा नगर है, कल्पना से भी बड़ा। इसकी तुलना रोम से की जा सकती है। भवनों एवं मंदिरों का नगर है यह। विशाल क्षेत्र में जल पहुंचाने के लिए जल प्रबंधन प्रणाली का विकास बहुत ही नायाब तरीके से किया गया है। यहाँ का जल प्रबंधन तत्कालीन अभियांत्रिकी बड़ी मिशाल है। कर्नाटक की सबसे बड़ी नदी तुंगभद्रा इसी भूभाग से बहती है और इस भूभाग की संरचना ऐसी है कि बहती हुई नदी अचानक अपनी ऊंचाई खोकर नीचे की ओर आती है, परिणामतः यह अत्यधिक गति पकड़ लेती है और प्रचंड वेग से बहती है। बस इसी वेग का सदूपयोग यहाँ की जटिल जल प्रणाली को संचालित करने के लिए किया गय।
प्रणालिकाओं के माध्यम से तुंगभद्रा नदी जल वितरण प्रबंध

पत्थर की नालियाँ बनाकर शाही इलाके में जल लाया गया। नदी के वेग का उपयोग कर मुख्य प्रणालिका द्वारा जल शहर में आता था तथा उसके पश्चात अन्य लघु प्रणालिकाओं द्वारा इसे विभाजित कर अन्य स्थानों पर भेजा जाता था। विरुपाक्ष मंदिर में विशाल पाकशाला है। एक समय में यहाँ हजारों लोगों के लिए भोजन प्रसाद की व्यवस्था होती थी, तुंगभद्रा नदी का शीतल जल प्रणालिकाओं के माध्यम में पाकशाला में निरंतर वर्तमान में भी प्रवाहित हो रहा है। पाकशाला में जल की व्यवस्था करने के लिए किसी कुंए या बावड़ी पर निर्भर नहीं रहना पड़ता।
विरुपाक्ष मंदिर के भोजनालय में प्रणालिका के माध्यम से तुंगभद्रा से सतत जलापूर्ति
प्रणालिकाओं से नदी का जल शहर में लाकर उसे लघु प्रणालिकाओं द्वारा विभाजित कर पुष्करी को भी भरा जाता था। शाही आवास क्षेत्र में काले कड़प्पा पत्थर से निर्मित एक सुंदर पुष्करी है, जिसे नदी के जल से भरने की व्यवस्था की गई है। इसके बाद आवास क्षेत्र के मध्य में एक कुंआ है जिसे नदी के जल से भर दिया जाता था। उसके पश्चात कुंए के जल का उपयोग किया जाता था। कुंए से जल निकाल कर प्रणालिकाओं के माध्यम से आगे बढा दिया जाता था। इससे राज निवास, सैनिक छावनी, महानवमी दिब्बा, अंत:पुर एवं अन्य आवासों तक समुचित व्यवस्था की जाती थी। 
की होल कूप हम्पी
शाही आवास के मध्य में मुख्य मार्ग के समीप घुड़साल है, जहाँ आगंतुक अपने अश्वों को बांध कर विश्राम देते थे। यहाँ पर लगभग 40 फ़ुट लम्बे एकाश्म पत्थर की नांद (खेळ) रखी हुई है, जिसका उपयोग पशुओं की प्यास बुझाने के लिए किया जाता था। हम्पी नगर में एक शानदार तकनीक का उपयोग कर जल प्रबंधन किया गया है। यहाँ राजधानी का निर्माण करना तुलुवा वंश के शासकों के लिए दूर दृष्टि का परिचायक था। विजय नगर साम्राज्य सारे दक्षिण में छा गया और एक सुदृढ़ राज्य बना, भले की कालखंड पृथक हो परन्तु मगध से कम करके नहीं आँका जा सकता। जारी है आगे पढें…

1 टिप्पणी:

  1. ज्ञानवर्द्धक जानकारी व सुंदर चित्र। सही कहा है आपने ये प्राचीन जल प्रबंधन प्रणालियाँ तत्कालीन अभियांत्रिकी के लिए सीख लेने का विषय है। धन्यवाद...

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