रविवार, 24 जुलाई 2016

कुल्टी मदद फ़ाऊंडेशन पश्चिम बंगाल में एक दिन

सांसद जी से विदा लेकर आगे के कार्यक्रम के लिए चिरकुंडा होते हुए बराकर के लिए चल पड़े। इस यात्रा मे बिकास बाबू की भूमिका महत्वपूर्ण रही और धनबाद के सर्वमाननीय पत्रकार साथी मृत्यूंजय पाठक जी का भरपूर सहयोग मिला। संझा झमाझम बारिश हुई। .आज बंगाल झारखंड यात्रा का छठवां दिन था। चिपचिपाती उमस भरी गरमी से निजात पाने वतन वापसी का भी दिन था। बराकर के पास के ही कस्बे से एक इंस्ट्यूट द्वारा आमंत्रण प्राप्त हुआ था कि उनके संस्थान मे नये मीडिया पर कुछ बोलना है। सुबह नौ बजे की ट्रेन पकड कर हम कुल्टी पहुंच गये। यह कस्बा आसनसोल के समीप ही माना जा सकता है।
कुल्टी स्टेशन पश्चिम बंगाल
इस स्थान पर हमारी भेंट रबिशंकर चौबे जी से हुई। चौबे जी पेशे से पत्रकार हैं और समाजिक सरोकार रखते हुए कुल्टी मदद फाऊंडेशन चला रहे हैं। जीजिविषा के लिए फोटो स्टेट टायपिंग इत्यादि का कार्य भी करते हैं। ये कहते हैं कि यह इलाका काफी पिछड़ा हुआ है और लोगों के पास खर्च करने के लिए पैसे भी नही रहते। इसके कारण बालिका शिक्षा के प्रति लोग अधिक ध्यान नही देते। परिस्थतियों को देखते हुए सिलाई मशीन प्रशिक्षण प्रारंभ किया गया इसके लिए घर की सिलाई मशीन उठाकर लाई गयी। फिर कम्प्यूटर लाए गये और कई बैच मे प्रशिक्षण कार्य प्रारंभ हुआ। 
रविशंकर चौबे जी एवं महादेव लाल जी के साथ चर्चा
पाँच वर्षो मे लगभग 2000 महिलाओ को इस संस्थान द्वारा रोजगार के लिए प्रशिक्षित किया जा चुका है। जिसमे मेंहदी, ब्यूटी पार्लर कोर्स, कम्प्यूटर, सिलाई प्रमुख है। सुबह बच्चों की शैक्षणिक समस्या को दूर किया जाता है, उसके बाद कालेज के बच्चों को अंग्रेजी प्रशिक्षण दिया जाता है। उसके बाद सिलाई की क्लास एवं सांझ को सेवानिवृत वृद्धों की महफिल जमती है। उनके लिए छोटी सी लायब्रेरी है जिससे उनका समय व्यतीत हो जाता है और बहू-पतोहू आदि के ताने खाने से राहत मिल जाती है।
कुल्टी फ़ाऊंडेशन के सदस्यों के साथ
इस सेवा कार्य के लिए धन की व्यवस्था संस्था के 8-10 सदस्य हजार पांच सौ की अपनी मासिक हिस्सेदारी से करते है। कोई भी सरकारी सहायता नही लेते। हमने 2 घंटे इन बच्चों के साथ गुजारे। बच्चो की जिज्ञासा देखकर अच्छा लगा। सभी ने धैर्य लगाकर सुना एवं प्रश्न भी किए। बच्चों ने हमे स्मृति चिन्ह भेंट किए और मैने भी इनकी लायब्रेरी के लिए कुछ पुस्तकें भेजने का वादा किया। इसके बाद हमने कुल्टी के होटल से बंगाली मिठाईयों का आनंद लिया। बिकास बाबू की बल्ले बल्ले हो गई। हमने भी एक दो टुकड़े चखे। पेट भर तो खा नहीं सकते थे।
कुल्टी फ़ाऊंडेशन के सदस्यों के साथ चर्चा
कुल्टी की बदहाली का बडा कारण इसको के प्लांट का रुग्ण होना है। इस स्टील प्लांट की स्थापना 1876 में हुई थी और यह भारत का पहला लौह अयस्क कारखाना था। इस कारखाने से ही लोगों का जीवन चलता था। राजनैतिक कारणों से यह कारखाना उपेक्षा का शिकार हो गया, जिसका खामयाजा यहां के निवासियों को भुगतना पडा। यहां से विदा लेकर हम आगे के सफर मे चल पडे। कुल्टी में हमारी मुलाकात महादेव लाल, उम्र-79 साल, निवास- अंडाल प.बंगाल से हुई थी। रेल्वे के लोको विभाग से सेवानिवृत है पेसमेकर से हृदय संचालित होता है। यही छोटा सा परिचय है इनका। पर काम बडा और प्रणम्य है। इनसे राम राम के पश्चात बात शुरु हुई तो पता चला कि ये भी महा घुमक्कड हैं। इन्होने भारत का भ्रमण सायकिल से किया है।
कुल्टी फ़ाऊंडेशन के समक्ष रविशंकर चौबे, महादेव लाल जी, बिकास शर्मा
चौंकाने वाली बात तो यह थी कि जब लोग रिटायर होकर भजन करते हुए ऊपर जाने का इंतजार करते है तब इन्होने सायकिल भ्रमण 74 वर्ष की उम्र मे प्रारंभ किया। इसे उत्कट आकांक्षा से ऊपजा दुस्साहस ही कहेगें। इनका कार्य युवाओं से लेकर जीवन के ढलान पर चल रहे लोगों के लिए भी प्रेरक है।  इन्होने यात्रा तीन चरणो मे पूर्ण की। पहली बार अंडाल से चलकर दिल्ली ऋषिकेश होते हुए लखनऊ से पुनः अंडाल लौटे। दूसरी यात्रा अंडाल से बांधवगढ होते हुए केरल तक एवं तीसरी यात्रा अंडाल से उड़ीसा छत्तीसगढ महाराष्ट्र होते हुए द्वारिका ओखा तक जाना और लौटना।
कुल्टी फ़ाऊंडेशन के सदस्यों द्वारा स्मृति चिन्ह प्रदत्त
इन यात्राओं का एक-एक दिन और घटनाएं इन्होने अपनी डायरी मे संजों रखे है। इन्होने अपना थैला क्या खोला, यात्राओं का पिटारा ही खोल दिया। बंगाली, हिन्दी, अंग्रेजी' ऊर्द अखबारों की सैकडों कतरनों के साथ हजारों फोटूएं भी दिखाई। शेर से मुलाकात एवं उडीसा के जंगलों में नक्सलियों द्वारा पैसे छीनने से लेकर अनेकों खट्टे मीठे एवं कड़ूए अनुभवों से भरी इनकी साहसिक यात्रा रही है। मैने इनसे समस्त यात्रा का वृतांत लिखने का निवेदन किया। जिससे लोक भी इनके यात्रा अनुभव से लाभ उठा सके। इनसे सुनना तो बहुत कुछ चाहता था और ये बताना भी बहुत कुछ चाहते थे। 
चलते चलते महादेव लाल जी के साथ एक सेल्फ़ी
महादेव लाल जी के पास कथा कहने के लिए पूरा समय था पर मुझ मुसाफिर के पास नहीं। आखिर हमारे आगे बढने की घडी ले आई ट्रेन सीटी बजाते हुए, एक मुसाफिर आगे चल पडा और दूसरा प्लेटफार्म पर ही रह गया अन्य किसी यात्रा की तजवीज लगाते। हमारी ट्रेन आने को थी। अगर विलंब होता तो गरीब रथ छूट सकता था। हमें झारसुगड़ा से फ़िर ट्रेन बदलनी थी। खैर समय रहते रांची पहुंच गए। गरीब रथ प्लेटफ़ार्म पर लगा हुआ था। गरीब रथ से मेरा पहला सफ़र था। इससे हम झारसुगड़ा तक आए, इसके बाद रात दो बजे मेल पकड़ कर सुबह रायपुर पहुंचे। इति।

3 टिप्‍पणियां:

  1. ये बंगाल का दुर्भाग्य है यहाँ जितने कल कारखाने थे शायद ही किसी और राज्य में थे ।
    पर राजनायको और यूनियन ने मिलकर सभी को चोपट कर दिया , चाहे वो जूट के कारखाने हो , या dunlop india , या कुल्टी सभी का एक हाल ।
    महादेव लाल जी जैसे बड़े घुम्मकड़ के बारे में बताने के लिए धन्यवाद ।
    लोग पेसमेकर लगाने के बाद और इस उम्र में सीढ़िया नहीं उतरते और इन्होंने दुपहिया सवारी साइकिल पर भारत भ्रमण किया ।उनके घुम्मकड़ी के इस जज्बे को सलाम ।


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  2. आपकी घुमक्कड़ प्रवृत्ति को प्रणाम, दादा।

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