मंगलवार, 19 जुलाई 2016

ग्वालियर की सैर : सास बहू मंदिर एवं तानसेन का मकबरा

ग्वालियर फोर्ट के दक्षिणी भाग में सासबहू मंदिर के परिसर की ओर चले, इस रास्ते पर गुरुद्वारा बंदी छोड़ होने के कारण काफ़ी देर तक ट्रैफ़िक जाम में फ़ँसना पड़ा। धूप बहुत अधिक परेशान कर रही थी। जहाँ भी मैने सहस्त्रबाहू मंदिर देखे, उनका नाम अपभ्रंश होकर सासबहू मंदिर हो गया। ये मंदिर भी प्रस्तर निर्मित हैं। यहां लगे शिलालेख के अनुसार इन देवालयों का निर्माण सन् 1093 ई. में पालवंश के राजा महिपाल कछवाहा द्वारा करवाया गया था । जनश्रुति के अनुसार उन्होंने बड़ा विष्णु मंदिर अपनी माता और समीप बने छोटे मंदिर को अपनी शिवभक्त पत्नी को समर्पित किया था । संभवत: इन्हीं कारणों से सहस्त्रबाहू मंदिर का नाम सास-बहू का मंदिर होकर रह गया । यहां एक गूजरी महल है जो राजा मानसिंह और गूजरी रानी मृगनयनी के गहन प्रेम का प्रतीक है।
सास का मंदिर 
यह मंदिर 12 फुट की जगती (चबूतरा) पर निर्मित किया गया है जो 100 फुट लम्बा, 63 फुट चौड़ा व 70 फुट ऊंचा है । मध्य में विशाल मंडप है, जिसकी छत चारों कोनों पर बने खम्भों पर आधारित है । मुख्य मंडप के तीन ओर लघु मंडप हैं तथा चौथी ओर गर्भगृह है । मंडप की छत में आकर्षक कलाकृतियां अंकित हैं । मंदिर की बाहरी व भीतरी दीवारों को तक्षण कला से सज्जित किया गया है । छोटा मंदिर यानि बहू का मंदिर मुख्य मंदिर के मुकाबले छोटा है व इसका वास्तु शिल्प भी अपेक्षाकृत साधारण है । मुख्य मंदिर का शिखर टूट चुका है । वर्तमान में इन देवालयों में कोई मूर्ति नहीं है । मूर्तियों को यवन हमलावरों ने नष्ट कर दिया था ।
बहू का मंदिर 
इसके बाद हम तेली का प्रसिद्ध मंदिर देखने पहुंचे। मंदिर को देखने से लगा कि हम दक्षिण भारत के किसी मंदिर में आ गए। इस मंदिर का शिखर गोपुरम जैसा है। भारत में द्रविड़ आर्य स्थापत्य शैली का समन्वय यहीं ग्वालियर किले पर तेली मंदिर के रूप में देखने को मिलता है । इस मंदिर का निर्माण तेल के व्यावसायियों कराया था, इसलिए इसका नाम तेली का मंदिर पड़ा कुछ लोग मानते हैं कि इसका नाम तैलंग या तैलंगाना मंदिर रहा होगा । जो बदलते समय के साथ बिगड़ कर तेली का मंदिर कहलाने लगा । लगभग सौ फुट की ऊंचाई लिये किले का यह सर्वाधिक ऊंचाई वाला प्राचीन मंदिर है। इस मंदिर के निर्माण को लेकर इतिहासकार एकमत नहीं है किन्तु अधिकांश विद्वानों का मत है कि इसका निर्माण कन्नौज के राजा यशोवर्मन ने सन् 750 ई. में करवाया था ।
विवस्वान सूर्य मन्दिर
उत्तर भारतीय अलंकरण से युक्त इस मंदिर का स्थापत्य दक्षिण द्रविड़ शैली का है । वर्तमान में इस मंदिर में कोई मूर्ति नहीं है । पर दरअसल यह एक विष्णु मंदिर था । कुछ इतिहासकार इसे शैव मंदिर मानते हैं । सन 1231 में यवन आक्रमणकारी इल्तुमिश द्वारा मंदिर के अधिकांश हिस्से को ध्वस्त कर दिया गया था । तब 1881–1883 ई. के बीच अंग्रेज हुकमरानों ने मंदिर के पुरातात्विक महत्व को समझते हुये मेजर कीथ के निर्देशन में किले पर स्थित अन्य मंदिरों, मान महल(मंदिर)के साथ-साथ तेली का मंदिर का भी सरंक्षण करवाया था । मेजर कीथ ने इधर-उधर पड़े भग्नावशेषों को संजोकर तेली मंदिर के समक्ष विशाल आकर्षक द्वार भी बनवा दिया । द्वार के निचले हिस्से में लगे दो आंग्ल भाषी शिलालेखों में संरक्षण कार्य पर होने वाले खर्च का भी उल्लेख किया है ।
 तेली का मंदिर 
किले में घूमते हुए अब भूख लगने लगी थी, हमने भ्रमण को विराम दिया और चल पड़े शहर की तरफ़। ऑटो वाले ने एक स्थान पर ले जाकर भोजन योग्य होटल बताया। हम भोजन करके सूर्य मंदिर की देखने के लिए चल दिए। सूर्य मंदिर का नाम सुनकर मुझे लगा था कि कोई प्राचीन सूर्य मंदिर होता। जब यहां पहुंचा तो देखा कि यह मंदिर, कोणार्क के सूर्य मंदिर  की प्रतिलिपि है। इसका निर्माण बिड़ला ट्रस्ट ने कराया है। वैसे आधुनिक निर्माण की दृष्टि से मंदिर भव्य एवं कलात्मक है। इसे विवस्वान सूर्य मन्दिर कहा जाता है। हमारे पास समय कम था और हमें तानसेन का मकबरा भी देखना था। इसलिए यहाँ से जल्दी ही तानसेन के मकबरे की ओर पहुंचे।

गॉस मोहम्मद का मकबरा 
तानसेन का मकबरा बाजार के बीच में है। चारों तरफ़ दुकाने एवं भीड़ भाड़। यहां प्रवेश करने पर एक भव्य मकबरा दिखाई देता है। हमने इसे ही तानसेन का मकबरा समझा। भीतर जाने पर पता चला कि यह मकबरा सोलहवीं सदी के मुस्लिम सूफ़ी गौस का मकबरा है। मकबरे का निर्माण चौकोर अधिष्ठान पर हुआ है, इसमें षटकोणीय बुर्ज बने हुए हैं तथा गुंबद भी बना हुआ है। मकबरे में अरबी में कला लेख उत्कीर्ण हैं। रोशनी के लिए चारों ओर नक्काशीदार जालियां लगी हुई है। 
 तानसेन का मकबरा 
इसके समीप ही छोटे से चौकोर चबुतरे पर तानसेन की कब्र है। इसके अतिरिक्त यह एक कब्रिस्तान ही है, यहाँ अन्य बहुत सारी कब्रे हैं। तानसेन अकबर के नौरत्नों में से एक थे। जितना प्रसिद्ध उनका नाम है, उसके हिसाब से मकबरा देखकर निराशा हुई। आखिर और कितना गजनिया बजनिया को सम्मान दिया जाता है। कब्र के समीप ईमली का पेड़ है, जिसकी पत्तियां लोग तोड़ कर चबा रहे थे। मान्यता है कि इस पेड़ की पत्तियां चबाने से आवाज सुरीली हो जाती है। तानसेन के मकबरे पर सांझ हो चुकी थी। आज हमें लौटना था। यहां से हम सीधे जीवाजी विश्व विद्यालय के गेस्ट हाऊस पहुंचे, अपना सामान लिया और ग्वालियर की गजक खरीद कर स्टेशन पहुंच गए। ट्रेन आने पर आगे की यात्रा प्रारंभ हो गई।  इति 

2 टिप्‍पणियां:

  1. मैंने भी ग्वालियर देखा था पर तब बहुत छोटी थी आपने उन यादों को ताजा करवा दिया |उम्दा सचित्र लेख |

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  2. आपकी इस पोस्ट को आज की बुलेटिन 'भटकाव के दौर में परंपराओं से नाता - ब्लॉग बुलेटिन’ में शामिल किया गया है.... आपके सादर संज्ञान की प्रतीक्षा रहेगी..... आभार...

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