गुरुवार, 13 मई 2010

आज मुझे कुछ कहना है-"बिखरे मोती" से

कुछ दिनों पहले दुपहरी में डाकिया आया एक अरसे के बाद डाक लेकर। नहीं तो डाक आनी ही बंद हो गयी ईमेल, मोबाईल, फ़ोन के चलन के बाद।

बस किताबें या सरकारी चिट्ठियाँ ही आती हैं। उस दिन आया एक पार्सल खोला तो उसमें थी समीर भाई की कृति-"बिखरे मोती"

मैने उन्हे एक बार कहा था कि"मु्झे बिखरे मोती पढना हैं तो उन्हे उसे याद रख कर भेज दी। उनकी सहृदयता पर धन्यवाद देता हूँ , तथा एक कविता "बिखरे मोती" से आपके समक्ष प्रस्तुत करता हूँ।

आज मुझे कुछ कहना है

मौन दमित मुखरित होने से,अब मुस्किल यह सहना है।
कल तक मै बस सुनता आया था,आज मुझे कुछ कहना है।

पीर पराई सहता था मैं
कभी ना दिल की कहता था मैं
जिन राहों पर कोई ना चलता
उन राहों पर रहता था मैं

मुझको भी उन्मुक्त मुसाफ़िर,बनकर चलते रहना है।
कल तक मै बस सुनता आया था,आज मुझे कुछ कहना है।

सबने ही मुझको भरमाया
तरह तरह से मुझे डराया
क्या क्या खेल रचे जाते हैं
सोच सोच कर मैं घबराया

मर मर के जिंदा रहने से,बेहतर जी कर  मरना है।
कल तक मै बस सुनता आया था,आज मुझे कुछ कहना है।

दया धर्म का नाम नहीं,
जीवन में आराम नहीं है।
नफ़रत वाली इस महफ़िल में
प्यार पिलाता जाम नहीं है।

मुझको अब पावन नदिया सी,धारों सा बहना है।
कल तक मै बस सुनता आया था,आज मुझे कुछ कहना है।

13/05/2010

38 टिप्‍पणियां:

  1. "मर मर के जिंदा रहने से,बेहतर जी कर मरना है।"

    अति सुन्दर!

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  2. वाह! ऐसी कवितों से जीने की उर्जा मिलती है.
    ..आभार.
    बहुत ही सुन्‍दर प्रस्‍तुति ।

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  3. हमेशा की तरह उम्दा रचना..बधाई.

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  4. मुझको अब पावन नदिया सी,धारों सा बहना है।
    कल तक मै बस सुनता आया था,आज मुझे कुछ कहना है।

    इन पंक्तियों ने दिल छू लिया... बहुत सुंदर ....रचना....

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  5. बेहद ही खुबसूरत और मनमोहक...

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  6. नफ़रत वाली इस महफ़िल में
    प्यार पिलाता जाम नहीं है।

    बहुत सुन्दर
    आपका आभार पढवाने के लिये

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  7. कुछ नहीं आपने काफी कुछ बयाँ कर दिया भैया

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  8. ललित जी आज आपने इस मुर्दा लोकतंत्र को जिन्दा करने की तम्मना आपमें भी है ,इस बात को इस कविता के जरिये साबित कर दिया / आप अपने क्षेत्र में लोगों के सर पर कफ़न बांधकर ,एक बार उनको लोकतंत्र को जिन्दा करने के निर्णायक लड़ाई के लिए तैयार कीजिये /

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  9. मर मर के जिंदा रहने से,बेहतर जी कर मरना है।
    कल तक मै बस सुनता आया था,आज मुझे कुछ कहना है।

    ललित भईया आपकी ये लाईन तो दिल को छु गयीं , लाजवाब ।

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  10. बहुत आभार, ललित भाई!! आपका स्नेह है.

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  11. एक-एक पंक्ति बार-बार पढने लायक है
    उम्दा कविता पढवाने के लिये आभार

    प्रणाम स्वीकार करें

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  12. @ Mithilesh dubey

    भैया यह रचना मेरी नहीं है,समीर लाल जी की है।
    उनके काव्य संग्रह"बिखरे मोती"से साभार प्रस्तुत की गई है।

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  13. बेहतरीन पंक्तियां लिखने और हम तक पहुंचाने के लिए समीर जी और ललित जी का धन्यवाद.. आभार।
    इस कविता को पढ़ने के बाद अपनी भी इच्छा हो गई कि बिखरे मोती अपन भी सहेज लें।

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  14. मुझको अब पावन नदिया सी,धारों सा बहना है।
    कल तक मै बस सुनता आया था,आज मुझे कुछ कहना है।..दिल को छु गयीं , लाजवाब .....समीर जी और ललित जी का धन्यवाद.. आभार।

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  15. दया धर्म का नाम नहीं,
    जीवन में आराम नहीं है।
    नफ़रत वाली इस महफ़िल में
    प्यार पिलाता जाम नहीं है।

    मुझको अब पावन नदिया सी,धारों सा बहना है।
    कल तक मै बस सुनता आया था,आज मुझे कुछ कहना है।


    ललित जी ,

    समीर जी की ये बेहतरीन रचना पढवाने के लिए आभार....बहुत खूबसूरत और संदेशात्मक कविता का चयन किया है...

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  16. बहुत सुन्दर तरीके से कहा जी आपने सब!और बहुत कहा!

    कुंवर जी,

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  17. बहुत लाजवाब ....आभार
    VIKAS PANDEY

    www.vicharokadarpan.blogspot.com

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  18. समीर जी ने बहुत सुन्दर रचनाये समेटी है अपने इस बिखरे मोतियों की किताब में ! कुछ खास-ख़ास मैं उनके ब्लॉग पर पहले भी पढ़ चुका था !फिर भी आपने पुन: समीर जी कि इस किताब के प्रति लोगो का आकर्षण बढ़ाया है !

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  19. बधाई हो भईया.

    बिखरे मोती को सकेल कर प्रस्‍तुत करने के लिए.

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  20. बिखरे मोती संग्रह से प्रस्तुत की गई कविता बड़े सही मौके पर आई है। मौका-ए-वारदात के वक्त एक गवाह के तौर पर कविता को प्रस्तुत करने लिए आपको बधाई।
    दंभ-संभ-बंभ लिखने वालों को तो अच्छा नहीं लगा होगा। आपकी जय हो। अरे हां एक और नया प्रवक्ता आ गया है। उस प्रवक्ता पर तो मैंने लिख दिया है। गौर करने लायक बात है कि कुछ लोग जो अब तक चुपचाप बैठे हुए थे वे जैसे ही कानपुर तरफ से हलचल हुई है सक्रिय हो गए हैं। मजे की बात है कि उनकी ओर से भी अपील (राजनीति) जारी की जा रही है। जरा इस अपील जारी करने से यह तो पूछ लो भाई.. दो दिनों तक कहां थे। अब अचानक उनको हिन्दी का श्रेष्ठ लेखन याद आ रहा है।

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  21. तभी तो समीर लाल ‘समीर’ लाल हैं।

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  22. मर मर के जिंदा रहने से,बेहतर जी कर मरना है।
    कल तक मै बस सुनता आया था,आज मुझे कुछ कहना है।
    वाह उर्जा देती पंक्तियाँ ..शुक्रिया ललित जी.

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  23. बहुत सुन्दर गीत लिखा है ललित जी ।
    बिखरे मोती के लिए बधाई।

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  24. ...बहुत बहुत बधाई "समीर भाई" .... प्रसंशनीय प्रस्तुति "ललित भाई" ...... बधाईंया !!!!

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  25. बधाई हो ललित जी ! बिखरे मोती की प्रति मिलने पर :)

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  26. बहुत बढ़िया कविता है....

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  27. समीर जी ने मुझे भी बिखरे मोती भेंट की थी। जब भी मन बोझिल होता है उसे खोलकर एकाध रचना पढ़ लेता हूँ। मन प्रसन्न हो जाता है। आपके सौजन्य से इस गीत को दुबारा पढ़ा। आपको धन्यवाद। कवि समीर के क्या कहने...!!!

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  28. हमेशा की तरह उम्दा रचना..
    बधाई...

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  29. वाह! वाह! क्या बात है? ऐसी रचना पर टिपियाने मे हुई देरी का दुख मुझे सहना है। आपकी लेखनी तो इस ब्लोग जगत का गहना है। बधाई।

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  30. समीर जी की रचनाओं के बारे में क्या कहा जाए... उनके संग्रह का नाम ही अपनी चुगली कर जाता है... सब 'बिखरे मोती' सहेजे गए हैं उस पुस्तक में..

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  31. सुनिए...समीर लाल, द साउंड ऑफ साइलेंस...

    जय हिंद...

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  32. बिखरे मोती का दर्शन पा कर धन्य हो गया ।आभार

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  33. पहले ब्लॉग-जगत में पोस्ट पढ़ी, फिर टिप्पणी-जगत चला गया। वहाँ जाकर खिन्न मन से लौटा था कि लोगों को इतनी जल्दी है अगर तो इतनी ज़रूरत क्या है टिप्पणियाने की?
    फिर ख़्याल आया कि ये निजी मामला है, और मन ख़ुश हो गया।
    समीर जी की रचना पुस्तक से लाने का आभार। ब्लॉगियों के लिए ख़ासकर प्रेरणादायक है।

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