मंगलवार, 24 अगस्त 2010

लांस नायक वेदराम

सामने पहाड़ी पर एक टक निगहबानी करती हुई मेरी एक जोड़ी आंखे जमी हुई बर्फ़ को देख रही थी। दूर तक कहीं हरियाली का नाम-औ-निशान नहीं। चारों तरफ़ बर्फ़ ही बर्फ़ धवल और शुभ्र। 

मैं लांस नायक वेदराम अपनी एल एम जी बंकर में मजबूती से संभाले हुए चौकस था। पिछले 5 महीनों से इस फ़ील्ड पर वह अपनी ड्युटी बजा रहा था। बड़ा कठिन होता है नो मेंस लैंड पर ड्युटी करना, जहां आम सुविधा तो क्या, दैनिक निवृति भी मुस्किल से होती है। 

पता नहीं कब बंकर से बाहर निकलते ही पहाड़ी के पार से आती गोलियां शहीद का दर्जा बख्श दे प्रमाण पत्र के साथ।  

मन कल से ही उदास था। रह-रह कर बस सुक्खी की याद आ रही थी।घर में बूढी माँ अकेली थी। बहन की शादी तो मैं कर आया था पिछले जाड़ों में। एक जिम्मेदारी जो थी उसे निभा आया था। परिवार की जिम्मेदारी भी बहुत बड़ी होती है जब घर का एकमात्र पुरुष घर से दूर रहे।

जब भी मैं घर जाता तो माँ याद दिलाती कि-“ सुक्खी बड़ी हो गयी है, उसके हाथ पीले कर देने चाहिए, अच्छा सा लड़का देखकर”। अब की  छुट्टियों में मैं यही सोच कर गया था कि-कैसे भी हो सुक्खी के हाथ पीले कर के ही वापस आऊंगा।

सुक्खी मुझसे दो साल छोटी थी, पाकिस्तान की लड़ाई में पिताजी के शहीद होने के बाद माँ ने हमें बड़ी तकलीफ़ों से पाला था। 300 रुपए की पेंशन में घर का गुजारा नहीं होता था।आर्मी वेलफ़ेयर एसोसिएशन की कुछ अफ़सरों की बीबियां माँ को एक सिलाई मशीन देकर गयी थी और उसकी फ़ोटो दूसरे दिन अखबारों में छपी थी।

तब से माँ ने सिलाई का काम शुरु कर दिया। हम भी उसका हाथ बंटाते । कभी सुक्खी मेरे साथ छेड़खानी करती, मेरी स्लेट लेकर बैठ जाती। माँ मैं भी स्कूल जाउंगी। माँ से मैं उसकी शिकायत करता-“माँ देख सुक्खी मेरी स्लेट नहीं दे रही है।

मुझे अभी स्लेट पर ईमला लिख कर ले जाना है।“ माँ हंस कर कहती-“दे दे सुक्खी भाई की स्लेट, मैं तुझे दूसरी ला दुंगीं।“ माँ के कहने से भी नहीं देती थी स्लेट, तब मैं उसकी चुटिया पकड़ कर खींचता तो वह नाराज हो जाती।

उसे मनाने के लिए स्कूल से आते हुए ढोलुराम बनिए की दुकान से पोदीने वाली टिकिया लेकर आता।

आते ही आवाज देता-“ सुक्खी-देख तेरे लिए मैं क्या लाया हूँ?

आवाज सुनकर वह दौड़ कर बाहर निकल आती और कहती-“ माँ मेरा भाई कितना अच्छा है, मेरे लिए कितना कुछ लेकर आता है।“

उसकी बातें सुनकर माँ मुस्कुराती और मैं भी हंसने लगता था-कितनी भोली है मेरी बहन। सुबह झगड़ा किया था और नाराज थी, पोदीने की टिकिया मिलते ही अब राजी हो गयी।फ़िर हम दोनो लंगड़ी खेलने लगते और खूब धमा चौकड़ी मचाते।

इस तरह हमारा बचपन बीतता गया। मैने मैट्रिक पास कर ली थी अब 17 का हो गया था।

मां से पूछता-“माँ तुम्हारी उमर कितनी है? तो माँ कहती-“बेटा जब तु 20 बरस का हो जाएगा तो मैं 40 बरस की हो। तेरे पिताजी के जाने के बाद एक-एक दिन और पल गिन रही थी कि तु कब बड़ा होगा।“

सुक्खी भी अब स्कूल जाने लगी, वह रोज स्कूल जाती और वापस आकर माँ के सिलाई के काम में हाथ बंटाती। सिले हुए कपड़ों पर बटन और हुक टांगती। फ़िर अपनी पढाई करती।

गाँव में बिजली नहीं थी। इसलिए हमें पढाई का काम अंधेरा होने से पहले ही पूरा करना पड़ता था। माँ के पास अब सिलाई का काम बहुत बढ गया था। इसलिए हम सब मिल जुल कर काम को करते ।

एक दिन अमर सिंग ने बताया कि-पानीपत में फ़ौज की भरती शुरु हुई है। गांव से बहुत सारे लड़के जा रहे हैं।

मैने माँ से कहा-“माँ गाँव से मेरे साथ के बहुत सारे लड़के पानीपत में फ़ौज में भर्ती होने जा रहे हैं। अगर तू कहे तो मैं चला जाऊं ।“

माँ सुनकर उदास हो गयी, आसमान में ताकने लगी, उसकी आँखे डबडबा आईं, थोड़ी देर में फ़िर बोली-“जा बेटा हमारे खानदान में तो पीढियों से परम्परा रही है,फ़ौज की नौकरी करने की।

फ़िर उसने अपने पल्लु में बंधे 28  रुपए दिए। रोटियों को चूर कर चूरमा बनाया,मुझे पिताजी का मेडल देना नहीं भुली और माथे पर हाथ फ़ेर कर कहा-“जा बेटा भर्ती हो जा।“

पानीपत पहुंच कर मैने अपने पिताजी का मेडल वहां बैठे भर्ती ऑफ़िसरों को दिखाया और उन्होने मुझे भी लाईन में लगा दिया। नाप-जोख, भाग-दौड़ होने के बाद दुसरे दिन मुझे किट बैग थमा दिया गया और सीधे वहीं से बेसिक ट्रेनिंग कोर्स के लिए भेज दिया गया।

6 माह की रंगरुटी के बाद मेरी पोस्टिंग यहाँ बार्डर पर हो गयी। पिछली छुट्टियों में घर गया था तो माँ के लिए साड़ी, सुक्खी के लिए कैंटिन से एच एम टी की घड़ी लेकर आया था। उसे घड़ी का बड़ा शौक था। हमेशा घड़ी के लिए मुझे कहती थी लगता था कि इस घड़ी के बिना वह घड़ी भी नहीं रह सकती।

अबकी छुट्टियों में उसके लिए कैंटीन से मैने बहुत सा सामान खरीदा और घर पहुंच गया। माँ ने सुक्खी के दहेज के लिए काफ़ी कुछ जरुरतों का सामान जमा कर रखा था। काफ़ी तलाश के बाद एक लड़का पास के गांव में मिल ही गया।

वह गोविंद गढ में स्कूल मास्टर था। धूम धाम से शादी हो गयी और सुक्खी अपने घर चली गयी।

बचपन में मेरा जब उससे झगड़ा होता तो माँ कहती –“तू मत लड़ रे उससे, वो तो पराई है एक दिन तुझे छोड़ कर चली जाएगी, ये तो चिड़िया है,चिड़िया एक दिन उड़ जाएगी।” तब तो मेरी समझ में नहीं आता था कि माँ ऐसा क्यों कहती है।

उसका विदा करके मैं जी भर रोया। आंसू रुकते ही नहीं थे। सुक्खी अपने घर चली गयी थी, चिडिया उड़ चुकी थी।

बस इस बात को बरसों बीत गए। भाई-बहन के जीवन में बरस में एक विशेष दिन आता है जब दोनो एक दूसरे को बहुत याद करते हैं, चाहे दुनिया के किसी कोने में भी हों इस दिन मिल ही लेते हैं। राखी के एक दिन पहले हमेशा उसका राखी का लिफ़ाफ़ा हजारों किलोमीटर दूर कदमों से चलकर मेरे पास आ जाता था।

दूसरे दिन सभी साथियों की तरह मेरी भी कलाई पर राखी सज जाती थी जैसे किसी ने शौर्य चक्र मेरे सीने पर लगा दिया हो और दिन भर मैं तनकर खड़ा रहता था अपनी एल एम जी के साथ, जिस पर सुक्खी की भेजी एक राखी बंधी होती थी।

एल एम जी मेरी रक्षा करती, मैं एल एम जी की और सुक्खी की राखियों में समाया प्रेम हम दोनो की रक्षा करता।
मैं इतजार कर रहा हूँ सुक्खी के लिफ़ाफ़े का जो खुशियां लेकर आएगा मेरे लिए। जिसमें होगीं सलामती की लाख दुवाएं, जिसकी मुझे हमेशा जरुरत रहती है,

हरकारे की आवाज का इंतजार कर रहा हूं जब वह कहेगा-“ लांस नायक वेदराम! तुम्हारी राखियाँ आ गयी हैं अब जरा सी रम पिला दे यार।“ मैं भी खुशी से आधी बोतल उसके गिलास में उड़ेल दूंगा।  वह भी मस्त हो जाएगा। भाई बहन के प्रेम के गीत गुन-गुनाएगा। यह खुशी ही कुछ ऐसी है।

अब जब भी सूनी कलाई पर मेरी निगाह पड़ती है, एक हूक सी दिल में उठती है, एल एम जी पर मेरा हाथ कस जाता है, क्योंकि आज दोनो ही उदास है, मेरी कलाई भी सूनी है और एल एम जी का ट्रिगर  भी……. 

माँ की चिट्ठी आई थी मैं मामा बनने वाला हूँ। बहुत खुश हुआ था सुनकर मैं। ऐसा लगता था कि अभी उड़कर उसके पास पहुंच जांऊ। एक बार सुक्खी से मिल आऊं। कैसी है वह। बस दिन यों बीतते गए और मैं खुशखबरी का इंतजार करता रहा।

एक दिन चिट्ठी आई कि मैं मामा बन गया हूँ,खुशी के साथ दुख: का एक पहाड़ भी टूट पड़ा मेरे उपर, आगे चिट्ठी में लिखा था-“ जापे (जचकी) के दौरान सुक्खी की तबियत बिगड़ गयी और वह अपनी निशानी छोड़कर चली गयी। चिड़िया थी अनंत आकाश में उड़ गयी।

मुझे तो लगा कि पाला मार गया, सारा शरीर सुन्न हो गया। हे भगवान! ये कैसा न्याय है तेरा? बरसों से खुशियों को तरसने वालों को तू खुशी का एक मौका न दे सका। बस यूं ही खड़ा रहा मैं अपनी एल एम जी के साथ और चिड़िया उड़ गयी है मेरे आंगन की अनंत आकाश में……..

43 टिप्‍पणियां:

  1. आह कैसे मोड़ पर आ ख़त्म हुयी कहानी ! विजुअल्स अच्छे लगाए हैं :)

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  2. जबरदस्त कहानी...बस यूँ ही खड़ा हूँ पढ़ कर.


    रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ.

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  3. उफ़ ! बहुत संवेदनशील कहानी ....
    मेरे भैया .....रानीविशाल
    रक्षाबंधन की ढेरों शुभकामनाए !!

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  4. बहुत बहुत शुभकामनायें रक्षाबंधन की ...कहानी बढ़िया लगी - हम भी यहाँ बहन को बहुत याद कर रहे हैं ....

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  5. संवेदनशील रचना...
    आपका ये रंग पहली बार देखने को मिला ...एक रौ में पढता चला गया...

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  6. ...बेहद संवेदनशील व मार्मिक कहानी .... यही आशा करता हूं कि यह कहानी सत्य घटनाओं पर आधारित न हो !!!

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  7. ... प्रभावशाली लेखन के लिये बहुत बहुत बधाई ललित भाई !!!

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  8. कहानी दिल को छू गयी . संवेदनाओं को झकझोर गयी .
    (स्वराज्य करुण )

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  9. @'उदय'

    हर कहानी समाज का एक चित्र खींचती है,
    जो समाज में और दैनिक जीवन में घटता है
    उसका असर कहानियों में देखने अवश्य मिलता है।
    आपके आगमन का स्वागत है।

    श्रावणी पर्व की हार्दिक शुभकामनाएं।

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  10. भावविभोर कर देने वाली कहानी!

    रक्षा बंधन की हार्दिक शुभकामनाएँ!

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  11. उचित अवसर पर पोस्ट की गई एक मार्मिक कहानी ! रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाये !

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  12. bahut hi jabardast, samvedansheel, maarmik rochak kahaanee.....bilkul sahi samay par....रक्षाबंधन की हार्दिक शुभकामनाये !

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  13. अच्छी भावनात्मक प्रस्तुती ...रक्षाबंधन की बहुत-बहुत बधाई और बेटी श्रुति प्रिया को ढेर सारा आशीर्वाद ...

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  14. रक्षाबन्धन के पावन पर्व की हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ .आज का पोस्ट जानदार एवम् लाजवाब है ,बिल्कुल आँखों देखा हाल की तरह .

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  15. वेदराम की वेदना का जीवंत चित्रण ..

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  16. आपने बहुत ही मार्मिक कहानी लिखी है।
    जज्बातों का दरिया उड़ेल दिया है।
    सीमा पर तैनात एक सैनिक की भावनाओं को
    बखूबी उकेरा है एक चित्रकार की तरह।
    इसे ही कहते हैं शब्दों से चित्रकारी करना।
    इसे पढकर मैं भावुक हो गया जैसे
    यह घटना मेरे साथ ही घट रही हो।
    लांस नायक वेदराम के साथ कुछ पलों के लिए जुड़ सा गया।
    आपकी लेखनी को सलाम करता हूँ।

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  17. वेदराम की वेदना का सुन्‍दर चित्रण किया है भाई साहब आपने.

    रक्षाबन्धन के पावन पर्व की हार्दिक बधाई एवम् शुभकामनाएँ

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  18. आपने बहुत ही मार्मिक कहानी लिखी है।
    जज्बातों का दरिया उड़ेल दिया है।
    सीमा पर तैनात एक सैनिक की भावनाओं को
    बखूबी उकेरा है एक चित्रकार की तरह।
    इसे ही कहते हैं शब्दों से चित्रकारी करना।
    इसे पढकर मैं भावुक हो गया जैसे
    यह घटना मेरे साथ ही घट रही हो।
    लांस नायक वेदराम के साथ कुछ पलों के लिए जुड़ सा गया।
    आपकी लेखनी को सलाम करता हूँ।

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  19. प्रस्तुतीकरण इतना सधा हुआ है कि टिप्पणियों को देखकर ही विश्वास हुआ कि यह कहानी मात्र है,सत्यकथा नहीं। मगर इस कहानी में कई पल अत्यन्त जीवंत रूप में सामने आए हैं जिनमें आर्मी वेलफ़ेयर एसोसिएशन की कुछ अफ़सरों की बीबियां द्वारा दी गई सिलाई मशीन की फ़ोटो अखबारों में छपने का प्रसंग भूल नहीं पा रहा हूँ।

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  20. कुछ लिखने की ताक़त नहीं है इस पर भईया. इस कहानी के लिए आपको बस प्रणाम कर सकता हूँ.

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  21. श्रुतिप्रिया को जन्मदिन की शुभकामनाएं और राखी की भी... ललित जी को बधाई..

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  22. लांस नायक वेदराम पर आपकी कहानी से एक सैनिक की घरेलू ज़िन्दगी का
    एक ऐसा हृदयस्पर्शी पहलू सामने आया है, जिसकी संवेदनाओं को सिर्फ वही बेहतर
    महसूस कर सकता है , जिसका कोई बहादुर बेटा या कोई बहादुर भाई देश की
    रक्षा के लिए सरहद पर तैनात हो. देश उनका कृतज्ञ है ,जो अपनी पारिवारिक
    ज़िंदगी के तमाम दुखों को झेल कर भी भारत माता की रक्षा कर रहे हैं . रक्षाबंधन के
    मौके पर कहानी का प्रस्तुतिकरण समय के अनुरूप है कथानक को जीवंत बनाते चित्रों से सजी हुई
    इस कहानी ने मुझ जैसे पाठक को एक बार फिर अपनी ओर खींच लिया .
    इसलिए दोबारा अपने 'दिल की बात 'आप तक पहुंचा रहा हूँ .
    श्रावणी पर्व की आपको भी बहुत -बहुत शुभकामनाएं .
    स्वराज्य करुण

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  23. कहानी लिखने की आपकी शैली तो बहुत ही अच्‍छी लगी .. एक एक घटनाओं का चित्रण ऐसे किया है .. जैसे हम चलचित्र देख रहे हों .. और अंत भी इतनी अच्‍छी तरह ..
    हे भगवान! ये कैसा न्याय है तेरा? बरसों से खुशियों को तरसने वालों को तू खुशी का एक मौका न दे सका। बस यूं ही खड़ा रहा मैं अपनी एल एम जी के साथ और चिड़िया उड़ गयी है मेरे आंगन की अनंत आकाश में……..
    पर कहानी की शुरूआत तो दुख से हुई ही थी .. अंत सुखात्‍मक होता तो अच्‍छा लगता .. वैसे जीवन मे ऐसी घटनाएं भी देखने को मिलती हैं .. पर मुझे सुखात्‍मक कहानी पसंद है .. सुखात्‍मक कहानी समाज को सकारात्‍मक संदेश देती है !!

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  24. ...बेहद संवेदनशील व मार्मिक कहानी...श्रावणी पर्व की आपको भी बहुत -बहुत शुभकामनाएं .

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  25. बहुत ही मार्मिक और संवेदनशील कहानी, रक्शःआबंधन की हार्दिक की शुभकामनाएं.

    रामराम.

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  26. कहानी अभी पढता हुं पहले बिटिया को जन्म दिन की बधाई दे दुं, ओर, आप सब को राखी की बधाई और शुभ कामनाएं

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  27. आप की कहानी ने तो बांधे रखा... कही कही मेरी कहानी लगी, अन्त पढ कर मै भी सुन्न रह गया............

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  28. रक्षा बंधन पर एक भावुक कहानी लिखी आपने. कहिनी के अंतिम पाराग्राफ अचानक अंत बहुत ही भावुक कर गया...

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  29. dravit kar diya aapne,ek bhai ke man me bahn ka pyar..jeevan ki kathintam sthiti me bhi kam nahi hota. ant bahut karun hai par shayad yahi hakeeqat hai jeevan ki har ghatna ka ant khushi se nahi hota.di me gahre paith gayee ye kahani kam jindgi ....

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  30. जबर्दस्त्त कहानी है ..बहुत मार्मिक.

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  31. सन्देशा मिला।
    वेदराम के घर पहुँचने की प्रतीक्षा है।

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  32. सन्देश मिला।
    वेदराम की घर वापसी की प्रतीक्षा है।

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  33. कहानी बहुत पसंद आयी | रक्षा बंधन पर सही मौके पर सही पोस्ट | आभार |

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  34. मर्म को छू गयी ..काफी संवेदनशील कहानी.
    पंकज झा.

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  35. जापे (जचकी) के दौरान सुक्खी की तबियत बिगड़ गयी और वह अपनी निशानी छोड़कर चली गयी। चिड़िया थी अनंत आकाश में उड़ गयी।
    ऐसे ही सोचा होगा मेरे मातुलान,

    मातामही ने. आज यह निशानी,

    अपने माँ बाप की, भाई ललित से

    से बात कर रहा है. बहुत सुंदर कहानी.....

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  36. काफ़ी दिनो के बाद यह कहानी पढी . एक सधी हुइ कहानी .

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  37. आपके ब्लॉग पर पहली बार आया हूँ, अच्छा लगा.

    अच्छी कहानी है ललितजी, प्रवाह बहुत ही अच्छा है. क्लिष्ट भाषा और शब्दों का प्रयोग नहीं है.. अच्छा लगता है ...

    मनोज खत्री

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