सोमवार, 16 अगस्त 2010

दिस प्रोग्राम इज स्पोन्सर्ड बाय

शब्द नहीं चित्र---दिस प्रोग्राम इज स्पोन्सर्ड बाय...........!



चित्र-गूगल से साभार

41 टिप्‍पणियां:

  1. बाजारवाद ने कहीं का नहीं छोड़ा है।

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  2. कम्पनियों के विज्ञापन ने उत्पात मचा रखा है।
    जहां देखो वहीं विज्ञापन ही विज्ञापन

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  3. विज्ञापन के कुछ भी करेंगे
    शर्म आनी चाहिए इन्हे,पर आती नहीं।

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  4. प्रायोजित कार्यक्रम अच्छा रहा।
    एक चित्र ही पूरी कथा कह देता है।

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  5. देश की हालत क्या हो गयी भगवान
    कितना बदल गया इंसान-कितना बदल गया इंसान

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  6. विच प्रोग्राम?

    हा हा हा

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  7. और कहीं जगह बची है क्या?
    विज्ञापन के लिए-अच्छा है प्रायोजित कार्यक्रम

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  8. @वन्दे मातरम् जी

    कृपया इस तरह टिप्पणियाँ न करें
    मेरे ब्लाग पर आगमन के लिए शुक्रिया।

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  9. यह कटाक्ष है,हमने अपना ज़मीर भी अब विज्ञापनों में होम दिया है।

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  10. मुझे जापानी पुरानी कहनी याद आई ...

    http://en.wikipedia.org/wiki/H%C5%8Dichi_the_Earless

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  11. "हमें बच्चों से बेहद प्यार है,
    आखिर यही तो भावी बाजार है. "
    क्या बात है, जय हो बाजारवाद की.........

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  12. विज्ञापन का युग है भई! सब कुछ हो सकता है! :)

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  13. बाजार की खिल्‍ली उड़ाती बच्‍चे की हंसी.

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  14. यह बाजारवाद कहाँ ले जायेगा .....

    पर बच्चे को उत्पाद माने या विज्ञापनों को .. :):):)

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  15. बाजारवाद ने कहीं का नहीं छोड़ा है।

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  16. हा-हा-हा
    बिना बोले बहुत कुछ कहती हुई एक बढिया पोस्ट

    प्रणाम

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  17. Hi bhagvaan ab ye din bhi dekhena padega in chote chote bachcho ko .........

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  18. आजकल हालात कुछ ऐसे ही है.

    मेरा ब्लॉग
    खूबसूरत, लेकिन पराई युवती को निहारने से बचें
    http://iamsheheryar.blogspot.com/2010/08/blog-post_16.html

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  19. शायद,बाज़ारवाद गर्भ तक पहुंच गया है। अन्यथा,ऐसी हालत में बच्चा मुस्कुरा कैसे सकता है?

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  20. विज्ञापन से आय का एक और श्रोत बताने के लिए आपका हार्दिक धन्यवाद , ललित जी

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  21. ho sakta hai bhavishya men ye program bhi sponsered by ho jaaye :)

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  22. दिस कमेंन्ट्स प्रेजेन्टेड बाई ......|

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  23. बहुत बढिया ललित भाई
    जबरदस्त...
    इस पोस्ट को देखकर मुझे शाहरूख की फिल्म फिर भी दिल है हिन्दुस्तानी की याद आ गई.
    इस फिल्म में भी जिसे फांसी की सजा दी जा रही होती है उसके कपड़ों में तमाम तरह के विज्ञापन चिपका दिए जाते हैं.
    बधाई...

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  24. बहुत खूब .. सच है ये एक दिन हालात यही होगा
    बाजार जो न करवा दे

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  25. जय हो विज्ञापन बनाने वाली फर्म की !!

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  26. अब विज्ञापन से हम उत्पाद को नहीं खरीदते बल्कि हमसब अब विज्ञापन के उत्पाद बना दिए गयें हैं ,इसमें मिडिया पर पूरी तरह लोभी लालची,अनैतिक और भ्रष्ट लोगों का कब्ज़ा हो जाना सबसे प्रमुख कारन है अब मिडिया द्वारा अनैतिकता को बेचा जा रहा है और इसमें देश के 95% मिडिया को चलाने वाले लोग शामिल हैं और सरकारी भ्रष्टाचार और सम्बेदन्हीनता भी इसी मिडिया के वजह से है ..हमसब को इस दिशा में गंभीरता से सोचते हुए ऐसे मिडिया को खत्म करने की ओर सोचना चाहिए ...

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  27. क्रूरता की मिसाल !! इसे बाज़ार कहते हैं और हम सभी कहीं न कहीं इनके चंगुल में हैं.
    आपने वही कहा है या कहने की कोशिश की है.जो सच है सूरज सा चमकता हुआ!

    हमज़बान यानी समय के सच का साझीदार
    पर ज़रूर पढ़ें:
    काशी दिखाई दे कभी काबा दिखाई दे
    http://hamzabaan.blogspot.com/2010/08/blog-post_16.html

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  28. यह इस दुनिया मे आने के बाद का चित्र है तो इसके बाद क्या होगा ?

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  29. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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  30. Wonderful Article..It has very rich content. Thanks for sharing..

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