बुधवार, 4 अगस्त 2010

फ़ूंकनी-चिमटा बिना यार-देखो मुहब्बत है बेकार

लैला और कैस की मुहब्बत परवान चढ रही थी, दोनो अपनी मुहब्बत को अंजाम तक पहुंचाने के लिए तत्पर थे। यह तो सब जानते हैं कि लैला अमीर की बेटी थी और कैस गरीब था।

जब कभी वे मिलते तो बहुत सारी बातें होती,घर गृहस्थी को लेकर। एक दिन लैला ने पूछ ही लिया कि-" अगर मिलन हो गया तो मुझे तुम्हारे घर में रहना होगा यह तो तय है,तुम्हारे घर में क्या फ़ूंकनी चिमटा है?"

लैला के यह पूछते ही बात बिगड़ गयी। कैस के घर में फ़ूंकनी चिमटा नहीं था। इतने मंहगे यंत्र वह गरीब कहां से लेकर आता। यह तो अमीरों के घरों में पाए जाते थे। 

उसने कहा कि "नहीं है? लेकिन तुम्हारे से शादी के बाद खूब कमाऊंगा और तुम्हारे लिए फ़ूंकनी चिमटा लेकर आऊंगा।"

लैला ने कहा-"मुझे तुम्हारा खाना तो बनाना पड़ेगा,क्या बिना फ़ूंकनी के चूल्हा फ़ूंकते-फ़ूंकते मेरे चेहरे की वाट लग जाएगी, सारा मेकअप उतर जाएगा। बिना चिमटे के रोटियाँ तवे से उतारते हुएं मेरी उंगलियाँ नहीं जल जाएंगी? वैसे तो तुम चांद-तारे तोड़कर लाने की बातें करते हो,एक फ़ूंकनी चिमटा नहीं ला सकते?"

कैस चुप हो गया,उसके पास कोई जवाब नहीं था। तत्काल इतनी मंहगी चीजों की व्यवस्था कहां से करता? फ़ूंकनी चिमटे के कारण नजदीकियाँ दूरियों में बदल गयी और कैस को लैला नहीं मिल सकी। एक फ़ूंकनी चिमटे ने बरसों की गहरी मुहब्बत को ठिकाने लगा दिया। 

उस जमाने में चिमटा और फ़ूंकनी चूल्हे-चौके के महत्वपूर्ण यंत्र होते थे। हर गृहस्थ चाहता था कि उसके चौके में ये दोनो चीजें हों। ऐसे ही एक मुहब्बत और ठिकाने लग गयी।

गोपाल दास"नीरज"ने लिखा है कि-"फ़िर भी मेरे स्वप्न मर गए अविवाहित केवल इस कारण। मेरे पास सिर्फ़ कुंकुम था,कंगन पानीदार नहीं था।"आज जितना महत्व पानीदार कंगन का है उतना ही महत्व लैला और कैस की मुहब्बत के जमाने में फ़ूंकनी और चिमटे का था।

मुहब्बत में कोई कमी नहीं थी,लेकिन वर्तमान की आवश्यक्ताएं आड़े आ गयी। जनम जनम के प्रीत की वाट लग गयी। 

वैसे आज भी मुहब्बत के सामने कुछ प्राथमिकताएं अनिवार्य हो गयी हैं। प्रेम करने के लिए कुछ अहर्ताएं है जिनका होना निहायत ही जरुरी है तभी आप प्रेम करने के अधिकारी हो सकते हैं।

मसलन प्रेमिका को घूमाने के लिए एक अदद गाड़ी (बाईक या कार),एक मोबाईल और एक एटीएम कार्ड या क्रेडिट कार्ड का होना जरुरी है।

अगर किसी के पास ये तीनों चीजें नहीं है तो प्रेमाधिकारी नहीं हो सकता। बस दो दिन बाद जब हकीकत पता चलेगी तो चिड़िया उड़कर उसके पास बैठी हुई नजर आएगी जिसके पास यह तीनों सुविधाएं होंगी।

कितनी महत्वपूर्ण हैं फ़ूंकनी और चिमटे जैसी चीजें,गृहस्थी इनसे से ही चलती है,सिर्फ़ कोरी मुहब्बत से नहीं।

मुंशी प्रेमचंद भी अपनी कहानी में लिख़ते हैं कि हमीद मेले में से चिमटा ही खरीद कर लाया। क्या मेले में अन्य चीजें नहीं मिलती थी?

लेकिन हमीद को जमाने के साथ चलना था। वह दूर तक सोचता था,बहुत आगे तक की सोचता था। चिमटा खरीद कर उसने मुहब्बत करने के लिए जरुरी सामान का इंतजाम कर लिया था। दादी के लिए चिमटा खरीद लाया था,क्योंकि खाना बनाते वक्त उसकी उंगलियाँ जल जाती थी। फ़ूंकनी उसके घर में पहले से मौजूद होगी।मुहब्बत को बचाने के दोनो सामान इकट्ठे करके उसने अपनी दूर दृष्टि का परि्चय दिया था। चिमटा लाने से दादी भी खु्श और होने वाली बीबी भी खुश,एक तीर से दो शिकार किए हमीद ने।

अब वह मुहब्बत करने के लिए अहर्ताएं पूरी करके तैयार था। नहीं तो उसकी मुहब्बत का भी हाल लैला और कैस जैसे ही हो जाता।

अब गर्व से महबूबा से कह सकता था कि-"मेरे पास चिमटा है,फ़ूंकनी है और दादी माँ भी है।"

उम्मीद तो है कि जब वह जवान हुआ होगा तो उसे अन्य प्रेमियों जैसे तकलीफ़ नहीं उठानी पड़ी होगी।फ़ूंकनी-चिमटे होने की खबर सुनकर कई उस पर मर मिटी होगीं।

कई माँए चूल्हा फ़ूंक-फ़ूंक कर सोचती रही होगीं कि कब उसका बेटा जवान हो और कब उसकी शादी करें? कितने बरसों तक फ़ूंकनी और चिमटे के बिना चुल्हा फ़ूंकना पड़ेगा और धुंए से अपना मुंह काला करना पड़ेगा।

कई तो भगवान से कहती होगीं कि-"हे भगवान! मेरे बेटे को जल्दी से बड़ा कर दे कि मैं बहू ले आऊँ, अब मेरे से चौंके चूल्हे का काम नहीं होता है।" 

माँ को बेटा जल्दी जवान इसलिए करना पड़ रहा है कि जब बहू आए तो दहेज में साथ में चिमटा-फ़ूंकनी भी लेकर आए और वह चौड़ी छाती करके गर्व से घुम-घुम कर दुश्मनों का जी जलाने के लिए गांव भर में कहती फ़िरे कि-"मेरी बहू तो चिमटा-फ़ूंकनी लेकर आई है।"

लोग उसकी तरफ़ ईर्ष्या भरी निगाहों से देखें और कहें कि-"देखो जी कितनी नसीब वाली है हमीद की अम्मा, बहू भी आई और दहेज में चिमटा-फ़ूंकनी भी लेकर आई, मैं तो अपने गुल्लु की शादी भी ऐसे घर् में करुंगी जहां फ़ूंकनी और चिमटा हो। कम से कम बिना मांगे दहेज में तो मिल जाएंगे।" सुनकर माँ को अपार तृप्ति होती।

फ़ूंकनी का अविष्कार चुल्हे में आग जलाने के लिए किसी जमाने में क्रांतिकारी अविष्कार रहा होगा। पहले बांस की फ़ूंकनी बनी होगी। जिससे चूल्हा फ़ूंका जाता होगा। बांस की फ़ूंकनी बार-बार जल जाती होगी तो फ़िर किसी पिता ने दहेज में अपनी लाडली बेटी के लिए स्थायी रुप से लोहे-पीतल आदि की फ़ूंकनी बनवाकर दी होगी या किसी प्रेमी से अपनी प्रेमिका की दु्ख तकलीफ़ न देखी गयी होगी,इसलिए फ़ूंकनी-चिमटे का अविष्कार हुआ होगा।

जिसके घर में फ़ूंकनी चिमटा नहीं होगें उसे समाज में अपना रुतबा बढाने के लिए क्या-क्या पापड़ नहीं बेलने पड़ते होगें?बीबी की सुविधा के लिए घूस खानी पड़ती होगी,गबन करना पड़ता होगा। रोज-रोज के उलाहने एवं जली-कटी बातें सुनने की बजाए डूब मरना ही पसंद किया होगा।

लोग फ़ूंकनी-चिमटा चोरी होने से बचाने के लिए उसकी पहरेदारी करते होंगें। चौकीदार भी रात को हांक लगाता होगा कि-"जागते रहो,अपना फ़ूंकनी चिमटा बचा कर रखो।"

सास भी बहू को ताने देती होगीं-"करमजली,किस भू्खे घर की पल्ले पड़ गयी, कम से कम फ़ूंकनी चिमटा तो लेकर आती।"  जीवन में फ़ूंकनी चिमटे का कितना महत्वपूर्ण स्थान रहा होगा। पत्नी से जली-कटी नहीं सुननी है तो फ़ूंकनी और चिमटे का जुगाड़ करके रखें।

37 टिप्‍पणियां:

  1. मजेदार ललित जी , मुझे लगता है की अक्ल से भी गरीब ही था बेचारा कैस, वरना तो तपाक से जबाब देता कि फिर तुम्हारे पिता दहेज़ में क्या देंगे ? फुकनी चिमटा भी लेते आना ! :)

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  2. @ गोदियाल जी
    कैस को तो जान के लाले पड़े थे,
    आप दहेज की बात कह रहे हैं :)))

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  3. बहुत खूब लिखा .. छोटी छोटी चीजे भी हमारे लिए कम आवश्‍यक नहीं होती है .. जमाने के हिसाब से ही आवश्‍यकता बनती है .. पर हामिद ने दादी के लिए चिमटा लिया था .. अपनी अम्‍मी के लिए नहीं .. सुधार कर लें !!

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  4. सही है, वक्त बदल गया, आज भी मुहब्बत के सामने कुछ प्राथमिकताएं अनिवार्य हो गयी हैं

    बी एस पाबला

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  5. जी पाबला जी
    ललित भाई बेलन के बारे में कुछ नईं लिखते !

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  6. @संगीता जी

    अब आपने तो सुधार कर ही दिया है।

    आभार

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  7. @ गिरीश दादा जी

    मैं तो चाव से लिख दुंगा,
    लेकिन आपने दादी जी से परमीशन ले ली क्या?:)

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  8. हाँ चिमटे के बारे में याद आया एक बार एक महिला चिमटे से अपने आदमी की जोरदार सुताई कर रही थी ... वैसे चिमटा बड़े काम की चीज है ..

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  9. त्रुटी सुधार - सुताई को सुटाई पढ़ा जाए

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  10. अच्छा लेख है,अब धुआँ रहित चूल्‍हे और उसकी बढ़ती कीमत पर भी लिखो

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  11. बहुत खूब!

    चिमटे की उपयोगिता तो आज भी है किन्तु आज के गैस चूल्हे के जमाने में फुँकनी के बदले गैस लाइटर का होना जरूरी है।

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  12. क्या सचमुच इतने मंहगें होते थे चिमटा और फूँकनी
    लेख बहुत पसन्द आया जी

    प्रणाम

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  13. यह रचना पढ़ कर बहुत मजा आया |पर आज के युग में लोग फुकनी का अर्थ व उपयोग नहीं जानते |इस का कोई और विकल्प भी हो सकता था |अच्छी पोस्ट पढ़ने में बहुत मजा आया |बधाई |
    आशा

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  14. @ अंतर सोहिल जी

    मांग और आपूर्ति पर मुल्य निर्धारित होता है।
    मसलन जब 28साल पहले डिजिटल घड़ी आई थी तो 3000/- के आस पास थी और अब 10रुपए में मिल जाती थी।

    फ़ूंकनी और चिमटा भी अपने समय का क्रांतिकारी अविष्कार था।
    इससे चौका-चुल्हा में एक नयी क्रातिं आई होगी। इसे भी हाथों-हाथ लिया गया होगा।

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  15. बहुत बढ़िया । वसुधा में प्रकाशित नासिर अहमद सिकन्दर की कविता " चिमटा " ज़रूर पढ़ें ।

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  16. ''chimate'' ke bahane yah ek achchha-khasa lalit nibandh hi ban gaya. jankeereepoorn lekh ke liye badhai...

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  17. बहुत मजेदार प्रस्तुति .....

    चिमटा तो आज भी रसोई में राज करता है पर फूंकनी के दिन कम से कम शहरों में तो गए....गाँव में शायद अभी भी अपना वर्चस्व बना कर रखा हो....

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  18. @ गिरीश बिल्लोरे

    ललित जी तो बेलन से इतने परिचित हो चुके कि अब ...

    हा हा हा

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  19. लैला पागल थी, अरे क्यो चिमटा फ़ुंकनी मांगी सीधा फ़ाईव स्टार होटल से खाना मंगवाते..... वेसे लोग बेलन बेलन बहुत कर रहे है, लगता है इन सब का प्यार बेलन से हो गया है:)

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  20. majedar prastuti..chimte ke astitw se to nahi nakara ja sakta .

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  21. बहुत ही बढिया आलेख्…………वक्त के साथ काफ़ी कुछ बदल जाता है।

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  22. बहुत दूर की कौड़ी लाये हो आज आप ...........बेहद उम्दा पोस्ट !

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  23. हर जमाने में मोहब्बत अहसास से उपर भी कुछ मांगती रही है, उस जमाने में फुंकनी चिमटा तो अब बाईक, मोबाईल और क्रेडिट कार्ड और शायद कल को जेट.

    अहसासों से उड़ान भरी जा सकती है मगर पेट नहीं भरता. यथार्थ के धरातल पर वादों और अहसासों से आगे जहाँ और भी है-यही निहितार्थ होगा लैला और कैस की कथा का और आपके इस निबंध का.

    बहुत उच्च कोटि का आलेख. बधाई.

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  24. ओतेरे कि , तो लैला मजनू की प्रेम कहानी में एक कैरेक्टर ये चिमटे और फ़ूंकनी भी थे ....हा हा हा शोध को फ़ौरन से पेशतर पेटेंट कराया जाए और , फ़टाफ़ट ही डा. ललित शर्मा जी को मानद उपाधि से नवाजा जाए ,और हमारी भी मांग है कि , बेलन पर ही अगला शोध किया जाए , बहुत से लोगों की हार्दिक इच्छा है...........जनहित में भी उसे जारी किया जाए बाद में

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  25. ललित जी ये बेलन वाली क्या कहानी है, गिरीश जी और पाबला जी खूब मजे ले रहे हैं!

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  26. इतने सुन्दर शोधपूर्ण लेख के लिए आंतरिक धन्यवाद ... अब समझ में आया चिमटे और फ़ूंकनी का राज़ ...

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  27. बहुत बढिया चिमटा फ़ूंकनी मय पोस्ट. भाटिया जी, आजकल जमाना मेड-इन-जर्मन का है.:)

    रामराम

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  28. महाराज,
    सस्ता, सुलभ और टिकाऊ जुगाड़ इतनी देर से क्यूं बताया?

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  29. लैला-मजनूं, शीरी-फरहाद, ससी-पुन्नू, हीर-रांझा, सोहनी-महिवाल, रोमियो-जूलिएट...

    चिमटा-फूंकनी, मक्खन-मक्खनी...

    जय हिंद...

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  30. …वक्त के साथ काफ़ी कुछ बदल जाता है।

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  31. आज के जमाने में महिलाओं को माड्यूलर किचन चाहिए...और बीबी को चम्मच पति पसंद है..और आफिस में भी साहब लोगों को चम्मच पसंद है...खैर आपको पोस्ट मजेदार और रोचक थी

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  32. aaj ki hakikat hi yahi hai ........jabtak jebkhaali hai koi shaadi nahi karega aur karni bhi nahi chahiye .......

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