बुधवार, 25 अगस्त 2010

घुटने टेक देने से जीत नहीं होती



लड़ो,  भिड़ो,   श्रम   करो, संघर्ष करो  
घुटने   टेक   देने   से जीत नहीं होती 

खुरचते  रहो, छिलते  रहो, काटते रहो
समर्पण  करने  से   जीत  नहीं  होती

झोंको,  तोड़ो,  काँटों को उखाड़ फेंको
हाथ  खड़े  करने से  जीत  नहीं  होती

बिना  चैन डटे रहो अंतिम साँस तक
डरके   भागने   से   जीत  नहीं होती


छोड़ते नहीं शिकारी सोई चिड़िया को
हार  मानकर सोने से जीत नहीं होती


27 टिप्‍पणियां:

  1. श्रमजीवी सारे मिल कर इकजाँ हो जाओ
    एक अकेले लड़ने से जीत नहीं होती ।।

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  2. लहरों से डर कर नौका पार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।

    नन्हीं चींटी जब दाना लेकर चलती है,
    चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है ।

    मन का विश्वास रगों में साहस भरता है,
    चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है ।

    आख़िर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।

    डुबकियां सिंधु में गोताखोर लगाता है,
    जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है ।

    मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
    बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में ।

    मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती ।

    असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
    क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो ।

    जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
    संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम ।

    कुछ किये बिना ही जय जय कार नहीं होती,
    कोशिश करने वालों की कभी हार नहीं होती !
    - निराला

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  3. "बिना चैन डटे रहो अंतिम साँस तक
    डरके भागने से जीत नहीं होती"


    सत्यवचन!

    हम भी डटे हुए हैं।

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  4. बहुत सुन्दर देशभक्ति से भड़ी प्रेरक प्रस्तुती ....आज ऐसे ही रचना से लोगों को जगाने की जरूरत है ...सार्थक ब्लोगिंग ...

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  5. प्रेरणादायक रचना ...संघर्ष ही जीवन है ..

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  6. रक्षाबंधन पर हार्दिक बधाइयाँ एवं शुभकामनायें!
    वाह बहुत बढ़िया लगा!

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  7. ललित जी,
    बहुत अच्छी लगी यह रचना।

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  8. स्वयं को संघर्षों के नाम अर्पित किये बिना जीत नहीं होती...
    (मेरीलेखनी.. मेरे विचार..)

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  9. समर्पण करने से जीत नहीं होती...बहुत अच्छी रचना।

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  10. हमारी टिप्पणी अशोक जी द्वारा उद्धृत निराला जी की कविता के सहित हैं :)

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  11. बहुत ही बेहतरीन और प्रेरणादायक रचना......

    प्रेमरस पर:
    बाप रे बाप, डॉक्टर!

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  12. वाह जी वाह ! आज तो सारी काम की बातें सिखा दी । बहुत बढ़िया ।

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  13. जोश से भरी है आप की यह कविता, ओर सच भी कि कभी भी हिम्मत हारने वालो की जीत नही होती , इस लिये कभी भी घुटने मत टेको.... धन्यवाद

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  14. लगे रहो ललित भाई ! लड़ो,भिड़ो ,श्रम करो ,
    संघर्ष करो ! हम सब ब्लॉगर आपके साथ हैं.

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  15. बहुत जोश भरी रचना ।
    यही कहती हुई,
    जब तक न सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
    संघर्ष का मैदान छोड़ कर मत भागो तुम ।

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  16. .
    ओज और ज़ोश से भरी जानदार कविता। अशोक बजाज जी के कमेन्ट में शामिल कविता, सोने में सुहागा है।
    .

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  17. एक बेहद उम्दा पोस्ट के लिए आपको बहुत बहुत बधाइयाँ और शुभकामनाएं !
    आपकी पोस्ट की चर्चा ब्लाग4वार्ता पर है यहां भी आएं !

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  18. शानदार एवं प्रेरणा दायक दायक रचना .........
    अशेष शुभकामनायें प्रेषित है स्वीकार करें !!

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