गुरुवार, 26 अगस्त 2010

श्रावणी उपाकर्म कैसे बना रक्षा बंधन

प्राचीन काल में श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पूर्णिमा को श्रावणी पर्व के रुप में मनाया जाता था। उस समय वेद और वैदिक साहित्य का स्वाध्याय होता था। लोग प्रतिदिन वैदिक साहित्य पढते थे, लेकिन वर्षा काल में विशेष रुप से पढा जाता था। वेद पाठ का आयोजन विशेष रुप से किया जाता था।

भारत की अर्थव्यवस्था कृषि पर आधारित है। पूर्णिमा को गुरुकुलों में विद्यार्थियों का प्रवेश होता था। इस दिन को विशेष रुप से विद्यारंभ दिवस के रुप में मनाया जाता था। बटूकों का यज्ञोपवीत संस्कार भी किया जाता था।
श्रावणी पूर्णिमा को पुराने यज्ञोपवीत को उतार कर नवीन यज्ञोपवीत को धारण करने की परम्परा भी रही है, जिसे हम वर्तमान में भी निभाते चले आ रहे हैं।

हमारे देश में आषाढ से लेकर सावन तक फ़सल की बोवाई सम्पन्न हो जाती है। ॠषि-मुनि अरण्य में वर्षा की अधिकता के कारण गांव के निकट आकर रहने लगते थे। जिसका लाभ ग्रामवासी उठाते थे। जिसे चातुर्मास या चौमासा करना कहते हैं।

चौमासे में ॠषि मुनि एक जगह वर्षा काल के चार महीनों तक ठहर जाते थे। आज भी यह परम्परा जारी है। इन चार महीनों में वेद अध्ययन, धर्म-उपदेश और ज्ञान चर्चा होती थी। श्रद्धालु एवं वेदाभ्यासी इनकी सेवा करते थे और ज्ञान प्राप्त करते थे। इस अवधि को "ॠषि तर्पण" कहा जाता था।

जिस दिन से वेद पारायण का उपक्रम आरम्भ होता था उसे “उपाकर्म” कहते हैं। यह वेदाध्यन श्रावण सुदी पूर्णिमा से प्रारंभ किया जाता था। इसलिए इसे “श्रावणी उपाकर्म” भी कहा जाता है।

पारस्कर के गुह्य सुत्र में लिखा है-“ अथातोSध्यायोपाकर्म। औषधिनां प्रादुर्भावे श्रावण्यां पौर्णमासस्यम् “ (2/10/2-2) यह वेदाध्ययन का उपाकर्म श्रावणी पूर्णिमा से प्रारंभ होकर पौष मास की अमावस्या तक साढे  चार मास चलता था। पौष में इस उपाकर्म का उत्सर्जन किया जाता था।

इसी परम्परा में हिंदु संत एवं जैन मुनि वर्तमान में भी चातुर्मास का आयोजन करते हैं, भ्रमण त्याग कर चार मास एक स्थान पर ही रह कर प्रवचन और उपदेश करते हैं।

मनुस्मृति में लिखा है-
श्रावण्यां पौष्ठपद्यां वाप्युपाकृत्य यथाविधि।
युक्तश्छन्दांस्यधीयीत मासान् विप्रोSर्ध पंचमान्।।
पुष्ये तु छंदस कुर्याद बहिरुत्सर्जनं द्विज:।
माघशुक्लस्य वा प्राप्ते पूर्वार्धे प्रथमेSहनि॥

अर्थात श्रावणी और पौष्ठपदी भ्राद्रपद, पौर्णमासी तिथि से प्रारंभ करके ब्राह्मण लगनपूर्वक साढे चार मास तक छन्द वेदों का अध्ययन करे और पौष मास में अथवा माघ शुक्ल प्रतिपदा को इस उपाकर्म का उत्सर्जन करे।

इस कालावधि में प्रतिदिन वेदाध्यन किया जाता था, प्रतिदिन संध्या और अग्निहोत्र किया जाता था। नए यज्ञोपवीत को धारण करके स्वाध्याय में शिथिलता न लाने का व्रत लिया जाता था। वेद का स्वाध्याय न करने से द्विजातियां शुद्र एवं स्वाध्याय करने से शुद्र भी ब्राह्मण की कोटि में चला जाता है। इस तरह वेदादि अध्ययन एव स्वाध्याय का प्राचीनकाल में बहुत महत्व था।

राजपूत काल में यह पर्व राखी के रुप में परिवर्तित हुआ। नारियाँ को दुश्मन यवनों से बहुत खतरा रहता था। वे बलात् अपहरण कर लेते थे। इससे बचने के लिए उन्होने वीरों को कलाई परे सूत्र बांध कर अपनी रक्षा का संकल्प दिलाया।

तब से यह प्रसंग चल पड़ और रक्षा बंधन का पर्व भी श्रावण सुदी पूर्णिमा को मनाया जाने लगा। राख का अर्थ ही होता है, रखना, सहेजना, रक्षित करना। कोई भी नारी किसी भी वीर को रक्षा सूत्र (राखी) भेज अपना राखी-बंध भाई बना लेती थी वह आजीवन उसकी रक्षा करना अपना कर्तव्य समझाता था।

चित्तौड़ की महारानी कर्णावती ने मुगल बादशाह हुमायूं को गुजरात के शासक से अपनी रक्षा हेतु राखी भेजी थी और बादशाह हुमायूं ने राखी का मान रखते हुए तत्काल चित्तौड़ पहुंच कर उसकी रक्षा की थी। तब से रक्षा-सूत्र के बंधन का व्यापक प्रचार प्रसार हुआ और रक्षा बंधन पर्व मनाया जाने लगा। जिसका वर्तमान स्वरुप आप सभी के सामने है। 

12 टिप्‍पणियां:

  1. उम्दा जानकारीपूर्ण आलेख रक्षाबंधन पर...आभार.

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  2. बहुत अच्छी प्रस्तुति---आभार

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  3. आज रक्षाबंधन सिर्फ भाई और बहन के मध्‍य के प्‍यार और राखी तक ही सिमटकर रह गया है .. श्रावणी पर्व के अन्‍य पहलुओं से अवगत कराने के लिए आपका आभार !!

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  4. भारतीय संस्कृति और सभ्यता के विषय में इस ज्ञानवर्धक जानकारी के लिए आभार!

    आज जब हमारे देश की विदेश आधारित शिक्षा नीति ने हमारी अपनी संस्कृति और सभ्यता से सम्बन्धित ज्ञान को न जाने किस अंधेरे गर्त में डाल रखा है, हिन्दी ब्लोगिंग में ऐसे ही पोस्टों की अत्यन्त आवश्यकता है। आप न केवल हिन्दी की अपितु भारतीय संस्कृति और सभ्यता की भी सेवा कर रहे हैं। धन्यवाद!

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  5. इस टिप्पणी को लेखक द्वारा हटा दिया गया है.

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  6. बहुत अच्छी जानकारी से परिपूर्ण लेख.

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  7. ज्ञानवर्धक पोस्ट के लिए धन्यवाद भईया.

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  8. इस ज्ञानवर्धक जानकारी के लिये आभार आपका.

    रामराम.

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  9. काफी ज्ञानवर्धक सामग्री मिली ......... बहुत बहुत आभार ........

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