शुक्रवार, 5 अगस्त 2016

क्रांतिकारी चंद्रशेखर आजाद की गुप्तवास स्थली

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भोजन के उपरांत मुकेश पाण्डेय जी मुझे उस स्थान पर ले गए जहाँ सातार नदी के किनारे काकोरी कांड के बाद छद्म नाम एवं वेशभूषा में चंद्रशेखर आजाद ने अपना अधिकतम समय गुप्तवास में काटा था। यहाँ काकोरी कांड 1925 के बाद क्रांतिकारी दल को पुन: गठित करने के उद्देश्य से चंद्रशेखर आजाद साधु वेश में गुप्त रुप से रहे थे। सातार नदी तो अब सूख चुकी है, परन्तु चंद्रशेखर आजाद की यादों की नदी अभी तक जन मानस में प्रवाहित है। द्वार पर चंद्रशेखर आजाद स्मृति मंदिर लिखा हुआ है। मध्य प्रदेश सरकार ने यहाँ उनकी आदमकद प्रतिमा स्थापित कर दी है।
स्मारक का प्रवेश द्वार
यहाँ चंद्रशेखर आजाद कुटिया में रहा करते थे। उनका मिट्टी का बिस्तर एवं उसका सिरहाना ज्यों  का त्यों संरक्षित है। परन्तु कुटिया की हालत खराब है, कभी भी गिर सकती है। इस कुटिया से पचीस कदम की दूरी पर उन्होने एक गुफ़ा भी बना रखी थी, जिसमें उनको आपातकाल में छिपने की सुविधा हो सके। काकारी कांड के बाद फ़रारी की हालात में आजाद का केन्द्र झांसी था। यहां उनके क्रांतिकारी साथी और संरक्षक मास्टर रुद्रनारायण सिंह, भगवानदास माहौर और सदाशिवराव मलकापुरकर थे। मास्टर साहब तो आजाद के बड़े भाई जैसे थे। 
चंद्रशेखर आजाद की आदमकद प्रतिमा
सातार नदी के किनारे आजाद आधा कंबल कमर से बांधे और आधा कंधों पर डाले सातार तटवासी बाबा बने रहे। लेकिन जल्दी ही वे धोती-कुर्ता से लैस होकर दल की एक साइकिल पर ढिमरपुरा आने-जाने लगे। काकोरी मामले से जुड़े क्रांतिकारियों में आजाद ही अकेले थे, जो फरारी की हालत में सक्रिय रह कर भी ब्रिटिश पुलिस के हाथ नहीं आए। नेतृत्व की स्वाभाविक जिम्मेदारी उनके ऊपर आ गई थी। क्रांतिकारी साथियों ने आजाद से मांग की कि वे झांसी छोड़ कर लाहौर, दिल्ली, आगरा, कानपुर, बनारस आदि शहरों में बारी-बारी से रहें। लेकिन आजाद ने अपना मुख्यालय झांसी ही बनाए रखा।
अज्ञातवास के दौरान शरण स्थली
एक बार आजाद सातार तट से झांसी लौट रहे थे कि उनका सामना दो पुलिस वालों से हो गया। वे पूछने लगे- ‘क्या तू आजाद है?’ बिना चौंके आजाद ने कहा- ‘हां, आजाद तो हैं! सो तो हम लोग होते ही हैं। हमें क्या बंधन है बाबा!’ सिपाहियों ने थाने चलने कहा तो वे दृढ़ता से बोले- ‘तुम्हारे थाने के दारोगा से हनुमानजी बड़े हैं। मैं तो हनुमानजी का हुक्म मानूंगा।’ पुलिस वाले भी उनकी सूरत देख कर समझ गए कि हनुमान भक्त उनसे तगड़ा है, सो उससे उलझना ठीक नहीं। 
कुटिया में ब्रह्मचारी आजाद का मृतिका विस्तर
यहाँ पर आजाद ब्रह्मचारी के रुप में रहते थे, उन्होंने अपने हाथ छोटा सा कुंआ खोदा और बजरंग बली की स्थापना भी की। यहां उनका नाम हरिश्चंद्र ब्रह्मचारी था। वे कमर में मूंज की लंगोटी बांधते एवं हाथ में रामायण का गुटका लेकर चलते थे।
बजरंग बली का मंदिर
आजाद के व्यवहार एवं चाल चलन को देखते हुए ढिमरापुर के ठाकुर मलखान सिंह ने स्कूल के लिए अपनी चौपाल में जगह दे दी। उनका दिन भर विद्याथियों के बीच चौपाल में कटता था। आपसी प्रेम एवं विश्वास ऐसा स्थापित हुआ कि ठाकुर लोग उन्हें अपना पाँचवा भाई मानते थे।
चंद्रशेखर आजाद द्वारा खोदा गया कुंआ
आजाद ने यहां रहकर संगठन के सूत्र पुन: जोड़े। मास्टर रुद्रनारायण सिंह उनके सहायक बने।। कई बार खतरों के समय मास्टर साहब के घर में वे सुरक्षित बने रहे। आजाद सातार तट पर रहे तो वहीं से उन्होंने क्रांतिकारी दल के बिखरे सूत्रों को जोड़ लिया था। काकोरी के मुकदमे की सूचनाएं और अखबारों की कतरनें आदि उनके साथी उन्हें दे जाते थे। 
सुरंग नुमा गुफ़ा: गुप्त आवास स्थल
यहां रहते हुए आजाद का संपर्क झांसी के जिन लोगों से बना हुआ था, उनमें सदाशिवजी के अलावा विश्वनाथ वैशम्पायन, बालकृष्ण गिधौशेवाले, सोमनाथ और कालिकाप्रसाद अग्रवाल थे। आजाद के गुप्त निवास के बारे में इन्हीं को मालूम था। आजाद ने कुछ खतरों को भांप कर सातार और ढिमरपुरा छोड़ दिया। पर आज भी सातार नदी के किनारे आजाद का स्थान उनकी याद दिलाता है। जारी है आगे पढें…

3 टिप्‍पणियां:

  1. पंडित जी के अज्ञातवास से जुड़ी यह रोचक जानकारी सांझा करने के लिए आपका बहुत बहुत आभार ललित दादा |



    ब्लॉग बुलेटिन की आज की बुलेटिन, " हिन्दी Vs English - ब्लॉग बुलेटिन “ , मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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