रविवार, 7 अगस्त 2016

बरुआ सागर का जराय का मठ

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ओरछा से हम झांसी खजुराहो मार्ग पर 19 किमी की दूरी पर स्थित जराय का मठ नामक स्थान पर आ गए। यहां सड़क के किनारे प्राचीन मंदिर है। जब हम पहुंचे तो दिन ढलने को था और मंदिर में ताला लगा हुआ था। हमको देखकर थोड़ी देर में ही एक युवक दौड़ते हुए आया और उसने द्वार उन्मुक्त कर दिया। 
जराय का मठ और मुकेश बाबू
जब हमने मंदिर में प्रवेश किया तो इसके द्वार पट देखकर ही दंग रह गए। द्वार पट ही पांच भागों में बना हुआ था। मंदिर की भव्यता देखकर मन गद गद हो गया। मैने मन ही मन मुकेश पान्डेय जी को आसीस दिया और मेरी दिन भर की थकान उतर चुकी थी। इस स्थान को बरुआ सागर के नाम से जाना जाता है और यह  उत्तर प्रदेश की सीमा में है।
जराय का मठ
यह मंदिर झांसी से 22 किमी की दूरी पर झांसी-मउरानीपुर राष्‍ट्रीय राजमार्ग पर बरुआ सागर में स्थिति है। संयोग से यह कवि इंदीवर का भी गाँव है। पंचरथ शैली के इस प्राचीन मंदिर का शिल्पांकन एवं अलंकरण देखते ही बनता है। इसे देखकर कलापारखी हो या अन्य पर्यटक, हठात देखता ही रह जाता है। इस मंदिर की मूर्तिकला सम्पूर्ण लावण्य को धारण किए हुए दिखाई देती है। मंदिर का प्रवेश द्वार पूर्वाभिमुख है। 
पार्श्व भित्ति पर दिग्पाल
मंदिर का द्वार अलंकरण इतना भव्य है कि मैने अभी तक अन्य स्थान पर नहीं देखा। मन्दिर के प्रवेश द्वार की पंच-शाखाओं में पाँच-पट्टिकाएँ निर्मित हैं । पंच-शाखाओं में -गंधर्व शाखा ,मिथुनशाखा , स्तम्भशाखा , देवशाखा ,और पाँचवी पत्रलताशाखा के रूप में प्रदर्शित है। द्वार स्तम्भ के निम्न भाग में गंगा व यमुना नदी की प्रतिमाओं को अपने वाहनों सहित अति सुन्दर कलात्मक प्रदर्शित किया गया है ।
अलंकृत द्वार शिलापट
मन्दिर की भित्तियों पर भी शिल्पकारों की कला -सौष्ठवता के साथ-साथ उनके मस्तिष्क में उपजी कल्पनाओं का सुन्दर समावेश है। यह भी पाँच पट्टिकाओ में विभक्त है। सर्वोपरि पट्टिका में पंच रथिकाओ में संगीतज्ञों व नृत्यकारों को प्रदर्शित किया है। द्वितीय पट्टिका में कीर्तिमुख के आस -पास चार-चार दिग्पालो को प्रदर्शित करके अष्ट दिग्पालों (इन्द्र ,अग्नि ,वायु ,वरूण ,कुबेर ,ईशान ,यम, व नैऋति ) को उत्कीर्ण किया गया है । तृतीया पट्टिका में भगवान शिव एवं भगवान विष्णु की प्रतिमाओं के साथ-साथ अन्य देवी देवताओं की भी प्रतिमाएँ उत्कीर्ण की गई है। 
लक्ष्मी नारायण
चौथी पट्टिका में छः अलग-अलग रथिकाओं में गजलक्ष्मी, महेश्वरी, सरस्वती, चक्रेश्वरी, पार्वती एवं दुर्गा अपने-अपने शस्त्रों से सुसज्जित दिखाई देती है और दो -दो रथिकाओ के बीच में नृत्य व संगीत से संबंधित प्रतिमायें सुन्दर मुद्राओं के साथ अंकित है। अन्तिम पट्टिका में दाईं ओर परम पिता परमेश्वर ब्रह्मा जी व बांई ओर भगवान शिव शंकर विराजे है मध्य में भगवान विष्णु जी के साथ उनकी शक्ति महालक्ष्मी अपने आयुधों के साथ विराजमान प्रदर्शित है ।
भैरव
मन्दिर के प्रवेश द्वार के ऊपर प्रदर्शित वाराही व महिषासुर मर्दिनी देवी के अतिरिक्त अन्य प्रतिमाओं के अलंकरणों के सुन्दर प्रदर्शन से मन्दिर के अग्रभाग में भव्यता व आकर्षण है । मन्दिर की तीनों दिशाओं -उत्तर दक्षिण व पश्चिमवर्ती भागों पर जालियों की कारीगरी का सुन्दर अलंकरण है साथ ही इन्हीं जालियों की पच्चीकारी में बने अलंकृत कलापूर्ण शीर्षयुक्त रथिकाओं तथा देव प्रकोष्ठ में विभिन्न देवी देवता को विराजे हुऐ दिखाया गया है। 
सूर्य
दक्षिण की ओर हिरण्याकश्यप, नृसिंह। खट्वांग ढाल लिये हुए अभय मुद्रा वाली चतुर्भुजी देवी दुर्गा व चतुर्भुजी देवी चामुण्डा यहाँ द्रष्टव्य है । वही पश्चिम की ओर महिषारूढ यम व सप्त अश्वारूढ़ सूर्य एवम् त्रिनेत्र धारी चतुर्भुजी वृषारूढ शिव का प्रदर्शन बहुत आकर्षक है। उत्तरी-दिशा की ओर लक्ष्मी -नारायण, अर्ध नारीश्वर,षटभुजी महिषासुर मर्दिनी तथा कमल हस्ता लक्ष्मी शिल्पांकित हैं।
नदी देवी यमुना
मंदिर को देखकर लगा कि आज का दिन बन गया। वरना भीषण गर्मी में ओरछा के महल दूमहलों को देखते हुए जो मन एवं देह निढाल हो रही थी, उसे पुन: उर्जा मिल गई। इस मंदिर का निर्माण महाभारत में वर्णित राजगृह की यक्षिणी जरा के नाम से किया गया है। इसलिए जराय का मठ नाम रुढ हो गया। मंदिर शिल्प के अनुसार यह नवमी-दशमी शताब्दी का माना जा सकता है। इस मन्दिर में भग्न प्रतिमाएँ है। 
नाग कन्या
स्थानीय निवासी कहते हैं कि औरंगजेब ने इस मंदिर की मूर्तियों को खंडित कर दिया था, लेकिन वह मंदिर को पूरी तरह से नहीं तोड़ सका। इस मंदिर का निर्माण किसने कराया, किससे नाम से कराया इसका उल्लेख कहीं नहीं मिलता। आशा है कि भविष्य में इस स्थान के आस पास उत्खनन हो तो कोई जानकारी इस विषय में मिल सके। जराय का मठ दर्शन करके हम ओरछा लौट आए। अब लाईट एन्ड साऊंड कार्यक्रम देखने की बारी थी। जो नौ बजे प्रारंभ होने वाला था।  जारी है … आगे पढें…

2 टिप्‍पणियां:

  1. आश्चर्य संयोग है कि मैंने भी आज ही फेसबुक पर इस अद्भुत मन्दिर के बारे में लिखा है। आपने तो बहुत सुन्दर विवरण दिया है मगर जराय नाम का कारण स्पष्ट नहीं है।

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  2. मुझे भी उस दिन बहुत कुछ आपके माध्यम से सीखने-समझने को मिला . आभार आशीष बनाये रखना .

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