सोमवार, 1 अगस्त 2016

बैजनाथ मंदिर एवं पातालभुवनेश्वर की गुफ़ा

आज भाई साहब ने कहा कि आपको बैजनाथ मंदिर दिखाते हैं। हमने यहां से कौसानी रोड़ पर स्थित सोमेश्वर पहुंच कर सबसे पहले पंचर टायर में ट्यूब डलवाई, इसमें कुछ समय लगा फ़िर आगे बढ गए। दो बजे के लगभग कौसानी पहुंचे, यहाँ से बागेश्वर पहुंच कर खाना खाया। बाऊ जी ने सुन रखा था कि इस इलाके में बॉल मिठाई मिलती है। भोजन करके बॉल मिठाई की दुकानों की ओर गए। यहाँ लाईन से मिठाई की कुछ दुकाने हैं, राणा मिठाई भंडार में हमने कुछ मिठाईयाँ चखी और बाऊ जी ने आधा किलो बॉल मिठाई खरीदी घर के लिए। अलवर के ब्राऊन केक की तरह स्वाद था। उस पर होमियोपैथी वाली शक्कर की गोलियाँ चिपकाई हुई थी। इससे मिठाई दुगनी मीठी हो गई थी। मुझसे सिर्फ़ आधा टुकड़ा ही खाया गया। बागेश्वर से बैजनाथ सत्रह किमी था। पहाड़ी हिसाब से एक घंटे की दूरी मानी जा सकती है।
सोमेश्वर में पंचर लगवाते भाई साहब एवं बाऊ जी
बैजनाथ पहुंचने पर नदी के किनारे मंदिर समूह दिखाई देने लगा। नदी जहाँ पर एक तीखा मोड़ लेती है वहाँ पर टापू जैसा निर्माण हो गया है। इसी पर यह नागर शैली मंदिर समूह स्थित है। मुख्य मंदिर शिव को समर्पित है, इसके साथ 17 अन्य छोटे मंदिर केदारेश्वर, ब्रह्माणी एवं अन्य को समर्पित हैं। मुख्य मंदिर का तल विन्यास पंचरथ है, इसके अग्र भाग में मंडप स्थित है तथा शिखर पूर्व में भग्न हो चुका है। इस मंदिर का प्रमुख आकर्षण सिस्ट पत्थर से निर्मित पार्वती की सुंदर स्थानक प्रतिमा है। इस प्रतिमा का शिल्प लाजवाब है तथा पॉलिश आज तक अक्षुण्ण है, इसके अतिरिक्त अन्य 26 प्रतिमाएं भी हैं जिन्हें एक कमरे में बंद कर रखा है। 
बैजनाथ मंदिर समूह
इस मंदिर तक पहुंचने के लिए गाड़ी सड़क पर ही छोड़नी पड़ती है, मंदिर समूह तक पहुंचने के पैड़ियाँ और सीमेंट की पगडंडी बनी हुई है। हम पहुंचे तक काफ़ी पर्यटक दिखाई दिए। यहाँ सभी मंदिरों को एक-एक पुजारियों ने बांट रखा है। मुख्य मंदिर में फ़ोटो खींचना मना है। यह मंदिर भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण के अधीन है। हमने मंदिर की बाहर से फ़ोटो ली और थोड़ा शिल्प का अध्ययन किया। इन मंदिरों का निर्माण कार्तिकेयपुर के कत्युरी राजाओं ने 9 वीं सदी से 12 वीं सदी के मध्य कराया था।  इसके बाद आगे की यात्रा के लिए रवाना हो गए। 
बैजनाथ मंदिर समूह तक जाने का मार्ग
रास्ते में सीढीदार खेतों में फ़सल बोने की तैयारी हो रही थी। छोटे खेत होने के कारण हल से तो जुताई संभव नहीं है, इसलिए कुदाल का प्रयोग किया जाता है मिट्टी उलटने के लिए। पहाड़ी ढलान पर ऊपर नीचे खेत होने के कारण किसान की अच्छी परेड हो जाती होगी। परन्तु पहाड़ी लोगों को इसकी आदत पड़ गई है। मैदान का आसमी पहाड़ों में पहुंच कर चार दिन नहीं रह सकता क्योंकि उससे बस दिन भर ऊपर चढना और नीचे उतरना पड़ेगा। ऐसे ही पहाड़ का आदमी मैदान में आकर थक जाता है। दोनों की जीवन शैली अलहदा है।
घाटी का सुंदर दृश्य एवं सीढी दार खेत
अब हमको बेरीनाग होते हुए पाताल भुवनेश्वर जाना था। बैजनाथ से बैगीनाग 56 किमी की दूरी पर है एवं बेरीनाग से पातालभुवनेश्वर 25 किमी। हमको यहां से चलते चलते तीन बज गए। बैरीनाग से पाताल भुवनेश्वर का रास्ता बहुत खराब है। सड़क पर डामर नहीं है और रोड़ियाँ निकली हुई हैं। समुद्र तल से पाताल भुवनेश्वर की ऊंचाई 4455 फ़ुट है। भाई साहब ने यह दूरी पार जल्दी ही पार कर दी। हम अंधेरा होने से पहले पाताल भुवनेश्वर पहुंच गए थे। यहाँ के पुजारी संघ के अध्यक्ष भंडारी जी ने यात्रियों के लिए ठहरने की व्यवस्था कर रखी है। भाई साहब ने उन्हें फ़ोन करके आने की सूचना दे दी थी और भोजन के लिए भी कह दिया था।
बेजनाथ मंदिर में एक सेल्फ़ी तो बनती है।
रात हमने रुम लिया और सामान रख कर भोजन करने होटल में आ गए। यहाँ सिर्फ़ एक दो होटल ही हैं। भोजन की अन्य सुविधा नहीं है। भंडारी जी ने एक होटल वाले को कह दिया था। जब हम पहुंचे तो वह रोटी बना रहा था। मैने उससे पूछा कि प्याज है क्या? तो उसने मना कर दिया। मैने कहा कि कहीं से इंतजाम करो, उसके बिना तो खाने में मजा नहीं आएगा। मेरी टोन से उसे लगा कि मैं उसे धमका रहा हूँ। उसने कहा कि आप दादागिरि कर रहे हो, मैं खाना नहीं खिलाऊंगा। भाई साहब ने भी कहा कि इनकी टोन ऐसी ही है। फ़िर भी वह नहीं माना और होटल बंद कर दिया। हम रुम में आ गए। मेरे पास सत्तु अचार और प्याज नमक आदि सारा इंतजाम था। सत्तु के एक-एक लड्डू खाकर हम सो गए।
पाताल भुवनेश्वर का प्राचीन शिवालय
सुबह उठे तो बरसात हो रही थी, बरसात के थमने के साथ ठंडे पानी से नहाना काफ़ी भारी पड़ा। यहाँ गर्म पानी नहीं मिला, ठंडे पानी से ही आह ऊह करते हुए स्नान करना पड़ा। हमारे गेस्ट हाऊस के समीप ही एक मंदिर समूह था। जिसका निर्माण कत्युरी राजवंश ने कराया था। कुमाऊं में कत्युरी शासकों का शासन था। कत्यूरी राजवंश भारत के उत्तरांचल राज्या का एक मध्ययुगीन राजवंश था जिनके बारे में में मान्यता है कि वे अयोध्या के शालिवाहन शासक के वंशज हैं और इसलिए वे सूर्यवंशी हैं। तथापि, बहुत से इतिहासकार उन्हें कुनिन्दा शासकों से जोड़ते हैं और खस मूल से भी। जिनका कुमाऊँ क्षेत्र पर छठीं से ग्याहरवीं सदी तक शासन था। 
कमरे की बालकनी से घाटी का सुंदर नजारा
पाताल भुवनेश्वर के नागर शैली में निर्मित शिवालय एवं चामुंडा मंदिर का निर्माण भी शिल्प की दृष्टि इनके शासन काल में हुआ प्रतीत होता है। इस स्थान पर कई मंदिरों के आमलक दिखाई देते हैं और इसके साथ ही एक स्थान पर द्वार शिला भी दिखाई देती है। इससे पता चलता है कि यहाँ अन्य मंदिर भी रहे होंगे। वर्तमान में प्रस्तर निर्मित शिवालय एवं चामुंडा मंदिर हैं। शिवालय में एक गर्भगृह एवं मंडप निर्मित है, इसके शीर्ष पर हार्मिका जैसी आकृति बनी हुई दिखाई देती है। जिसका निर्माण परवर्ती काल में हुआ होगा। आमलक के ऊपर कलश रखने के लिए इसका निर्माण किया गया है। यह मंदिर सतत पूजित है।
कुमाऊंनी शैली का परम्परागत खंडहर घर 
चामुंडा मंदिर का सिर्फ़ प्रस्तर निर्मित गर्भगृह ही सलामत है, इसके मंडप का निर्माण एक दशक पूर्व ही किया गया है। मंदिर में निर्मांसा चामुंडा की प्रतिमा स्थापित है और यह सतत पूजित है। इसके साथ ही यहाँ अन्य प्रतिमाएं भी रखी हुई हैं, जिनमें लकुलीश, ऊमा महेश्वर, चंडिका, सूर्य, द्वारपाल इत्यादि हैं। यहाँ का प्राकृतिक वातावरण मनमोहक है। घाटियों में सैर करते हुए बादल मनमोहक दिखाई देते हैं। पातालभुवनेश्वर गुफ़ा के अतिरिक्त यह मंदिर समूह भी दर्शनीय है। 
पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा का मार्ग
यह स्थान दिल्ली से लगभग पाँच सौ किमी एवं 15 घंटे की दूरी पर कुमाऊँ अंचल में है। उत्तराखंड के कुमाऊं मंडल के प्रसिद्ध नगर अल्मोड़ा से शेराघाट होते हुए 160 किलोमीटर की दूरी तय कर पहाड़ी वादियों के बीच बसे सीमान्त कस्बे गंगोलीहाट समीप है। पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा किसी आश्चर्य से कम नहीं है। इसके रास्ते में धवल हिमालय पर्वत की नयनाभिराम नंदा देवी, पंचचूली, पिंडारी, ऊंटाधूरा आदि चोटियां दिखाई देती हैं। हालांकि यह स्थान प्राचीन गुफ़ा के लिए प्रसिद्ध है, इसके अतिरिक्त यहाँ पर एक मंदिर समूह भी है।
पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा का रास्ता एवं कार्यालय
मंदिर समूह के दर्शन करने के बाद हम पाताल भुवनेश्वर गुफ़ा के दर्शन के लिए साढे नौ बजे पहुंचे। यह लाईम स्टोन की एक गुफ़ा है। जिसका प्रवेश द्वार सकरा है तथा नीचे उतरने के लिए संकल बांधी गई है। हमारे पहुंचते तक यहाँ बंगालियों की लाईन लग गई थी। एक खेप में दस-पन्द्रह लोगों को प्रवेश दिया जा रहा था। उनके निकलने के बाद दूसरी खेप भीतर प्रवेश करती थी। गुफ़ा का सकरा मुहाना देख कर मेरी प्रवेश करने की इच्छा खत्म हो गई। देखते ही दम सा घुटने लगा। मैने भीतर जाने से मना कर दिया। बाऊ जी और भाई साहब ही भीतर गए। बाऊ जी ने बाहर आने के बाद कहा कि अच्छा किया जो आप भीतर नहीं गए।
गुफ़ा में प्रवेश करने की बारी का इंतजार करते पर्यटक
लाईम स्टोन की इस गुफ़ा में विभिन्न तरह की आकृतियाँ बनी हुई हैं, जिन्हें देवी देवताओं का नाम दे दिया गया है। ऐसी ही गुफ़ाएँ छत्तीसगढ़ के बस्तर अंचल के कुटुमसर में हैं। जिनकी लम्बाई पैंतालिस किमी तक बताई जाती है। इसका मुहाना भी छोटा सा है, जहां लोग प्रकाश की व्यवस्था करके जाते हैं। इतिहास से जोड़कर इसका महिमा मंडन किया गया है। सूचना फ़लक में लिखा है कि - त्रेता युग में इस गुफ़ा की खोज राजा ॠतुपर्ण द्वारा, द्वापर में पाण्डवों एवँ कलयुग में आदि गुरु शंकराचार्य द्वारा की गई। फ़िर उन्ही के द्वारा इस गुफ़ा की जानकारी चंद्र राजाओं को दी गई। चंद्र राजाओं ने यहाँ पूजा करने के लिए भंडारी परिवार को बसाया। तब से भंडारी परिवार यहाँ काबिज है। जारी है, आगे पढें…

10 टिप्‍पणियां:

  1. पाताल भुवनेश्वर गुफा में लोग पहले मशालें जला कर नीचे अंदर जाते थे।
    मशालों के धुँए से काली हुई गुफा से बाहर निकलने पर हाथ-पैर और कपड़े काले मिलते थे। 1990 के बाद सेना के सौजन्य से गुफा में एक जनरेटर द्वारा प्रकाश की व्यवस्था हुई। पहली बार मैं भी गुफा में जाकर पूरा काला हो गया था।
    अब यहां रात को रुकने के लिए कुमाऊं विकास निगम की अतिथिशाला के अतिरिक्त और भी स्थान बन गये हैं। आहार-अल्पाहार के लिए भी कई ठिकाने बन गये हैं। पहले की यात्राओं में दो बार मुझे गंगोली हाट जाकर होटल में रुकना पड़ा था।

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    1. मशाल ले कर जाना तो बहुत पुराने समय की बात है, उसे छिलुका कहा जाता था। अब तो लाइट की पूरी व्यवस्था है वहां।

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  2. बहुत ही सुन्दर और व्रस्तांत वर्णन किया है आपने, फोटो भी बहुत बढ़िया है। धन्यवाद।

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  3. आपकी ब्लॉग पोस्ट को आज की ब्लॉग बुलेटिन प्रस्तुति जन्मदिन : मीना कुमारी और ब्लॉग बुलेटिन में शामिल किया गया है। सादर ... अभिनन्दन।।

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  4. ​सुन्दर यात्रा वर्णन। समय निकाल कर यहाँ तक पहुंचना कोई आसान काम नहीं।

    पातळ भुवनेश्वर की गुफा के मुहाने पर पहुँच कर भीतर प्रवेश नहीं किया ?? मात्र छह फुट नीचे उतरने के बाद नीचे बड़ा आंगन है जिस पर आराम से खड़े होकर चलते हुए भव्य देवलोक की दुनिया दीख जाती है। पांडुखोली में बाबा की धूनी आज भी जल रही है, फिर वहीं पास में महावतार बाबा की गुफा। देखनी थी, ललित भाई। कुमाऊं की शुभ यात्रा आप तीनों को। ​

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  5. सुंदर वर्णन सर्। फोटो भी सुंदर है,2015 में मैने भी परिवार के साथ नैनीताल, कौसानी ओर वैजनाथ की यात्रा की थी लेकिन पाताल भुवनेश्वर नही जा पाए थे,कौसानी से वैजनाथ ओर अल्मोड़ा का रास्ता बेहद सुंदर है।

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  6. सुंदर वर्णन सर्। फोटो भी सुंदर है,2015 में मैने भी परिवार के साथ नैनीताल, कौसानी ओर वैजनाथ की यात्रा की थी लेकिन पाताल भुवनेश्वर नही जा पाए थे,कौसानी से वैजनाथ ओर अल्मोड़ा का रास्ता बेहद सुंदर है।

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