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एक चित्र--जरा इसे भी देखिए----------ललित शर्मा

जादी को छ: दशक बीत चुके हैं, प्रतिवर्ष बजट मे नयी-नयी योजनाओं का आगाज होता है। फ़िर वही नारे लगते हैं गरीबी हटाओ, गरीबी हटाओ। मानवाधिकार की बाते गर्माती हैं वातावरण को 2 रु किलो गेंहुँ-चावल बांटने की योजना का शुभारंभ होता है, कोई भुखा नही मरेगा। सबको रोटी कपड़ा मकान उपलब्ध होगा। कुकुरमुत्ते की तरह गली-गली मे उग आई हैं स्वयं सेवी संस्थाएं। जिसे NGO कहा जाता है। सेवा के नाम पर नोट बटोरे जा रहे हैं। वृद्धाश्रम भी खोले जा रहे हैं, जहां पर निराश्रित वृद्ध रह कर अपने जीवन के बाकी दिन काट सकें। लेकिन यह सब सेवा कागजों मे ही हो जाती  है। मानव और पशु मे कोई अंतर नही है। इसका एक उदाहरण मैने रायपु्र रेल्वे स्टेशन मे देखा जहाँ एक वृद्ध महिला प्लेटफ़ार्म पे पड़ी थी और गाय उसको चाट रही थी और वह गाय को। लोग भीड़ लगा कर इस दृष्य को देख रहे थे। इन्सान और जानवर मे फ़र्क करना मुस्किल था। यह जनता का, जनता के द्वारा, जनता के लिए शासन है।

Comments :

19 टिप्पणियाँ to “एक चित्र--जरा इसे भी देखिए----------ललित शर्मा”
Suman ने कहा…
on 

nice

M VERMA ने कहा…
on 

वादे, वादे के लिये होते है
विसंगतियाँ हर जगह हैं

Udan Tashtari ने कहा…
on 

उफ्फ!!!

काजल कुमार Kajal Kumar ने कहा…
on 

यहां इन्सान की क़ीमत कुछ भी नहीं.

शरद कोकास ने कहा…
on 

एक कवि की पंक्तियाँ याद आ गईं,,,,

चीनो अरब हमारा ,हिन्दोस्ताँ हमारा
रहने को घर नहीं है ,सारा जहाँ हमारा ।

जी.के. अवधिया ने कहा…
on 

"सेवा के नाम पर नोट बटोरे जा रहे हैं।"

आज नोट बटोरना ही तो इन्सान का ध्येय बन गया है, सेवा तो बस दिखावा है।

Kulwant Happy ने कहा…
on 

एक माँ अपने बेटे का दर्द बाँट रही है? जो बिस्लरी की बोतल में शायद नल का भर या शराब भर पी गया होगा।

Kulwant Happy ने कहा…
on 

सही कहा...सरकार का नया कोई भूखा नहीं मरेग..जिन्दा तो रह सकता है।

राजकुमार ग्वालानी ने कहा…
on 

लाजवाब

ताऊ रामपुरिया ने कहा…
on 

बहुत दर्दनाक है.


रामराम.

rashmi ravija ने कहा…
on 

ओह्ह... बहुत ही मार्मिक ...

पं.डी.के.शर्मा"वत्स" ने कहा…
on 

अब क्या कहें! इन्सान और पशु का भेद ही मिटता जा रहा है.....

राज भाटिय़ा ने कहा…
on 

ओर यह जानवर उस इंसान से पुछ रहा है इस देश मै तेरे ओर मेरे मै क्या फ़र्क है? तुझे भी मां कहते है, ओर मुझे भी गाऊ माता कहते है, क्या यही इज्जत है एक मां की.....
इन नेताओ को जब अपनी ओकात ही भुल गई तो कोई क्या कहे... इन्हे शर्म बिलकुल नही

shikha varshney ने कहा…
on 

वाकई अंतर करना मुश्किल है...बेहद मार्मिक.

यशवन्त मेहता "फ़कीरा" ने कहा…
on 

bahut hi marmik drishya....

अल्पना ने कहा…
on 

बहुत ही मार्मिक दृश्य है।

महेन्द्र मिश्र ने कहा…
on 

मार्मिक दृश्य है...

कृष्ण मुरारी प्रसाद ने कहा…
on 

नि:शब्द.....

मास्टर जी ने कहा…
on 

बहुत ही मार्मिक दृश्य है।

 

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