रविवार, 18 जुलाई 2010

सड़क पर बैठे जानवर बाईक सवारों के लिए यमदूत

ल रात को घर आ रहे थे, कुछ विलंब हो गया था। रात के ग्यारह बज रहे थे। हम बाईक से थे, वैसे भी घर वाले बाईक से जाने से मना करते हैं। लेकिन शहर में बड़ी गाड़ी में दूगना समय लगता है और काम भी नहीं हो पाता।

सारा समय चौक चौराहों पर ही कट जाता है। इसलिए बाईक ही एक ऐसा साधन है जिससे जल्दी सारे काम निपटाए जा सकते हैं। इसलिए हम अकेले रहने पर बाईक से ही जाना पसंद करते हैं।

घड़ी चौक पर गड्ढा
रायपुर शहर की ट्रैफ़िक व्यवस्था सुधारने की कप्तान साहब दिल से कोशिश कर रहे हैं। ट्रैफ़िक में सि्पाहियों की नफ़री भी बढा दी गयी है। धुंवाधार चालान काटे जा रहे हैं। सब तरफ़ अफ़रा तफ़री मची है।

हम कल रात तो शहर के मध्य स्थित व्यस्ततम चौराहे घड़ी चौक से गुजर रहे थे। अचानक ही सामने इतना बड़ा गड्ढा आ गया कि गिरते गिरते बचे ।

दो बार तो कार और बाईक से अपनी दोनो तरफ़ की पसलि्याँ तुड़वा चुके हैं। अब शायद हाथ पैर का नम्बर है और मुड़ भी फ़ूटने से बचा है।

रात 11 बजे आम्रपाली सोसायटी के सामने हाईवे पर मवेशी
रायपुर शहर में आने वाले आम नागरिक और मुख मंतरी से संतरी तक को इस चौराहे पर दिन में कई चक्कर काटने पड़ते हैं ।

यह मंत्रालय के सामने का मुख्य चौक है। जहाँ से प्रदेश की सरकार चलती है। लेकिन यह गड्ढा किसी को दिन में भी दिखाई नहीं देता जिसकी तश्वीर हमने रात में ली है।

दो किलोमीटर आगे सरके तो नेशनल हाईवे 43पर आम्रपाली सोसायटी के पास मवेशियों का हुजुम लगा हुआ था। कोई बैठा पगुरा रहा था,कोई खड़ा होकर घूर रहा था। कोई अपने आराम में खलल होने से बेचैन था।
मस्त रहो मस्ती में,आग लगे बस्ती में

तरह-तरह के एक्सन और पोज में गायें बैठी थी। गाड़ियों के हार्न का उन पर कोई असर नहीं पड़ रहा था। मस्त रहो मस्ती में, आग लगे बस्ती में। कहने का तात्पर्य यह है कि पूरी सड़क हाईजैक हो गयी थी। कोई माई बाप नहीं।

ऐसे में कोई बाईक सवार इनसे टकरा जाए तो उसका राम-नाम सत्य समझो। अगर कोई बड़ी गाड़ी वाला न देख पाए तो इनका राम-नाम सत्य समझो। इस तरह रात को अपने मवेशी खुले छोड़ने वालों के खिलाफ़ कड़ी कार्यवाही होनी चाहिए।

जब तक इनके मालिकों को जेल नहीं भेजा जाएगा ये नहीं सुधरने वाले। इस तरह हाईवे पर किसी की जान से खिलवाड़ करना ठीक नहीं है। किसी की जान जाती है तो उसका जिम्मेदार कौन होगा?

33 टिप्‍पणियां:

  1. रायपुर हो या दिल्ली । हाल सब जगह एक जैसा है ।
    अब इसे अत्याधिक आबादी कहें या अनुशासनहीनता --वज़ह कोई भी हो लेकिन विकसित देशों के मुकाबले हम अभी बहुत पीछे हैं ।
    बात बात में बहुत अच्छी बात को उठाया है ललित जी ।

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  2. सही मायने में तो सड़कें(तथाकथित सड़कें - गड्ढे) मवेशियों के लिये और मवेशियों जैसे व्यवहार करने वालों के लिये रिज़र्व हैं, ये तो आप(हम भी)जैसे लोग हैं जो इनकी आजादी में खलल डालते हैं। क्या जरूरत है कहीं भी आने-जाने की?

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  3. जब तक इस देश में आम आदमी अपनी जिम्‍मेदारी नहीं समझेगा तब तक पुलिसियां डण्‍डा इन्‍हें नहीं सुधार सकता। सारे ही शहरों के ऐसे हाल है। मुझे तो एक बात समझ नहीं आती कि जिस देश में इतने सारे धर्म गुरु हों और उनके प्रवचन सुनने लाखों लोग आते हों तब भी वे केवल मोक्ष की ही बात करें और वर्तमान जीवन के बारे में चर्चा भी ना करे? यदि सारे साधु-संयासी भी अपना कर्तव्‍य समझकर अपने भक्‍त जनों को अच्‍छा नागरिक बनने के लिए प्रेरित करें तो इस देश की समस्‍या सुलझ सकती है। लेकिन उन्‍ह‍ें भी तो पैसा ही चाहिए।

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  4. ट्रेफिक व्यवस्था सुधारने के नाम पर तो सिर्फ चालान ही काटे जाते है !!

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  5. जागरूक ब्लॉगर की जिम्मेदार पोस्ट।

    गाय हमारी माता है
    भैंस हमारी मौसी है।
    उनके आराम में खलल कैसे डाला जाय? अब उन्हें पगहा नहीं सुहाता तो क्या किया जा सकता है?

    गड्ढों की तो खूब कही! सनातन, सार्वकालिक, सार्वजनिक ....चाहे जितने सर्व लगा लीजिए।
    मैंने तो पूरी शृंखला ही लिख मारी थी। कभी फुरसत में देखिएगा:
    http://girijeshrao.blogspot.com/2009/05/blog-post_26.html
    http://girijeshrao.blogspot.com/2009/05/blog-post_27.html
    http://girijeshrao.blogspot.com/2009/05/blog-post_31.html
    http://girijeshrao.blogspot.com/2009/10/blog-post_3341.html

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  6. रायपुर क्या सभी जगह यही हाल हैं, मुंबई में थोड़े हालात फ़िर भी ठीक नजर आते हैं, पर किसी एक व्यक्ति या संस्था की लापरवाही से ये सब होता है, ये नजारे पूरे भारत भर में मिलेंगे।

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  7. @ गि्रिजेश भाई

    क्या कहें दिल मानता नहीं है,
    अगर मेरी आवाज उन तक पहुंच जाए।
    तो दो-चार लोग अपनी पसली तुड़वाने से बच जाएं।
    हो सके तो जान भी बच जाए।

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  8. @ नगर निगम को फोन कीजिए। यहाँ नखलौ में तो काम हो जाता है। हाँ, मेहनत बहुत करनी पड़ती है।

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  9. सडकों पर गड्ढे तो भारत की पहचान हैं .. सडकों पर मवेशी न हों तो वो भी कैसा भारत .. सरकार , ठेकेदार और मवेशीपालक भारत की पहचान नहीं मिटने देना चाहते .. ऐसे में संभलकर गाडी चलाना ही आम नागरिक का कर्तब्‍य हो जाता है !!

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  10. जानने की कोशिश कीजिये की मुख्य मंत्री या उसके असिस्टंट का कोई ब्लॉग होगा और उसे अपने ये लिंक भेज दीजिए...और फिर उसी रूप में आ जाइये मस्त राम है मस्ती में आग लगो चाहे बस्ती में.

    अजित गुप्ता जी की बात बिलकुल सही है.

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  11. अहा...मैं तो समझता था कि ये नज़ारे केवल दिल्ली के ही हैं :-))

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  12. इससे साबित होता है कि रायपुर भी भारत में है ,क्योंकि पूरे देश में ये स्थिति है ।

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  13. रायपुर हो या जयपुर सब जगह एक से ही हाल है.....................

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  14. राम राम सब जगहें यहीं हाल है ... गड्डे भी मस्त और राहगीर भी मस्त... भैय्या जी .....

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  15. zidgi raam bahrose chal rahi hai.. poore desh me.. aap surakshit hain yaani aap par ishwar kee kripa hai

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  16. आप भी ललित जी! सड़क के गड्ढे को पटवाकर भारत के सड़क की पहचान ही खत्म कर देना चाहते हैं। गड्ढ़े तो भारत की सड़कों की शान हैं!

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  17. क्या कहा जाय , शायद ऐसी ही सड़कों पर व्यंग्य चलता है कि 'गड्डों में सड़क बनी होती है' , जानवर तो सब दुरुस्त ही कर देंगे , इंसान इन्हीं के भरोसे तो सब छोड़ रहा है ... और खुद जानवर होता जा रहा है ! सच दिखाती पोस्ट ! आभार !

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  18. मैनपुरी में भी आप यही हाल पायेंगे !

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  19. आप तो गड्ढों में सड़क ढूँढते चलिए....कागजों में तो पूरी बनी हुई सड़क होगी.....

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  20. हम सब आजाद है, सब की मर्जी है जो चाहे वो करो... जो देश भगवान के सहारे चल रहा हो वहां ऎसी छोटी मोटी बाते तो आम है जी, अंधी पीस रही है ओर कुतिया चाट रही है यह हाल है इस देश का,

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  21. अरे वाह कितने खूबसूरत गड्ढे और मवेशी थे ...बिल्कुल सडक से मैंचिंग ....और आप हैं कि खामख्वाह इन्हें दोष दिए जा रहे हैं ...वो तो शुक्र मनाईये कि सडक के इन गड्ढों से और मवेशी बैठकी से भी , जाने अनजाने लोगों को ये कंफ़र्म होता रहता है कि..अपने ..शहर /सडक ...से भटके तो नहीं है ...इन्हें तो हर सडक पर कंपल्सरी सबजेक्ट हिंदी की तरह कर देना चाहिए ...क्योंकि सडक और हिंदी ..दोनों की हालत एक जैसी ही है ...

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  22. बचपन से समझाया जाता रहा है, सर उठा कर चलो।
    मनोवैज्ञानिक कहते हैं, सर नीचा कर चलने से "परस्नैलिटी" पर फर्क पड़ता है।
    अमिताभ ने भी ठोकर खाने के बाद ही डायलाग मारा था, आज तो बहुत खुश होगे........

    फिर तापमान नियंत्रित गाड़ियों और सत्ता का मद नीचे कहां देखने देता है भाई।

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  23. यही होता है... बढ़िया तस्वीरें और विवरण..

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  24. ... ये अपना शहर रायपुर है ... कभी कभी हो जाता है !!!

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  25. ललित जी,
    रात के अँधेरे में आपने कैमरे की आँखों में जो कैद किया वह सराहनीय है. पर क्या करें जिम्मेदार लोंगों को दिन के उजाले में भी यह दिखाई नहीं देता.रायपुर की स्थिति तो ऐसी ही है कि,"ऐ भाई जरा देख के चलो आगे भी नहीं जरा पीछे भी,ऊपर ही नहीं जरा नीचे भी"....भाई साहब यहाँ तो नजर हटी और दुर्घटना घटी .... आप सकुशल घर पहुँच गए इसकी बधाई!
    नारायण भूषणिया

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  26. ऐसे दृश्य आम हैं जो साबित करते हैं कि हमारे पूरा देश एक सामान नीति पर काम करता है.
    जय हिन्द, जय बुन्देलखण्ड

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  27. हर शहर की यही कहानी है ...
    बरसात से पहले हुए सड़क के गड्ढे ...और बरसात में सड़क निर्माण करते ठेकेदार और मजदूर भी नजर आ जाते हैं ...!

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  28. ये हर शहर की कहानी है ...
    बरसात से पहले टूटी सड़कें और बरसात के दौरान इनका निर्माण ...ये नजारा भी सारे आम है ...सड़क पर आराम फरमाती इन गाय - भैंसों की ही तरह

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  29. अच्छी व्यवस्था की पोल खोलती पोस्ट ,ऐसे ही लिखते रहिये क्या पता कभी बहरे सुनने लगे और अंधे देखने लगे ....! अच्छा व उम्दा प्रयास |

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  30. यही हाल जबलपुर का भी है..क्या कहें...घर घर माटी के चूल्हें हैं.

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  31. जब जब कत्लखाने जा रही गौ माताओं को धर्म सैनिकों की मदद से पुलिस ने पकड़ा है, तब तब मैंने ये सवाल उठाया है की क्या रास्ते की माताएं गौ माताएं नहीं हैं? अगर नहीं इनके ठिकानों तक इन्हें पहुँचाया क्यों नहीं जाता. कांजी हाउस क्यों बनाता है नगर निगम? वहां की कहानी पर भी कुछ काम किया है मैंने. कांजी हाउस में तो उन माताओं को ही जगह मिलती है जिनका मालिक सेठ होता है. अब समस्या ये है की इन माताओं के पीछे वाले हिस्से में रेडियम का स्टीकर भी तो नहीं चिपका सकते. जब तक प्रेक्टिकल लोग सत्ता में नहीं होंगे, इन छोटी लेकिन गंभीर बातों पर किसी के कान में जूं नहीं रेंगने वाली. अगर मैं hospitalise नहीं होता तो आपको ये सब देखने नहीं मिलता. आपसे मुलाक़ात नहीं हो पाई. इसके लिए पुनः क्षमा चाहता हूँ.

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  32. जागरूक करने वाली पोस्ट है | शायद कोइ सरकारी नुमाइंदा जगा ही होगा इसे पढ़ कर | नहीं जगा तो भी कोइ बात नही है पोस्ट का टाईटल तो है ही इसी से काम चला लेते है |

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